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PM मोदी के सपने से जुड़ी सबसे घिनौनी सच्चाई, जिसपर उनका और हमारा ध्यान कभी नहीं जाता

PM गटर की गैस से चाय बनाने का किस्सा सुना रहे हैं, उन्हें नहीं पता कि इससे क्या हो रहा है.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. भारत में नैरेटिव पर सबसे मज़बूत पकड़ वाला आदमी. (फोटोः रॉयटर्स)
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निखिल
14 अगस्त 2018 (Updated: 14 अगस्त 2018, 03:51 PM IST)
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'चायवाला' कहलाना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वैग का हिस्सा है. इसीलिए उनका और चाय का ज़िक्र साथ आ जाता है, तो ध्यान खींच लेता है. फिर 10 अगस्त को तो उन्होंने खुद ही चाय का ज़िक्र किया. लेकिन सारी फुटेज ले गई गटर की गैस. वो गैस जिसके बारे में प्रधानमंत्री ने अखबार में पढ़ा था कि उससे बर्नर जल जाता है, चाय बन जाती है, चायवाले का घर चल जाता है. ये आखिरी बात पीएम ने अखबार में नहीं पढ़ी थी लेकिन जब पकौड़े बेचने से घर चल सकता है तो चाय से भी तो चल ही जाता होगा.
खैर, पीएम के मुंह से निकलने के बाद गटर की गैस वाली बात ने हमारे देश में हाहाकार मचा दिया है. पीएम के बयान पर खूब सारे मीम बन रहे हैं. जो मीम बना नहीं सकते, वो दूसरों के बनाए मीम शेयर करके सद्गति को प्राप्त हो रहे हैं. लेकिन फिर ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि बर्तन उलटा करके नाली में दे देने से चूल्हा जलाने लायक गैस निर्धारित प्रेशर के साथ बर्नर तक पहुंच सकती है. सो ये लोग पीएम का बचाव कर रहे हैं.
लेकिन. लेकिन इस सारे शोर में गटर वाली गैस के बारे में वो सबसे ज़रूरी चीज़ रह गई, जो पीएम ने नहीं कही. और न पब्लिक ने इस बात पर हल्ला मचाया. कि गटर की जो गैस चाय बना सकती है (या नहीं बना सकती है), वो आदमी की जान भी ले लेती है. उसकी चपेट में आकर आदमी वैसे ही मरता है, जैसे कीड़ा हिट स्प्रे छिड़कने पर.
भारत में मैनहोल या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की सफाई करते हुए हर साल सैकड़ों सफाई कर्मचारियों की मौत हो जाती है. (फोटोः रॉयटर्स)
भारत में मैनहोल या सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की सफाई करते हुए हर साल सैकड़ों सफाई कर्मचारियों की मौत हो जाती है. (फोटोः रॉयटर्स)

हम यहां उस आदमी की बात कर रहे हैं, जो पकौड़े नहीं खाता क्योंकि उसके पास इतने पैसे नहीं बचते कभी. और वो चाय भी नहीं पीता. क्योंकि उसका काम चाय जितने नशे में नहीं चलता. उसे दारू (शराब नहीं, दारू) पीनी पड़ती है. वो रोज़ सुबह दारू लगाकर काम पर निकलता है. सड़क के बीच बने जिस मैनहोल पर से आप कार बचाकर निकालते हैं, उसकी नज़र उसपर ठहर जाती है. वो उसे खोलकर किनारे करता है और गटर में बर्तन उलटा करके डालने के बजाय उसमें एक पत्थर दे मारता है. नहीं, ये 'इनोवेटिव माइंड' की कमी के चलते नहीं होता. ऐसा करके अपना आदमी देखता है कि गटर में से कॉकरोच बाहर आते हैं कि नहीं. बाथरूम की जाली में से या फिर किचन सिलेंडर के पीछे से कॉकरोच निकल आता है तो हम घिन से भर जाते हैं. लेकिन ये आदमी कॉकरोच देखकर उम्मीद से भर जाता है; कि कॉकरोच ज़िंदा है तो मैं भी ज़िंदा रह जाउंगा. फिर वो उस गड्ढे में उतर जाता है, जिसमें हमारे शरीर से निकला मल होता है. जो कई दिन से सड़ रहा होता है. और साथ में ढेर सारे कॉकरोच.
इस आदमी को हम किसी नाम से नहीं जानते. हमारे लिए वो सफाईवाला होता है बस. प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान का सबसे सच्चा सिपाही. जो सीवर गैस का खतरा होने पर भी गटर साफ करने उतरता है. सीवर गैस में हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया, मीथेन, कार्बन मोनोक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और नाइट्रोजन डाइऑक्साइड मिली होती है. ये सभी गैसें अपने आप में हानिकारक हैं. एक तय मात्रा से ज़्यादा शरीर में जाने पर जान ले लेती हैं. गटर, सीवेज प्लांट्स और सीवेज पाइप में ये बहुत बड़ी मात्रा में बनती हैं.
केंद्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत करोड़ों टॉयलेट बनवा रही है. ये सारे फ्लश वाले टॉयलेट हैं. इन्हें इस्तेमाल करने पर सीवेज पैदा होता है. (फोटोःपीटीआई)
मोदी जी का सपना. केंद्र सरकार स्वच्छ भारत अभियान के तहत करोड़ों टॉयलेट बनवा रही है. ये सारे फ्लश वाले टॉयलेट हैं. इन्हें इस्तेमाल करने पर सीवेज पैदा होता है. (फोटोःपीटीआई)

इस आदमी की जान की हिफाज़त के लिए हमारे देश में ‘द प्रोहिबिशन ऑफ एम्पलॉयमेंट एज़ मैन्यूअल स्कैवेंजर्स एंड देयर रिहैबिलिटेशन बिल, 2012’ नाम से कानून है. कानून के तहत इस आदमी के सीवेज सिस्टम (माने घरों में लगे सैप्टिक टैंक, पाइप, गटर और सीवेज प्लांट के टैंक वगैरह) को बिना सुरक्षा उपकरण साफ करने पर पूरी तरह रोक है. ज़िम्मेदारी सीधे ज़िला कलेक्टर की होती है. दिल्ली जैसे राज्यों में तो ये आदमी कानूनन सीवेज की सफाई हाथ से कर ही नहीं सकता. लेकिन फिर भी नियमित अंतराल पर इस आदमी के मरने की खबर आती रहती है. एक पैटर्न में. पहले एक आदमी गटर में उतरकर दम खोता है, फिर उसे बचाने उतरे आदमी का दम टूटता है और फिर इन दोनों को बचाने गया आदमी अंदर रह जाता है. फिर अंदर से तीन लाशें बाहर आती हैं (हाल ही में गाज़ियाबाद की घटना को याद करें).
ऐसा कतई नहीं है कि साफ-सफाई का जोखिम इस आदमी की जान ले लेता है या इस आदमी की मौत टल नहीं सकती. पूरी दुनिया में गटर जाम होते हैं. और उन्हें साफ करने में जब तकनीक अपनी सीमा तक पहुंच जाती है, तो कोई न कोई गटर में उतरता है. लेकिन हमारे यहां की तरह वो आदमी हमेशा ही किसी सताई कौम से नहीं आता. उसकी ज़िंदगी कीमती समझी जाती है और वो सारे ज़रूरी उपकरणों से लैस होता है. वो वेतन पाता है और कोई उसे ‘छोटा’ समझने की हिमाकत नहीं करता.
भारत में सफाई का काम करने वाला ज़्यादातर लोग दलित समाज से आते हैं. (फोटोःरॉयटर्स)
भारत में सफाई का काम करने वाला ज़्यादातर लोग दलित समाज से आते हैं. (फोटोःरॉयटर्स)

इस साल अप्रैल में लोकसभा में सरकार ने बयान देकर बताया कि मैन्युअल स्कैवेंजिंग पर रोक के बावजूद इसकी वजह से भारत में 2017 में 300 से ज़्यादा लोगों की मौत हुई. माने बीच में एकाध दिन छोड़कर रोज़ ये आदमी मर जाता है और किसी को फर्क नहीं पड़ता. न खास को. न आम को. जबकि मल तो सबके ही शरीर से निकलता है.
अगर आप पढ़ते हुए यहां तक आए हैं, तो पूछ भी सकते हैं कि भई वर्ल्ड बायोफ्यूल डे पर पीएम इस आदमी की बात करते ही क्यों. या फिर कभी भी क्यों करते. ये तो उनके मातहतों का काम है. पीएम थोड़े न सारे ही काम करता है. तो बात ये है कि पीएम के चाहने वाले बताते हैं कि पीएम साहब रोज़ बिला नागा 18 घंटे काम करते हैं. माने पीएम साहब में खूब ऊर्जा है. लेकिन उनकी असल ताकत उनके दफ्तर की दहलीज़ से बाहर नुमाया होती है. उनके पास हमारे देश में मास अपील का नैरेटिव सेट करने की असीम ताकत है. सादी भाषा में कहें तो न्यूज़ एंकर कॉफी पीते हुए, आम लोग नुक्कड़ वाली चाय पीते हुए और खास लोग ग्रीन टी पीते हुए किस बात पर चर्चा करेंगे, ये नरेंद्र मोदी बाएं हाथ से चुटकी बजाकर तय कर देते हैं. योगा, सेल्फी विद डॉटर, पकौड़े. पूरी लिस्ट लगाने जाऊं तो आगे की बात रह जाए.
क्योंकि आपके कहने से बात बन जाती है. (फोटोः रॉयटर्स)
क्योंकि आपके कहने से बात बन जाती है. (फोटोः रॉयटर्स)

अगर वो अपने 18 घंटों में से थोड़ा सा वक्त निकालकर गटर में पड़े इस आदमी पर कुछ कह दें तो हमारे यहां आम लोगों के बीच इसपर बात होने लगेगी कम से कम. क्या मालूम ये एक बड़ा मुद्दा बन जाए. क्या मालूम इसके चलते उसे गटर की 'चायदायिनी गैस' से बचने के लिए मास्क मिल जाए. क्या मालूम मास्क आने के बाद ये आदमी बदबू झेलने के लिए पी जाने वाली दारू छोड़ दे, उसकी जगह चाय पीने लगे. क्या मालूम वो इस भुलावे से निकल जाए कि मैला ढोना एक 'आध्यात्मिक अनुभव' है. क्या मालूम वो सफाई के लिए होने वाली नरबलि से बच जाए, चार दिन और जिए, मरे नहीं कीड़े के माफिक.
चाय अच्छी चीज़ है. वो बातों के लिए बहाना बनती है. और बातें आपको प्रधानमंत्री तक बना सकती हैं. तो चाय सामूहिक या एकल प्रगति का माध्यम भी है. इसलिए चाय पर खूब बातें होनी चाहिए. गटर की उस गैस पर भी बात होनी चाहिए, जिससे चाय बनने का किस्सा प्रधानमंत्री सुनाते हैं. लेकिन फिर ज़िक्र इस बात का भी होना चाहिए कि चाय जो पेशाब बनकर शरीर से बाहर आ जाती है, गटर में जाकर गैस बन जाती है. और इस गैस से आदमी वैसे ही मर जाता है, जैसे कीड़ा हिट स्प्रे छिड़कने पर.
इति.

सफाई कर्मचारियों के हाल पर विस्तार से पढ़ने के लिए नीचे दिया लिंक क्लिक करें.

लोग हमारे मल में डूबकर मर जाते हैं, हम खाना खाते रहते हैं




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