मई 2004 की बात है. चुनाव हो चुके थे और सोनिया गांधी के नेतृत्व में यूपीए नेबहुमत हासिल कर लिया था. भारत की अगली प्रधानमंत्री के तौर पर सोनिया गांधी कोमानसिक तौर पर देश ने कबूल भी कर लिया था. लेकिन पॉलिटिक्स ने दिलचस्प टर्न लिया.विदेशी मूल के मुद्दे पर सोनिया की घेराबंदी हुई. विपक्ष की तरफ से फेंके गए इसडेडली बाउंसर को सोनिया ने बेहद असरदार तरीके से डक किया. पीएम की कुर्सी किसी औरको ऑफर कर के उन्होंने एक ऐसी सुप्रीमो बनना तय किया जिसके पास फुल पॉवर तो होलेकिन जवाबदेही कोई न हो. ऊपर से कुर्सी त्यागने से जो छवि चमकती थी सो अलग.सोनिया ने अपना नाम पीएम बनने की दौड़ से बाहर करा दिया. और फिर कांग्रेस के भीतरशुरू हुई प्रधानमंत्री की तलाश. जो कि तीन नामों पर जाकर ख़त्म हुई. मनमोहन सिंह,अर्जुन सिंह और प्रणब मुखर्जी.अर्जुन सिंह का दावा कमज़ोर था. कहा जाता है कि मनमोहन सिंह को प्रणब मुखर्जी पर महज़इसलिए तरजीह मिली क्योंकि प्रणब दा ठीक से हिंदी नहीं बोल पाते थे. हालांकिराजनीतिक गलियारों में ये सरगोशियां अक्सर सुनी गईं कि उनके और पीएम की कुर्सी केबीच उनकी पपेट ना बन पाने की खामी ने रोड़ा अटकाया था. तो प्रणब मुखर्जी नहीं बन पाएप्रधानमंत्री. मनमोहन कैबिनेट में उन्हें पहले रक्षामंत्री और फिर विदेश मंत्रीबनाया गया. मनमोहन सरकार की दूसरी टर्म में वो वित्त मंत्री बने. सन 2012 में वोभारत के तेरहवे राष्ट्रपति चुने गए. आज उनका जन्मदिन है. आज वो होते तो 85 बरस केहोते लेकिन 31 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया था. प्रणब दा का जन्म बंगाल केबीरभूम जिले के मिराती में हुआ. एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में जन्मे प्रणब दाराजनीति में प्रवेश से पहले एक कॉलेज में लेक्चरर थे. उनका पॉलिटिकल करियर शुरू हुआतब वो 34 वर्ष के थे. इंदिरा गांधी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और उन्हें राज्यसभाभेजा. वो इंदिरा गांधी की मृत्यु तक उनके विश्वास पात्र बने रहे.इंदिरा की असामायिक मौत के बाद जब राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने, तब प्रणब दा नेइसके लिए सारी ज़िम्मेदारी संभाली. हालांकि ये इल्ज़ाम भी उनपर लगाया गया कि इंदिराके बाद वो ख़ुद सत्तासीन होना चाहते थे. इन इल्ज़ामात को उन्होंने अपनी किताब ‘दीटर्ब्युलंट इयर्स’ में बड़ी सख्ती से नकारा है.राजीव के गद्दीनशीन होने के बाद प्रणब मुखर्जी के करियर ने नीचे उतरना शुरू किया.पहले पहल उन्हें दरकिनार कर दिया गया और बाद में छह सालों के लिए कांग्रेस सेनिलंबित किया गया. आहत प्रणब मुखर्जी ने अपनी एक नई पार्टी बना ली. ‘राष्ट्रीयसमाजवादी कांग्रेस.’ हालांकि इस पार्टी का जीवनकाल बहुत छोटा रहा और महज़ तीन सालमें इसका कांग्रेस में विलय हो गया. प्रणब दा के करियर ने फिर से उड़ान भरी सन 1991में राजीव गांधी की हत्या के बाद. पी वी नरसिम्हा राव ने उन्हें प्लानिंग कमीशन काडिप्टी चेयरमैन बनाया. राव गवर्नमेंट में ही उन्होंने पहली बार विदेश मंत्री कापदभार संभाला. यहां एक दिलचस्प तथ्य ये भी है कि जब राव प्रधानमंत्री बने थे तबउन्होंने मुखर्जी को अपनी कैबिनेट का हिस्सा नहीं बनाया था. राव के अच्छे दोस्तकहलाने वाले प्रणब दा के लिए और बाकी राजनीतिक पंडितों के लिए भी ये हैरानी की बातथी. राव ने प्रणब दा से कहा था के वो इसका कारण उन्हें ‘बाद में’ बताएंगे. वो बादकभी आई ही नहीं.अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में प्रणब दा ने कई सारी जिम्मेदारियां निभाईं.उन्होंने भारत सरकार के लिए विदेश, रक्षा, वाणिज्य और वित्त मंत्रालय का काम देखा.वो राज्यसभा मेंबर के तौर पर 5 बार चुने गए और 2 बार लोकसभा सांसद बने.एक किस्सा याद आता है. ये उस वक़्त की बात है जब प्रणब दा पहली बार सांसद बने थे.उनसे मिलने उनकी बहन आई हुई थी. अचानक चाय पीते हुए प्रणब दा ने अपनी बहन से कहा किवो अगले जनम में राष्ट्रपति भवन में बंधे रहने वाले घोड़े के रूप में पैदा होनाचाहते हैं. इस पर उनकी बहन अन्नपूर्णा देवी ने तपाक से कहा कि, ‘घोड़ा क्यों बनोगे?तुम इसी जनम में राष्ट्रपति बनोगे.’ वो भविष्यवाणी सही साबित हुई. प्रणब दा दुनियाके सबसे बड़े लोकतंत्र के महामहिम बने. हैप्पी बड्डे प्रणब दा...!!--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें: मोदी जी, अगर आप सच बोल रहे हैं तो मनमोहन सिंह को गिरफ्तार क्योंनहीं कर लेते ग्राउंड रिपोर्ट वलसाडः वो जगह जहां से जीतने वाली पार्टी की गुजरातमें सरकार बनती है जब एक पार्टी में अमर सिंह ने नशे में धुत्त मणि शंकर अय्यर कोपीट दिया था ये भी देखें: