13 लाख लोग. कौन थे वो लोग. गुमनाम नहीं थे. किसी का बेटा रहा होगा, किसी बच्ची कापिता रहा होगा. किसी की मां रही होगी. घर से किसी काम के लिए खुशी-खुशी निकलेहोंगे. लेकिन सड़क पर अचानक कुछ हुआ. और वो एक दर्दनाक रास्ते से मौत के सफर तकनिकल लिए. ये किसी के साथ भी हो सकता है. आपके साथ भी हो सकता है. आपके किसी अपनेके साथ हो सकता है. दोष नियति को दे दिया जाता है, लेकिन असल में इस अचानक वालीघटना की स्क्रिप्ट कोई पहले ही लिख चुका होता है हम बात कर रहे हैं उनकी जिनकीपिछले सड़क हादसों में, किसी और की लापरवाही से मौत हुई है. जिनको बचाया जा सकताथा. दोष उस सिस्टम का होता है, जो ऐसी सड़कें बना देते हैं, जो खून की प्यासी बनजाती हैं. क्यों होता है ऐसा, देश में सड़कों में क्या कमियां छोड़ दी जाती हैं.क्यों हादसे ज्यादा होते हैं और कैसे टाले जा सकते हैं. सड़क हादसों के शिकार जबअपनी कहानी किसी को सुनाते हैं, उसमें एक शब्द बार-बार आता है. अचानक. आप कमोबेशसारी कहानियों में एक पैटर्न देख सकते हैं. सब कुछ सामान्य चल रहा होता है. और फिरपल भर में सब उलट पलट हो जाता है. सब कुछ इतनी जल्दी हो जाता है, कि क्या हुआ, कैसेहुआ, कई बार हादसे के शिकार को याद ही नहीं होता. इसीलिए हम सारा दोष ''होनी'' परडाल देते हैं. कि ये एक ऐसा वाकया था, जिसका घटना किसी आसमानी किताब में लिखी थी.और इसे कोई टाल नहीं सकता. लेकिन क्या हो, अगर आपको हम ये बताएं कि भारत में होनेवाले ज़्यादातर सड़क हादसे अचानक नहीं होते. घटनाओं का एक दुर्भाग्यपूर्ण क्रम है,जो साल दर साल, सरकार दर सरकार खुद को दोहराता रहता है. पल भर में ज़िंदगी बदलनेवाला हादसा दरअसल सालों से घट रहा होता है. हम उसे पड़ने में चूकते रहते हैं. नतीजेमें घर के घर सूने हो जाते हैं. जो ज़िंदा बचते हैं, वो कुछ कम होकर जीने को मजबूररहते हैं. इसी तरफ इशारा कर रहा है भारत सरकार का हालिया ऑडिट, जो ये बताने कीकोशिश करता है कि भारत में सड़क हादसे जानलेवा कैसे हो जाते हैं. हम इस ऑडिट केनतीजों पर गौर करेंगे. और साथ ही इसपर भी चर्चा करेंगे कि इन हादसों को जानलेवाबनने से कैसे रोका जा सकता है. भारत सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों पर हादसों कीवजहें पता करने के लिए सड़कों और उनपर हुए हादसों का एक ऑडिट करवाया है. इसे सड़कको सुरक्षित बनाने की दिशा में काम करने वाले गैर सरकारी संगठन ''सेव लाइफफाउंडेशन'' ने तैयार किया है. और ये बताता है कि भारत में तकरीबन 40 फीसदी हादसे एकही तरह के होते हैं. रियर एंड कोलीज़न. माने जब कोई गाड़ी, किसी दूसरी गाड़ी कोपीछे से टक्कर मार देती है. आपने देश के अलग अलग एक्सप्रेसवेज़ पर ऐसे हादसों केबारे में सुना होगा, जिन्हें अंग्रेज़ी में पाइलअप कहा जाता है. एक गाड़ी कोहरे मेंरुकती है. तो उसे पीछे से एक दूसरी गाड़ी टक्कर मार देती है. फिर उसके पीछेगाड़ियों का अंबार लगता जाता है. यहां, हम ढेर सारे रियर एंड कोलीज़न देख रहे होतेहैं. ऑडिट बताता है कि बड़ी संख्या ऐसे रियर एंड कोलीज़न्स की होती है, जिनमेंगाड़ी के ड्राइवर को थकान के मारे झपकी आ जाती है. इंडियन एक्सप्रेस के लिए अविशेकजी दस्तीदार ने इस ऑडिट पर एक रिपोर्ट की है, जो हमें ऑडिट की खासमखास बातों सेरूबरू कराती है. इस ऑडिट के लिए उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में कुल 557 किलोमीटरके चार राष्ट्रीय राजमार्गों से पिछले तीन सालों की जानकारी ली गई. ये हैं आगराइटावा के बीच इटावा चकेरी के बीच पुणे सतारा के बीच सतारा कागल के बीच हाइवे केरखरखाव की ज़िम्मेदार कंपनी से मिली जानकारी का मिलान किया गया ट्रॉमा सेंटर सेहासिल हुए मेडिकल रिकॉर्ड्स से. तब ऐसे ढेर सारे मामले सामने आए जिनमें कमर्शियलवाहन, जैसे ट्रक, बस या टैक्सी के ड्राइवर्स ने थकान के चलते अपने वाहन आगे चल रहेया सड़क पर खड़े वाहनों से भिड़ा दिए. सेव लाइफ फाउंडेशन चलाने वाले और नेशनल रोडसेफ्टी काउंसिल के सदस्य पीयूष तिवारी के हवाले से अखबार ने लिखा है कि हादसे केमौके पर पहियों के घिसटने के निशान प्रायः नहीं थे. इसका मतलब ये निकाला गया किब्रेक नहीं लगाए गए थे. इसका मतलब यही हुआ, कि उन्हें नींद आ गई थी. सड़क हादसोंमें कई चीज़ों की भूमिका होती है - एक कारक है प्रकृति, जैसे कोहरा जो विज़िबिलिटीकम कर दे. या बारिश, जिसके चलते सड़क पर वाहन फिसल जाएं. फिर है लोगों की खराबआदतें, जैसे सीटबेल्ट या हेलमेट न लगाना, नशा करके गाड़ी चलाना, और इन सब के प्रतिप्रशासन का लचर रवैया. लेकिन इनसे इतर और कई कारर सड़कों को असुरक्षित बनाते हैंसड़क पर रोशनी का न होना सड़क के मीडियन या डिवाइडर का क्षतिग्रस्त होना - आपको तोमालूम ही है कि भारत में अपन यू टर्न तक जाने की ज़हमत नहीं उठाते हैं. अपने कोजहां से जगह मिल जाती है, वहीं से गाड़ी घुमा ली जाती है. सड़क के किनारे क्रैशबैरियर, या सादी भाषा में रेलिंग का न होना अगला कारक, जो इस ऑडिट में पकड़ में आयाहै, उसे हम सब जाने कब से विकास के नाम पर सहन करते आ रहे हैं. जब भी किसी सड़क काचौड़ीकरण या कोई और निर्माण चलता है, अमूमन कॉन्क्रीट के बैरियर रख दिए जाते हैं.स्लेटी रंग का कॉन्क्रीट शाम या रात को आसानी से नज़र नहीं आते. भिड़ंत का नतीजाक्या होता है, अलग से बताने की ज़रूरत नहीं है. हादसों के इन मानव निर्मित कारकोंको ऑडिट में सड़क का इंजीनियरिंग डिफेक्ट माना गया है. और आप ये जानकर अपना माथापीट सकते हैं कि सिर्फ आगरा से इटावा के बीच कम से कम साढ़े सात हज़ार इंजीनियरिंगडिफेक्ट्स की पहचान की गई है. अभी जो नतीजे हमारे सामने हैं, वो पायलट ऑडिट कानजीता है. इसका मतलब समय के साथ हमें हादसों और उनके कारणों में और पैटर्न देखने कोमिल सकते हैं. सरकार इस तरह के ऑडिट्स से ये पता लगाना चाहती है कि सड़कों कोसुरक्षित बनाने के लिए क्या उपाय किए जाएं. इसी तरह के ऑडिट 15 राज्यों में 4000किलोमीटर लंबाई के 12 राष्ट्रीय राजमार्गों पर भी किए जाएंगे. इन्हीं सड़कों परभारत के 85 फीसदी हादसे और मौतें होती हैं. सेव लाइफ फाउंडेशन ने इसी तरह की कवायदमुंबई पुणे एक्सप्रेसवे पर भी की थी. जिसके बाद 2016 से 2020 के बीच हादसों में 52फीसदी की कमी आई थी. हमने शुरुआत में आपसे कहा था कि भारत में सड़क हादसे अचानकनहीं होते. वो सालों से घट रहे होते हैं. लेकिन उनकी तरफ ध्यान नहीं दिया जाता है.2021 के नवंबर में आया ऑडिट हमें 40 फीसदी हादसों और झपकी के बीच ताल्लुक पहली बारनहीं बता रहा है. 2019 में सेंट्रल रोड रिसर्च इंस्टीट्यूट CRRI ने 300 किलोमीटरलंबे आगरा लखनऊ एक्सप्रेसवे पर एक अध्ययन करवाया था. 30 जुलाई 2019 को फाइनैंशियनएक्सप्रेस की एक खबर में इस अध्ययन के नतीजे छपे. सवा दो साल पहले हुए इस अध्ययनमें भी यही सामने आया था कि पर्याप्त आराम न लेने के चलते वाहन चालकों को झपकी आजाती है. और इस तरह 40 फीसदी हादसे हो रहे थे. तब सीआरआरआई ने अपने सुझावों में कहाथा कि सड़क के किनारे नियमित अंतराल में बोर्ड लगे होने चाहिए. जिनपर रात में गाड़ीचलाते हुए ब्रेक लेने के लिए प्रेरित करने वाले संदेश लिखे हों. 15 से 30 मिनिट केब्रेक के बिना लगातार 3 घंटे से ज़्यादा गाड़ी न चलाएं. इसी के साथ एक दिन में कुलआठ घंटे से ज़्यादा गाड़ी न चलाएं. तभी आप सड़क पर पूरा ध्यान लगा पाएंगे. CRRI नेभी कमोबेश वही बातें सवा दो साल पहले कही थीं जो आज सेव लाइफ फाउंडेशन ने अपने ऑडिटमें बताई हैं हाईवे पर सड़क सुरक्षा के लचर इंतज़ाम - इसमें आप डिवाइडर या सड़ककिनारे रेलिंग के न होने को रख सकते हैं. वही चीज़ें, जिन्हें सेव लाइफ फाउंडेशन कीरिपोर्ट इंजीनियरिंग डिफेक्ट कहती है. हाइवे का खराब डिज़ाइन इनके अलावा CRRI कीरिपोर्ट ओवरलोडिंग और घिसे हुए टायरों के इस्तेमाल जैसी चीज़ों पर भी ध्यान दिलातीहै. सेव लाइफ फाउंडेशन और CRRI जैसे संस्थान जो आज कह रहे हैं, वही सब पहले भी कहरहे थे. आप सेव लाइफ फाउंडेशन की वेबसाइट पर जाएंगे तो आपको हादसों के आंकड़े हीआंकड़े नज़र आएंगे. हर घंटे भारत की सड़कों पर 17 लोगों की जान जाती है. रोज़ 29बच्चे सड़क हादसों में मारे जाते हैं. पिछले एक दशक में 50 लाख से ज़्यादा लोग सड़कहादसों में गंभीर रूप से घायल हुए या फिर अपंग हो गए. इसी दौरान 13 लाख 81 हज़ार सेज़्यादा लोगों की जान चली गई. इनमें से कम से कम आधी मौतों को तुरंत सहायता से टालाजा सकता था. इस आखिरी आंकड़े को हम ऐसे भी देख सकते हैं कि अगर भारत में अच्छीट्रॉमा केयर फैसिलिटी होतीं, तो पिछले 10 सालों में हम 6 लाख ज़िंदगियां बचा सकतेथे.