1942 में जब अंग्रेजों के खिलाफ 'भारत छोड़ो आंदोलन' चल रहा था, तब सिखों को पेशावरके एक प्राचीन गुरुद्वारे से अपना अधिकार छोड़ने के लिए कहा गया. दो समुदायों केविवाद के चलते पेशावर के जोगीवारा गुरुद्वारे को बंद कर दिया गया. बंटवारे के बादसे अब तक दोनों देशों के बीच खटास भले ही बढ़ी हो. लेकिन पाक के पेशावर में साल2015 के आखिर में सिखों को बड़ी खुशखबरी मिली. 73 साल से बंद गुरुद्वारे को सिखोंके लिए फिर से खोल दिया गया है. गुरुद्वारा खैबर पख्तूनख्वा प्रांत की राजधानीपेशावर के हस्तनगरी इलाके में है. गुरुद्वारे के दरवाजे मामूली रिपेयरिंग के बादश्रद्धालुओं के लिए फिर से खोले जाएंगे. यहां सिखों की संख्या अच्छी खासी है. कहतेहैं बीते दशक में ट्राइबेल एरिया से सिख आकर यहां बसे हैं. इससे पहले साल 1985 मेंएक गुरुद्वारे माहल्ला जोगन शाह खोला गया था. क्या था विवाद? गुरुद्वारे को लेकरइलाके को मुस्लिम लोगों को आपत्ति थी. उनका कहना था कि गुरुद्वारे का एरिया बेहदखुला है, जिससे यहां आने वाले लोगों की नजर पड़ोस में बने घरों और लोगों पर भी जासकती है. स्थानीय मुस्लिमों ने तर्क दिया कि पर्दा न होने की वजह से गुरुद्वारे केपड़ोस में रहने वाले लोगों की प्राइवेसी खत्म होती है, जिसके बाद 1942 में इसे बंदकर दिया गया. क्या हुआ समझौता? 73 साल पुराने विवाद को खत्म करने के लिए पेशावर मेंबैठक हुई. बैठक में पेशावर के डीसी रियाज महसूद, अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रीसोरांग सिंह, स्थानीय मुस्लिम और सिख शामिल रहे. समझौता हुआ कि गुरुद्वारे जल्दीखोल दिया जाएगा. प्रबंधक कमेटी गुरुद्वारे के चारों तरफ दीवार बनाने के लिए तैयारहो गई है, जिससे पड़ोस के लोगों और श्रद्धालुओं की प्राइवेसी में खलल न पड़े.