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एक ट्रांसजेंडर का प्राइवेट पार्ट कैसा होता है, इस उत्सुकता में खराबी क्या है?

जिन्हें 'कालाकांडी' में हिजड़े देखकर अजीब लग रहा है, वो 'घुसो' का बोर्ड लगाएं.

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16 जनवरी 2018 (अपडेटेड: 16 जनवरी 2018, 09:24 AM IST)
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फिल्म 'कालाकांडी' मेंं दिखाया गया एक ट्रांसजेंडर किरदार
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एक पोस्ट देखी. काफ़ी ज्वलनशील. कालाकांडी को ध्यान में रखते हुए फ़िल्मों में ट्रांसजेंडर्स के दिखाए जाने के तरीकों पर ध्यान खींचा गया था. ये बात सही है कि हिंदी फ़िल्मों में ट्रांसजेंडर्स को सिर्फ एक मज़ाक का पात्र बनाया गया है और कुछ भी नहीं. ये सच में शर्म से भर देने वाली बात है. लेकिन कालाकांडी को भी उसी कैटेगरी में रख देना थोड़ा अजीब लग रहा है.


'कालाकांडी' में सैफ अली खान
'कालाकांडी' में सैफ अली खान

ज़्यादातर फ़िल्मों में अभी तक ट्रांसजेंडर्स की हरकतों को हंसी का पात्र बनाया जाता रहा है. मगर ये फ़िल्म तो उस मामले में कतई अलग है. और कई गुना बेहतर है. यहां वैसा कुछ नहीं था. यहां एक आदमी की मेंटेलिटी को दिखाया जा रहा था, जिसे ये जानने की उत्सुकता थी कि एक ट्रांसजेंडर का सामान कैसा होता है. अर्थात उसकी टांगों के बीच क्या मामला चल रहा होता है. ये एक कैरेक्टर है, जिसे लिखने वाले ने बनाया है. अब आप चाह रहे हैं कि वो आदमी एकदम पॉलिटिकली करेक्ट होते हुए सोचे. आपके अनुसार उसे लैपटॉप उठाकर, इंटरनेट की मदद से ये ढूंढ लेना चाहिए.


लेकिन उसने ऐसा नहीं किया.

वो ड्रग्स के इन्फ्लुएंस में है. शराब पी रखी है. ऐसे में वो एक ट्रांसजेंडर सेक्स वर्कर के पास जाता है और उसे पूरी इज्ज़त के साथ (ड्रग्स और शराब के नशे के बाद जितना हो सकता था) ओनली लुकी (only looky) के लिए कहता है. इसके बाद काफ़ी कुछ होता है. वो दोनों काफ़ी देर तक साथ में रहते हैं, लेकिन कहीं भी, कभी भी, ऐसा नहीं होता, जब हम ये कहें कि सैफ़ का कैरेक्टर उसके साथ किसी भी तरह बेअदबी से पेश आ रहा है या बद्तमीज़ी कर रहा है. अंत में तो शीला (वो जिनके बारे में यहां बात हो रही है) सैफ़ से पैसे लेने से भी मना कर देती हैं और बेहद प्यार के साथ एक फ़्लाइंग किस देते हुए विदा लेती हैं.


'कालाकांडी' में दिखाया गया ट्रांसजेंडर कैरेक्टर. साथ में सैफ अली खान.
'कालाकांडी' में दिखाया गया ट्रांसजेंडर कैरेक्टर. साथ में सैफ अली खान.

रही बात दीपक डोबरियाल और विजय राज की, तो वो दोनों फुकरे हैं. आप उनसे क्या एक्स्पेक्ट करते हैं? एक ऐसे आदमी के बारे में बात करते हुए, कई साल पहले जिसे गोली लगी और उसके एक टेस्टिकल में जा लगी, वो सीरियस रहेंगे? फ़िल्म को हटाकर उसे असल जीवन में रखते हुए देखिए. कौन से दो सड़क-छाप, महामक्कार, फ़ुल टाइम गुंडे इस बात पर पॉलिटिकली करेक्ट होकर बुद्धिजीवी टाइप बात करेंगे? आप इस पूरे समीकरण में फ़िल्म को लाकर क्यों नहीं रख रहे हैं? ये सच है कि गोली पर गोली लग जाना काफ़ी बुरा है और एक गोली का कम हो जाना (बन्दूक की नहीं, शरीर की) दु:खद है, लेकिन दो लुच्चे उस पर किस हिसाब से डिस्कशन करेंगे, इस बारे में हम सभी जानते हैं. और आप कहते हैं कि ऐसा फ़िल्म में क्यों दिखाया? कमाल का सवाल है.


'कालाकांडी' में दीपक डोबरियाल (बाएं) और विजय राज
'कालाकांडी' में दीपक डोबरियाल (बाएं) और विजय राज

फिज़िक्स पढ़ी थी. (कभी-कभी हम पढ़ लेते थे) उसमें फ्रिक्शन वाले चैप्टर में सवाल आता था कि फलाने सर्फेस का Coefficient of friction इतना है, जिसके हिसाब से सवाल हल करना होता था. लेकिन साथ ही फ्रिक्शन पढ़ाते वक़्त ये भी बताया जाता था कि आइडियल सर्फेस भी होते हैं, जहां फ्रिक्शन नहीं होता है. ये आइडियल सर्फेस बस किताबों और थ्योरी में होते थे. असल में कहीं नहीं.

हमें यही समझना पड़ेगा. आप आइडियल सर्फेस की मांग कर रहे हैं. नहीं मिलेगा. क्योंकि होता ही नहीं है. फिर भी चाहिए, तो वो काफ़ी बनावटी लगेगा. एकदम बेस्वाद. फिर शायद कोई कहानी लिखी ही नहीं जा सकेगी. कोई भी कहानी नहीं बनेगी. मतलब आदमी को कैंसर हुआ, वो घर गया, उसने इंटरनेट पर ट्रांसजेंडर्स के सामान की तस्वीर देखी और मर गया. ये भी कोई कहानी हुई भला?

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ये सही है कि कपिल शर्मा के शो में समस्या उसके सेक्सिस्ट जोक्स हैं, लेकिन उनमें और कालाकांडी में ज़मीन-आसमान का अंतर है. वहां एक क्रॉस-ड्रेस्ड इंसान के लुक्स, उसके हाव-भाव को मज़ाक का पात्र बनाया गया है. गाढ़ी मोटी लिपस्टिक, चलने-बोलने का तरीका सब कुछ इसलिए तय किया जाता है, जिससे लोग हंसे. कालाकांडी यहीं अलग है और बेहतर है.

इसके साथ ये भी जोड़ना ज़रूरी है कि फ़िल्म एकदम पोपट है. दीपक डोबरियाल और विजय राज के सिवा कुछ भी अच्छा नहीं है. विजय राज को एक कोचिंग सेंटर खोलना चाहिए और गाली देने का कानों में शहद घोल देने वाला तरीका समूचे देश को सिखाना चाहिए. कोई ऑफेंड नहीं होगा.




अब यहां फिल्म तो दिखा नहीं सकते, पढ़ा सकते हैं. पढ़िए:
सैफ अली खान की फिल्म 'कालाकांडी' की असल कहानी ये है!

फ़िल्म रिव्यू : कालाकांडी

 
 

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