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16 साल के फेक न्यूज़ किंग से मिलिए जिसने ट्रंप को राष्ट्रपति बनवा दिया

हमारे यहां भी साइंस फिक्शन के सुरमाओं ने 2000 के नोट को सैटेलाइट से जोड़ दिया था

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16 साल का फेक न्यूज़ किंग विक्टर. फोटो सौजन्य : चैनल 4
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खेल लल्लनटाप
28 नवंबर 2016 (अपडेटेड: 28 नवंबर 2016, 11:11 AM IST)
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अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप और अमेरिका के मीडिया में सांड़ और लाल कपड़े का संबंध रहा है. चुनाव से पहले अमेरिका के ज्यादातर मीडिया ने हिलेरी क्लिंटन को जीता रखा था. चुनाव के बाद भी ‘ट्रंप इज़ नॉट माई प्रेज़ीडेंट’ के नारे ही प्रमुखता से दिख और छप रहे हैं. मुख्यधारा के मीडिया की मदद के बिना ट्रंप के जीत जाने पर कई लोगों का तज़ुर्बे से बना गणित गड़बड़ा गया है. अभी लोग हिसाब बैठा ही रहे हैं कि एक ‘नॉन-सीरियस’ आदमी अमेरिका का राष्ट्रपति कैसे बन गया. और इस हिसाब में एक चीज़ निकल कर आ रही है. डोनल्ड ट्रंप की जीत में एक बड़ी भूमिका निभाई है फेक न्यूज़ बेवसाइट्स ने. ऐसा नहीं है कि हिलेरी क्लिंटन के खेमे को फेक न्यूज़ का सहारा न मिला हो लेकिन डोनल्ड ट्रंप बाय डिफॉल्ट चल निकले. इन झूठी खबरों के पीछे कोई हार्वड के पास-आउट कैंपेन प्लानर नहीं बल्कि हज़ारों किलोमीटर दूर मैसेडोनिया के एक गांव वेलेस में बैठे हुए निठल्ले नौजवान थे. वेलेस में फेक न्यूज़ एक कुटीर उद्योग का दर्जा प्राप्त कर चुका है.


ऐसी ही एक बेवसाइट BVANews.com का पहला पन्ना

ऐसी ही एक बेवसाइट BVANews.com का पहला पन्ना

ब्रिटेन के चैनल 4 की एक रिपोर्ट में इन लोगों से बातचीत करते हुए दिखाया गया है. विक्टर नाम के एक नौजवान का दावा है कि अमेरिकी लोग आर्टिकल्स के लिए प्यासे हैं. वो डोनल्ड ट्रंप के बारे में सुनना चाहते हैं. उसे इस बात का मलाल है कि लोग अंट-शंट खबरों पर यकीन कर रहे हैं. लेकिन वो ये काम जारी रखना चाहता है. अनुमानों के मुताबिक इन नौजवानों ने हर महीने 2 लाख डॉलर तक फोड़े हैं.

करीब 45000 की जनसंख्या के इस गांव में कोई 200 लोग अमेरिकी राजनीति के एक्सपर्ट बनकर बेवसाइट चला रहे हैं. Trumpvision365.com, DonaldTrumpNews.co और WorldPoliticus जैसे अमेरिकी नामों की बेवसाइट्स बना रखी है और जैसी इच्छा हो वैसी खबरें चला देते हैं. इनमें से कुछ बेवसाइट्स ब्लॉक कर दी गई हैं और कुछ अभी भी चल रही हैं.

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अमेरिकी चुनावों के दौरान निकली चुनिंदा फेक न्यूज़
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ये खबरें वॉशिंगटन पोस्ट और वॉल स्ट्रीट जनरल जैसे बड़े-बड़े मीडिया संस्थानों की एक्सक्यूसिव खबरों से भी ज्यादा बार शेयर हुईं. इस धंधे की शुरूआत गांव के एक नौजवान ने की. मीडिया को दिए इंटरव्यू में अपना नाम एलेक्स बताने वाला यह नौजवान अमेरिकी पाठकों के लिए सच्ची खबरों की बेवसाइट चलाता था लेकिन धीरे-धीरे आसपास के नौजवानों ने इस नवीन-नूतन विचार को ग्रहण कर लिया. यहां अमीर-गरीब देश की असमानता ने भी अपना काम किया. अमेरिका में मिले क्लिक्स का गूगल ऐडसेंस से ज्यादा पैसा मिलता है, चीन या भारत में प्रति क्लिक कम पैसा मिलता है. अमेरिका में इंटरनेट की पहुंच ज्यादा है, सनसनीखेज चीज़ फटाफट शेयर पर शेयर होती जाती है. इसलिए ये लोग अमेरिकी नागरिकों की सेवा करने के लिए तत्पर रहते हैं. दूसरी चीज़ इन लोगों को अंग्रेज़ी नहीं आती लेकिन इंटरनेट पर अंग्रेज़ी का कंटेंट और अमेरिकी कंटेंट इफरात में पड़ा है, कहीं से भी कॉपी-पेस्ट किया जा सकता है.


अमेरिकी चुनावों के दिन तक फेक न्यूज़ की फेसबुक शेयरिंग
टॉप 20 असली खबरें  73 लाख
टॉप 20 नकली खबरें 87 लाख
स्रोत : बज़सुमो



ऐसा नहीं है कि ट्रंप इन निठल्ले नौजवानों के पसंदीदा नेता है. इन्होंने और भी लोगों के पक्ष में फेक न्यूज़ चलाने की कोशिश की लेकिन जितने लाइक-शेयर ट्रंप की खबरों से आ रहे थे उतने कोई भी नहीं दे रहा था. धीरे-धीरे पूरे गांव के नौजवान ट्रंप पर टूट पड़े. और सोशल मीडिया पर ट्रंप की आंधी चल पड़ी. चुनाव के माहौल में जैसे हमारे यहां दारू पीने वालों कि चांदी हो जाती है वैसे ही इन नौजवानों की चांदी हो गई.

प्रिंट-टीवी बनाम ऑनलाइन में अमेरिकी लोगों ने ऑनलाइन को विजेता घोषित कर दिया है. जहां तक पत्रकारिता के उसूलों के ताक पर जाने का सवाल है, अमेरिका में ही कुछ लोगों को कहना है जब फॉक्स न्यूज़ और सीएनएन जैसी इच्छा हो वैसा एजेंडा सेट कर सकते हैं तो ये लोग क्यों न करें?  फेक न्यूज़ वालों ने वही किया है जो अमेरिका के बड़े-बड़े मीडिया संस्थान वर्षों से करते आ रहे थे. हालांकि कुछ अमेरिकी पत्रकार फेक न्यूज़ चलाने वाले नौजवानों को रूसी प्रोपगैंडा भी बता रहे हैं. हो सकता है इस बात में सच्चाई कम और शीत युद्ध का हैंग ओवर ज्यादा हो. हक़ीक़त यही है कि अभी तक पश्चिमी मीडिया फेक न्यूज़ चलाने वालों तक तो पहुंच गया है लेकिन रूस का कनेक्शन प्रमाणित नहीं कर पाया है.

उधर फेसबुक और गूगल कहते तो हैं कि हम नकली खबरों को हटाएंगे लेकिन इस भगीरथी काम में वो बहुत थोड़ा सा ही कर पा रहे हैं. कुछ फेसबुक पेज ब्लॉक हुए हैं और एकाध बेवसाइट को सर्च से निकाला गया है बाकि काम वैसे ही चल रहा है. अपने घर को देखें तो, विकासशील देश होने के कारण हम लोग फेक न्यूज़ उद्योग के निशाने पर नहीं है लेकिन हमारे यहां भी वाट्सअप-विस्सविद्यालय के नए-नए छात्र निकल कर आ रहे हैं. फेक न्यूज़ उद्योग में विदेशी प्रतिभा के लिए कोई स्कोप नहीं है. हां, कोई स्वदेशी उद्योग खड़ा हो जाए तो अलग बात है. शेष आप जानते ही हैं कि साइंस फिक्शन के सुरमाओं ने 2000 के नोट को सैटेलाइट से जोड़ दिया था !

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