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'हर घर तिरंगा' अभियान का पूरा सच!

गाड़ी पर झंडा लगाने के क्या नियम हैं?

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10 अगस्त 2022 (अपडेटेड: 10 अगस्त 2022, 01:00 AM IST)
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आज़ादी के 75 साल पूरे होने जा रहे हैं. भारत के हर नागरिक के लिए एक मुबारक मौका. वो दुनिया जो कहती थी कि भारत के लोग लोकतंत्र के लायक नहीं, उसे ये बताने का मौका, कि हम 75 साल से न सिर्फ बने रहे, बल्कि बढ़ते भी रहे. मौका खुशी के इज़हार का भी है और अब तक के हासिल पर गर्व करने का भी. ऐसे में अगर हर घर तिरंगा लहराएगा, तो उससे सुंदर दृष्य क्या ही हो सकता है. लेकिन बीते कई दिनों से इस अभियान की आड़ में सरकारी मनमानी की खबरें आ रही हैं. देश के अलग अलग हिस्सों से ये शिकायतें आ रही हैं कि टार्गेट पूरा करने के नाम पर तिरंगा लोगों पर थोपा जा रहा है. कहीं तिरंगे को राशन के लिए शर्त बनाया जा रहा है तो कहीं सरकारी स्कूलों के मासाब अपनी तनख्वाह से झंडे खरीदने पर मजबूर हैं. और कुछ विभागों में तो झंडे देने के नाम पर तनख्वाह में से ही पैसे काट लिए जा रहे हैं. एक स्वैच्छिक अभियान में ये सब करवाकर तिरंगे का अपमान करने वाले कौन हैं?

आज़ादी के अमृत महोत्सव में हर घर तिरंगा अभियान मनाने के लिए फ्लैग कोड ऑफ इंडिया को भी बदला गया है. भारत का राष्ट्रीय ध्वज फहराते हुए किन नियमों का पालन किया जाएगा, ये सब फ्लैग कोड ऑफ इंडिया - 2002 में दर्ज था. फ्लैग कोड में हालिया बदलाव को लेकर एक भ्रम की स्थिति है. कई लोगों को ये लगने लगा है कि आम लोग पहले झंडा नहीं फहरा सकते थे, अब फहरा सकते हैं. जबकि ये बात तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है. दी लल्लनटॉप ने केंद्रीय गृह मंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 को पढ़ा. इसके पार्ट 2, सेक्शन 1 में बिंदु 2.1 कहता है,

"राष्ट्रध्वज की गरिमा और सम्मान का ध्यान रखते हुए आम लोगों, निजी संस्थाओं और शिक्षण संस्थाओं आदि के ध्वज फहराने पर कोई रोक नहीं होगी. ऐसा करते हुए Emblems and Names (Prevention of Improper Use) Act, 1950 के नियमों का ध्यान रखना होगा."

तो आम लोगों के ध्वज फैराने पर रोक नहीं थी. लेकिन इस फ्लैग कोड में ध्वज खादी का ही हो सकता था. 2006 से कर्नाटक खादी ग्रामोद्योग संयुक्त संघ ही ध्वज बनाने के लिए अधिकृत था. 30 जनवरी 2021 को एक आदेश के माध्यम से फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 को संशोधित किया गया. अब पॉलिएस्टर या मशीन से बने झंडे को भी मान्यता दे दी गई. साथ ही ध्वज को दिन और रात दोनों वक्त फहराने को भी मान्य कर दिया गया. पॉलिएस्टर वाले झंडे का एक फायदा ये होगा, कि इससे प्रत्येक झंडे की कीमत कम होगी, क्योंकि पॉलिएस्टर, खादी से सस्ता मटेरियल होता है. आम लोगों तक राष्ट्रध्वज पहुंचाने में उद्योगपति और कांग्रेस सांसद नवीन जिंदल का भी योगदान रहा है.

नवीन का परिवार इस्पात उद्योग से जुड़ा है. वो अपनी एक फैक्ट्री पर राष्ट्रध्वज फहरा रहे थे. लेकिन सरकारी अधिकारियों ने इसपर आपत्ति ली. और नवीन से तब के फ्लैग कोड का हवाला देते हुए ध्वज उतारने को कहा. इसके खिलाफ 1995 में नवीन जिंदल दिल्ली उच्च न्यायालय में चले गए. नवीन ने दलील दी कि भारतीय नागरिकों को उनका ध्वज फहराने से कोई कानून कैसे रोक सकता है. फिर फ्लैग कोड तो महज़ एक एग्ज़ीक्यूटिव इंस्ट्रक्शन है. माने सरकार द्वारा दी गई सलाह. इसे कानून बताकर लागू नहीं किया जा सकता.

जिंदल दिल्ली उच्च न्यायालय में झंडा फहराने का अधिकार जीत गए. लेकिन भारत सरकार दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले को चुनौती देने सर्वोच्च न्यायालय में चली गई. केंद्र का कहना था कि नागरिक झंडा फहराएं या नहीं, ये नीतिगत निर्णय है. इसमें न्यायालय का दखल देना उचित नहीं है. तब जस्टिस बृजेश कुमार और जस्टिस एसबी सिन्हा की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की थी और केंद्र की अपील को खारिज कर दिया था. 2004 में फैसला सुनाते हुए न्यायालय ने कहा था कि आज़ादी के लिए तो सब लड़े थे, ऐसे में लोगों को ध्वज फहराने से रोकना ठीक नहीं होगा. हालांकि झंडा फहराते हुए उसके अनुचित उपयोग की अनुमति नहीं दी जा सकती. साथ ही ध्वज की गरिमा का ध्यान अवश्य रखा जाए.

इस फैसले के बाद भी नियम यही रहा कि राष्ट्रध्वज को सूर्यास्त से पहले उतार लिया जाए. दिसंबर 2009 में नवीन जिंदल ने केंद्रीय गृहमंत्रालय को एक प्रस्ताव दिया. इसे स्वीकार करते हुए गृह मंत्रालय ने व्यवस्था दी, कि ऊंचे फ्लैग मास्ट पर दिन रात ध्वज फहराया जा सकेगा. बस दो शर्तें रखी गईं - आरोहित ध्वज के लिए प्रकाश व्यवस्था हो और ध्वज अच्छी गुणवत्ता का हो. सादी भाषा में कहें तो, ध्वज साफ सुधरा हो, फटा न हो, सही तरीके से फहराया गया हो और वहां अंधेरा न हो.

फ्लैग कोड ऑफ इंडिया में जो संशोधन हाल में केंद्र ने किया है, उसमें मुख्यतया दो व्यवस्थाएं नई दी गई हैं. अब ध्वज खादी का ही हो, ऐसी बंदिश नहीं है. और अब घर पर भी ध्वज रात में फहराया जा सकता है. लेकिन ध्वज की गरिमा का सम्मान बनाए रखना अब भी आवश्यक है. एक और भ्रम है, जिसे हम दूर करना चाहते हैं. कई लोगों को ये लगने लगा है कि अब वो अपनी गाड़ियों पर भी राष्ट्रध्वज लगाकर चल सकते हैं. इसके लिए दी लल्लनटॉप ने केंद्रीय गृहमंत्रालय की वेबसाइट पर जाकर FAQs about use and display of Indian National Flag. माने राष्ट्रध्वज को फहराने को लेकर पूछे जाने वाले आम सवालों के उत्तर. इसमें 12वां प्रश्न अपनी गाड़ी पर ध्वज फहराने को लेकर है. इसके उत्तर में लिखा है कि गाड़ी पर झंडा फहराने का अधिकार फ्लैग कोड ऑफ इंडिया 2002 के पैरा 3.44 के मुताबिक ही रहेगा. इसके मुताबिक राष्ट्रध्वज सिर्फ इनकी गाड़ियों पर ही लगाया जा सकता है -

- राष्ट्रपति
- उप राष्ट्रपति
- राज्यपाल, उप राज्यपाल
- भारतीय मिशन्स माने दूतावास के प्रमुख
- प्रधानमंत्री
- कैबिनेट मंत्री, राज्यमंत्री और उप मंत्री
- मुख्यमंत्री, राज्य के कैबिनेट मंत्री
- लोकसभा अध्यक्ष, राज्यसभा के उपसभापति, लोकसभा के उपाध्यक्ष, इसी तरह राज्यों की विधायिका के अध्यक्ष आदि
- भारत के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के जज, हाईकोर्ट के जज

तो अगर आप इस कैटेगरी में आते हैं, तभी अपनी गाड़ी पर राष्ट्रध्वज लगाएं. ये ध्वज कैसे लगाया जाना है, इसके लिए फ्लैग कोड को रेफर करें.

तो हमने आपको बता दिया कि हर घर तिरंगा अभियान में भाग लेने के लिए किन बातों का ध्यान रखना आवश्यक होगा. हमने आज दिन भर में कई ऐसी खबरें देखीं जिनमें कहीं राशन लेने से पूर्व तिरंगा खरीदने की बंदिश लगाई गई, तो कहीं अध्यापकों से कहा गया कि वो अपनी तन्ख्वाह से ध्वज लेकर स्कूल में दें. एक हफ्ते के लिए बच्चों को मध्याह्न भोजन के साथ साथ मीठा भी परोसें. लेकिन बजट नहीं दिया गया. हरियाणा वाले मामले में, जहां राशन के साथ तिरंगा दिया जा रहा था, वहां डिपो धारक की सप्लाई को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है. ऐसे ही उन्नाव की गंगाघाट नगर पालिका में 20 रुपए के टोकन पर राष्ट्रध्वज लेने की बाध्यता की बात सामने आई थी. अब ज़िला प्रशासन ने साफ किया है कि टोकन स्वेच्छा से ही लिए जाएंगे, बाध्यता नहीं होगी.

कुल जमा बात ये है कि हर घर तिरंगा अभियान में जो शामिल होना चाहते हैं, उन्हें शान से ऐसा करने का मौका मिलना चाहिए. उन्हें अपनी खुशी का इज़हार करने देना चाहिए. लेकिन जहां भी सरकारी टार्गेट पूरा करने के चक्कर में तुगलकी फरमान दिए जाएं, वहां सख्त कार्रवाई ज़रूरी है. क्योंकि खुशी अपने से होती है, तो टिकती है. जब थोपी जाती है, तब मज़ा खत्म हो जाता है.

वीडियो: ‘हर घर तिरंगा’ अभियान से पहले ‘फ्लैग कोड ऑफ इंडिया’ में हुए बदलाव जान लें

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