'हाई कोर्ट हमें आदेश देने वाला होता कौन है', NCLAT के जज और वकील में 'जबरदस्त' बहस हो गई
National Company Law Appellate Tribunal के जस्टिस Sharad Kumar Sharma ने हाई कोर्ट के अधिकारों पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा है कि हाई कोर्ट, अधिक से अधिक NCLAT से आग्रह कर सकता है. हाई कोर्ट NCLAT को आदेश नहीं दे सकता. इस पर एक वकील से उनकी बहस भी हुई.

नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) के जज और एक वकील के बीच तीखी बहस हो गई. NCLAT के जज ने कर्नाटक हाई कोर्ट के अधिकार पर सवाल उठाया. NCLAT, नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के खिलाफ अपीलों की सुनवाई करता है. NCLT कंपनियों से जुड़े सिविल प्रकृति के विवादों पर फैसले लेता है. आसान भाषा में समझ लेते हैं. NCLT- कॉरपोरेट में धन-संपत्ति से जुड़े विवादों का निपटारा करता है. NCLT के फैसलों को NCLAT में चुनौती दी जाती है.
NCLAT की चेन्नई बेंच की अध्यक्षता जस्टिस शरद कुमार शर्मा कर रहे थे. 23 जुलाई को एक वकील ने उनसे कहा कि कर्नाटक हाई कोर्ट ने NCLAT को आदेश दिया है कि एक मामले को प्राथमिकता के आधार पर लिस्ट किया जाए. जब कोई जज ये तय करते हैं कि वो किसी मामले की सुनवाई करेंगे, तो उसे लिस्ट (सूचीबद्ध) किया जाता है. फिर सुनवाई के लिए तारीख तय की जाती है. इस मामले में वकील का कहना था की उनके केस को पहले लिस्ट किया जाए.
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'High Court होता कौन है आदेश देने वाला?'वकील ने जब हाई कोर्ट का हवाला दिया तो जस्टिस शर्मा ने तीखी टिप्पणी की. उन्होंने कहा,
बार एंड बेंच की एक रिपोर्ट के मुताबिक, NCLAT पहुंचने से पहले वकील ने कर्नाटक हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. लेकिन वापस NCLAT ही आना पड़ा. जज शर्मा ने कहा कि वो मामलों को लिस्ट करते समय कभी तारीख तय नहीं करते. उन्होंने कहा कि वो सिर्फ इतना कहते हैं कि इस पर सुनवाई की जाएगी. इसके बाद रजिस्ट्री तारीख तय करती है. इसी के बाद वकील ने हाई कोर्ट का हवाला देते हुए केस को प्राथमिकता देने का आग्रह किया था. जस्टिस शर्मा ने कहा,
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जस्टिस शरद कुमार शर्मा को मई 2017 में बेंच में प्रमोट किया गया था. इसके बाद उन्होंने उत्तराखंड हाई कोर्ट के एडिशनल जज का कार्यभार संभाला. दिसंबर 2023 में उनके रिटायरमेंट से पहले अगस्त 2018 में उन्हें परमानेंट किया गया. इस साल 30 जनवरी को केंद्र सरकार ने उन्हें NCLAT चेन्नई का ज्यूडिशियल मेंबर बनाया है.
NCLAT के अधिकारजरूरत पड़ने पर NCLAT किसी मामले को नए सिरे से विचार के लिए NCLT को वापस भेज सकता है. यदि कोई पक्ष NCLAT के आदेश से भी संतुष्ट नहीं है तो वो सुप्रीम कोर्ट में उस फैसले को चुनौती दे सकता है. NCLAT के आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करना होता है.
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