दिल्ली की आप सरकार ने उप-राज्यपाल नजीब जंग के पास लैटर भेजा. इसमें शीला दीक्षितद्वारा कथित 400 करोड़ रुपये के वॉटर टैंकर घोटाले की जांच की मांग की गयी है.इधर-उधर से नहीं करवाना है बल्कि CBI या ACB से ही करवाना है.बयानबाजी दिल्ली में बीजेपी के MLA विजेंदर गुप्ता बहुत दिन से केजरीवाल सरकार पर आरोप लगारहे थे कि ये लोग शीला दीक्षित को बचा रहे हैं. सही रिपोर्ट नहीं बता रहे. 11 महीनेहो गए. इसी बात को लेकर विधान सभा में केजरीवाल ने विजेंदर गुप्ता पर तंज भी कसाथा:विजेंदर गुप्ता के अथक प्रयासों से मामला यहां तक पहुंचा है. आगे अब गुप्ता जी कीजिम्मेदारी है. वो मोदी जी के पास जाएं और दो महीने में शीला दीक्षित के खिलाफ FIRकरवाएं. अगर नहीं कर पाते हैं तो आधी मूंछ मुड़ा लें और मोदी के खिलाफ धरने पर बैठजाएं.दिल्ली सरकार के पास CBI या ACB, किसी को ऑर्डर देने का अधिकार नहीं है. नजीब जंगके मार्फ़त रिक्वेस्ट कर सकते हैं. वहीं बीजेपी के लोग आमादा हैं कि केजरीवाल का नामभी रिपोर्ट में डाला जाए. क्योंकि वो शीला दीक्षित को पिछले 11 महीने से बचा रहेहैं.मामला क्या है?शीला दीक्षित 1998 से 2013 तक दिल्ली की मुख्यमंत्री थीं. 2012 में दिल्ली जल बोर्डने 385 स्टील के टैंकर किराये पर लिए थे. उस समय शीला दिल्ली जल बोर्ड की चेयरपर्सनभी थीं. आरोप है कि जिनसे टैंकर किराये पर लिए गए थे उनसे पैसों का भी लेन-देन हुआथा. कॉन्ट्रैक्ट देने के लिए. 400 करोड़ रूपये का मामला था. 2005 में दिल्ली जलबोर्ड ने वर्ल्ड बैंक की सलाह मानते हुए 'वाटर रिफॉर्म्स' के लिए 'प्राइस वाटरहाउसकूपर्स' मल्टी-नेशनल कंपनी से सुझाव मांगे. ये अंग्रेजी स्टाइल के लोग. इन्होंनेकहा कि पूरा पानी का सिस्टम प्राइवेट कर दो. और बड़े-बड़े विदेशी कॉन्ट्रैक्टर्स कानाम बता दिया. दिल्ली जल बोर्ड की हवा टाइट हो गई. नहीं किया. पर मेंटेनेंस,वाटर-मीटर इंस्टालेशन के काम छोटे -छोटे कॉन्ट्रैक्टर्स में बांट दिए. 2011 मेंशीला दीक्षित ने फिर एक कमिटी बैठाई. वाटर मैनेजमेंट को प्राइवेट करने के लिए. कियागया. पर झोल हो गया. कहा गया कि दिल्ली जल बोर्ड ने एक ब्लैकलिस्टेड कंपनी कोकॉन्ट्रैक्ट दे दिया. टेंडर उनके ही हिसाब से बनाया गया था. फिर ईस्ट दिल्ली में भीभागीरथी वाटर ट्रीटमेंट प्लांट के कॉन्ट्रैक्ट में भी घोटाले का बवाल उठा. मोटर,पंप जैसी चीजों के खरीद और इंस्टालेशन में. इस प्लांट के सुधार के लिए जल बोर्ड नेजापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी(JICA) की सलाह ली थी. जापान की यही कंपनी बुलेटट्रेन के लिए भी 'सलाह' देती है. JICA ने पैसों का भी एक अंदाज़ बता दिया था. परइसमें हुआ ये कि बहुत सारी कंपनियों को अयोग्य बता दिया गया. और L&T को कॉन्ट्रैक्टदे दिया गया. इसने कई चीजों में JICA के अनुमानित प्राइस से कई गुना प्राइस कोट कीथी. फिर भी. तो कुल मिला जुला के मामला जटिल है. टेंडर निकालने से लेकर पानीपहुंचाने तक में दबा के घोटाले करने के मौके रहते हैं. किसी चीज को प्राइवेटाईजकरने में यही दिक्कतें आती हैं. कामनवेल्थ में भी ऐसे घोटाले हुए थे.--------------------------------------------------------------------------------ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के साथ जुड़े ऋषभ ने लिखी है.