अक्टूबर, 2018- मोहम्मद शहाबुद्दीन की उम्रकैद की सजा बरकरार रहेगी. पटना हाईकोर्ट के 30 अगस्त, 2017 को दिए फैसले पर अब सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी है.चीफ जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस एसके कौल और जस्टिस केएम जोसेफ की पीठ ने 2004 मेंहुए दोहरे कत्ल के मामले में ये सजा दी है. अगस्त 2004 में शहाबुद्दीन और उसकेलोगों ने रंगदारी न देने पर सीवान के प्रतापपुर गांव में चंदा बाबू के दो बेटोंसतीश और गिरीश रौशन को तेजाब डालकर जिंदा जला दिया था. इससे पहले पटना हाई कोर्ट ने9 दिसंबर 2015 को सिवान की विशेष अदालत के दिए फैसले को जारी रखा था. इसमेंशहाबुद्दीन समेत चार लोगों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.-------------------------------------------------------------------------------- आइए जानते हैं क्या हुआ था शहाबुद्दीन के साथ और क्या किया था शहाबुद्दीन ने-वीर शहाबु मत घबराना, तेरे पीछे सारा जमाना.सितंबर 2016 का महीना. 1300 गाड़ियों का काफिला लेकर जेल से चले शहाबुद्दीन. काफिलागुजर रहा था, टोल टैक्स वाले साइड में खड़े थे. उसी में कितने सारे और लोग भी पार होगए वीर शहाबु के साथ. एक दुर्दांत अपराधी शहाबुद्दीन जेल से छूटता है और जनता उसकेलिए जय-जयकार करती है. अपराधी खुलेआम बोलता है कि प्रदेश का मुख्यमंत्री नीतीशकुमार 'परिस्थितियों का नेता' है. लालू प्रसाद यादव मेरा नेता है. क्योंकि इसीमुख्यमंत्री ने 11 साल पहले शहाबुद्दीन को जेल भिजवाया था. और अब परिस्थितियां ऐसीहैं कि शहाबुद्दीन के नेता लालू प्रसाद यादव के समर्थन से नीतीश मुख्यमंत्री बनेहुए हैं. शहाबुद्दीन का जेल से छूटना कोई आश्चर्यचकित करने वाली घटना नहीं है. लालूकी पार्टी के सत्ता में आते ही ये कयास लगना शुरू हो गया था. लालू के जंगल राज मेंशहाबुद्दीन जैसा गुंडा ही वोट बटोरता था. जेल से भी जीत जाता था शहाबुद्दीन. सीवानमें इसे चुनाव प्रचार करने की जरूरत नहीं थी. 'साहब' का नाम ही काफी था. वो वक़्तथा, जब शहाबुद्दीन की फोटो सीवान जिले की हर दुकान में टंगी होती थी. सम्मान मेंनहीं, डर के चलते. अभी सीवान से सांसद हैं बीजेपी के ओमप्रकाश यादव. पंद्रह सालपहले शहाबुद्दीन ने ओमप्रकाश को सरेआम दौड़ा-दौड़ाकर पीटा था सीवान में. राजेंद्रप्रसाद के जीरादेई से ही ये गुंडा बना था विधायक अस्सी के दशक में बिहार का सीवानजिला तीन लोगों के लिए जाना जाता था. भारत के पहले राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद,सिविल सर्विसेज़ टॉपर आमिर सुभानी और ठग नटवर लाल. राजेंद्र प्रसाद सबके सिरमौर थे.आमिर उस समय मुसलमान समाज का चेहरा बने हुए थे. और नटवर के किस्से मशहूर थे. उसीवक़्त एक और लड़का अपनी जगह बना रहा था. शहाबुद्दीन. जो कम्युनिस्ट और बीजेपीकार्यकर्ताओं के साथ खूनी मार-पीट के चलते चर्चित हुआ था. इतना कि शाबू-AK 47 नामही पड़ गया. 1986 में हुसैनगंज थाने में इस पर पहली FIR दर्ज हुई थी. आज उसी थानेमें ये A-लिस्ट हिस्ट्रीशीटर है. मतलब वैसा अपराधी जिसका सुधार कभी नहीं हो सकता.अस्सी के दशक में ही लालू प्रसाद यादव मुख्यमंत्री पद के लिए अपनी दावेदारी पक्कीकर रहे थे. शहाबुद्दीन लालू के साथ हो लिया. मात्र 23 की उम्र में 1990 में विधायकबन गया. विधायक बनने के लिए 25 मिनिमम उम्र होती है. फिर ये अपराधी दो बार विधायकबना और चार बार सांसद. 1996 में केन्द्रीय राज्य मंत्री बनते-बनते रह गया था.क्योंकि एक केस खुल गया था. वो तो हो गया, पर लालू को जिताने के लिए इसकी जरूरतबहुत पड़ती थी. उनके लिए ये कुछ भी करने को तैयार था. और लालू इसके लिए. इसी प्रेममें बिहार में अपहरण एक उद्योग बन गया. सैकड़ों लोगों का अपहरण हुआ. बिजनेसमैन राज्यछोड़-छोड़ के भाग गए. कोई आना नहीं चाहता था. इसी दौरान और भी कई अपराधी आ गए. परशहाबुद्दीन जैसा कोई नहीं था. बोलने में विनम्र. हिंदी, अंग्रेजी और उर्दू केशब्दों का जहीन तरीके से प्रयोग. 'न्यायिक प्रक्रिया' में पूरा भरोसा. चश्मे, महंगेकपड़े और स्टाइल. और लालू का आशीर्वाद. इसके अपराधों की लिस्ट वोटर लिस्ट जैसी हैइसके अपराधों की लिस्ट बहुत लम्बी है. बहुत तो ऐसे हैं. जिनका कोई हिसाब नहीं है.जैसे सालों तक सीवान में डॉक्टर फीस के नाम पर 50 रुपये लेते थे. क्योंकि साहब काऑर्डर था. रात को 8 बजने से पहले लोग घर में घुस जाते थे. क्योंकि शहाबुद्दीन का डरथा. कोई नई कार नहीं खरीदता था. अपनी तनख्वाह किसी को नहीं बताता था. क्योंकिरंगदारी देनी पड़ेगी. शादी-विवाह में कितना खर्च हुआ, कोई कहीं नहीं बताता था. बहुतबार तो लोग ये भी नहीं बताते थे कि बच्चे कहां नौकरी कर रहे हैं. कई घरों में ऐसाहुआ कि कुछ बच्चे नौकरी कर रहे हैं, तो कुछ घर पर ही रह गए. क्योंकि सारे बाहर चलेजाते तो मां-बाप को रंगदारी देनी पड़ती. धनी लोग पुरानी मोटरसाइकल से चलते और कमपैसे वाले पैदल. लालू राज में सीवान जिले का विकास यही था. पर इन्हीं अपराधों नेशहाबुद्दीन को जनाधार भी दिया. वो अपने घर में जनता अदालत लगाने लगा. लोगों कीसमस्याएं मिनटों में निपटाई जाने लगीं. किसी का घर किसी ने हड़प लिया. साहब का इशाराआता था. अगली सुबह वो आदमी खुद ही खाली कर जाता. साहब डाइवोर्स प्रॉब्लम भी निपटादेते थे. जमीन की लड़ाई में तो ये विशेषज्ञ थे. कई बार तो ऐसा हुआ कि पीड़ित को पुलिससलाह देती कि साहब के पास चले जाओ. एक दिन एक पुलिस वाला भी साहब के पास पहुंचा था.प्रमोशन के लिए. एक फोन गया, हो गया. जनता इन छोटे-छोटे फायदों में इतना मशगूल होगई कि इसके अपराधों की तरफ ध्यान देना भूल गई. या यूं कहें कि डर और थोड़े से फायदेने दिमाग ही कुंद कर दिया था. लोगों ने देखना बंद कर दिया कि इसने कितनी जमीनेंहड़पीं, कितने हथियार पाकिस्तान से मंगवाए. नतीजन ये जीतता रहा. जेल जाने से पहलेइसने पुलिस पर फायरिंग की, सांसद बना! इसकी हिम्मत इतनी बढ़ गई कि पुलिस और सरकारीकर्मचारियों पर इसने हाथ उठाना शुरू कर दिया. मार्च 2001 में इसने एक पुलिस अफसर कोथप्पड़ मार दिया. इसके बाद सीवान की पुलिस बौखला गई. एकदम ही अलग अंदाज में पुलिस नेदल बनाकर शहाबुद्दीन पर हमला कर दिया. गोलीबारी हुई. दो पुलिसवालों समेत आठ लोगमरे. पर शहाबुद्दीन पुलिस की तीन गाड़ियां फूंककर भाग गया नेपाल. उसके भागने के लिएउसके आदमियों ने पुलिस पर हजारों राउंड फायर कर घेराबंदी कर दी थी. 1999 में इसनेकम्युनिस्ट पार्टी के एक कार्यकर्ता को किडनैप कर लिया था. उस कार्यकर्ता का फिरकभी कुछ पता ही नहीं चला. इसी मामले में 2003 में शहाबुद्दीन को जेल जाना पड़ा. परइसने ऐसा जुगाड़ किया कि जेल के नाम पर ये हॉस्पिटल में रहता था. वहीं पंचायत लगाता.इसके आदमी गन लेकर खड़े रहते. पुलिस से लेकर हर व्यवसाय का आदमी इससे मदद मांगनेआता. एक आदमी तो इसके लिए गिफ्ट में बन्दूक लेकर आया था. और ये हॉस्पिटल कानूनी तौरपर जेल था! इसके जेल जाने के आठ महीने बाद 2004 में लोकसभा चुनाव था. इस अपराधी कोचुनाव प्रचार करने की जरूरत नहीं पड़ी. जीत गया. ओमप्रकाश यादव इसके खिलाफ खड़े हुएथे. वोट भी लाये. चुनाव ख़त्म होने के बाद उनके आठ कार्यकर्ताओं का खून हो गया. 2005में सीवान के डीएम सी के अनिल और एसपी रत्न संजय ने शहाबुद्दीन को सीवान जिले सेतड़ीपार किया. एक सांसद अपने जिले से तड़ीपार हुआ! ये बिहार के लिए अनोखा क्षण था.फिर इसके घर पर रेड पड़ी. पाकिस्तान में बने हथियार, बम सब मिले. ये भी सबूत मिले किपाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI से इसके संबंध हैं. सुप्रीम कोर्ट ने इससे पूछा थाकि सांसद होने के नाते तुम्हें वैसे हथियारों की जरूरत क्यों है जो सिर्फ आर्मी केपास हैं, सीआरपीएफ और पुलिस के पास भी नहीं हैं. इसको जेल जाना पड़ा. वो पुलिस केलिए आसान नहीं रहा. ऑर्डर निकलने के तीन महीने बाद तक ये दिल्ली के अपने आवास मेंरहता था. बिहार और दिल्ली पुलिस की टुकड़ी जाती, वापस चली आती. एक दिन बिहार पुलिसका एक दस्ता गया. बिना किसी को बताये. और इसको उठा लिया गया. जेल जाने से कम नहींहुआ इसका रुतबा पर इसका घमंड कम नहीं हुआ. इसने जेलर को धमकी दी कि तुमको तड़पा-तड़पाके मारेंगे. सुनवाई पर इसका वकील जज को भी धमकी दे आता था. इसके आदमी जेल के लोगोंको धमकाते रहते. 2007 में कम्युनिस्ट पार्टी के ऑफिस में तोड़-फोड़ करने के आरोप मेंइसको दो साल की सजा हुई. फिर कम्युनिस्ट पार्टी के वर्कर की हत्या में इसे आजीवनकारावास की सजा हुई. सिर्फ एक गवाह था इस मामले का. उसने बड़ी हिम्मत दिखाई. किसीतरह बच-बचकर रहा था. और इस अपराधी को जेल भिजवाया. एक और मुन्ना मर्डर केस मेंविटनेस राजकुमार शर्मा ने कुछ यूं बयान दिया था: मैं अपने दोस्त मुन्ना के साथमोटरसाइकिल पर जा रहा था. तभी शहाबुद्दीन और उसके आदमी कारों से आये. और हम परफायरिंग शुरू कर दी. एक गोली टायर में लगी और हम लोग गिर गए. तब शहाबुद्दीन नेमुन्ना के पैर में गोली मार दी. और उसे घसीट के ले जाने लगा. बाद में पता चला किमुन्ना को एक चिमनी में फेंक दिया गया था. तब तक लालू राजनीति से बाहर हो चुके थे.पर इसकी शक्ति कम नहीं हुई थी. कोई इसके खिलाफ खड़ा होने की भी नहीं सोचता था. 1997में JNU से एक छात्र नेता चंद्रशेखर गए थे नई राजनीति करने. उनको जान से मार दियागया. उसके बाद से सिर्फ एक नेता ओमप्रकाश यादव ही लगे रहे. 2009 में शहाबुद्दीन कोइलेक्शन कमीशन ने चुनाव लड़ने से बैन कर दिया. तब इसकी पत्नी हिना को हराकर ओमप्रकाशसांसद बने. अब बिहार की राजनीति में ये बहुत पीछे चला गया. पर सीवान में नहीं. वहांपर जेल से ही इसके फैसले सुनाये जाते. कहते हैं कि जेल इसके लिए बस नाम भर की थी.सारे इंतजाम रहते. जब कोई हत्या हो जाती तो जेल में रेड पड़ती. एक अफसर के मुताबिकशहाबुद्दीन मुस्कुराता रहता. चुपचाप जेब से निकालकर मोबाइल फोन पुलिस के हाथ में देदेता. ये कई बार हुआ. 2014 लोकसभा चुनाव से इसके बाहर आने की संभावना बढ़ने लगी 2014में शहाबुद्दीन फिर लोगों की जबान पर आया. राजीव रंजन हत्याकांड में. अपने दोभाइयों की हत्या के वो एकमात्र गवाह थे. उनके दो भाइयों को 2004 में तेजाब सेनहलाकर मार दिया गया था. क्योंकि रंगदारी को लेकर इसके आदमियों और राजीव के भाइयोंमें बहस हो गई थी. इन लोगों ने बन्दूक दिखाई और राजीव के भाई ने तेजाब. दोनों भाईमारे गए. परिवार को पुलिस ने कह दिया कि सीवान छोड़कर चले जाइये. और अब कोर्ट मेंपेशी से पहले राजीव को मार दिया गया. 2016 में एक पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या करदी गई. उसमें भी इसी का नाम आया. इन दो भाइयों की हत्या वाले मामले में ही इसको बेलमिली है. क्योंकि कोई गवाह नहीं था.--------------------------------------------------------------------------------कुछ नए अपडेट्स को छोड़कर बाकी सब ऋषभ का लिखा हुआ है.--------------------------------------------------------------------------------ये भी पढ़ें:'कॉमरेड' कन्हैया को समर्पित कहानी : 'चंदू मैंने सपना देखा'लालू के दोस्त की सरकार से लालू के दोस्त शहाबुद्दीन की जान को खतरा है शहाबुद्दीनका इतना खौफ कि जज ने करा लिया ट्रांसफर! 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