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नूपुर शर्मा को झाड़ लगाने वाले जस्टिस पारदीवाला के आरक्षण पर बयान से संसद में हंगामा मच गया था?

जस्टिस जेबी पारदीवाला अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं, कोविड के दौरान उन्होंने गुजरात सरकार को हिला दिया था

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1 जुलाई 2022 (अपडेटेड: 1 जुलाई 2022, 08:44 PM IST)
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जस्टिस जेबी पारदीवाला (बाएं) अपनी बेबाक टिप्पणियों के लिए जाने जाते हैं | फ़ाइल फोटो: आजतक
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पैगंबर मोहम्मद पर टिप्पणी को लेकर चर्चा में आई निलंबित भाजपा नेता नूपुर शर्मा (Nupur Sharma) पर सुप्रीम कोर्ट ने तल्ख टिप्पणियां की हैं. नूपुर शर्मा (Nupur Sharma) ने अपने खिलाफ कई राज्यों में दर्ज एफआईआर (FIR) की जांच के लिए उन्हें दिल्ली ट्रांसफर करने की मांग को लेकर एक याचिका दायर की थी. इस पर सुनवाई की जस्टिस जमशेद बुर्जोर पारदीवाला और जस्टिस सूर्यकांत की बेंच ने.

जस्टिस जेबी पारदीवाला ने सुनवाई के दौरान कहा कि नूपुर शर्मा को टीवी पर जाकर देश से माफी मांगनी चाहिए थी. उन्होंने उदयपुर की घटना का भी जिक्र किया और कहा कि उदयपुर में हुई दुर्भाग्यपूर्ण घटना के लिए नूपुर का बयान ही जिम्मेदार है. बेंच ने कहा कि उनके बयान ने पूरे देश में आग लगा दी है.

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला की ये टिप्पणी खूब चर्चा बटोर रही है. बीते मई महीने में ही सुप्रीम कोर्ट जॉइन करने वाले जेबी पारदीवाला इससे पहले गुजरात हाईकोर्ट के जस्टिस थे. वहां उन्होंने कई महत्वपूर्ण केसों की सुनवाई की, इन सुनवाइयों के दौरान उनकी बेबाक टिप्पणियां खूब चर्चा में रही थीं.

कोविड के दौरान टिप्पणियों से गुजरात सरकार हिल गई!

COVID-19 लॉकडाउन के दौरान, जस्टिस जेबी पारदीवाला ने गुजरात हाई कोर्ट की उस खंडपीठ का नेतृत्व किया था, जिसने स्वतः संज्ञान लेते हुए यह सुनिश्चित किया कि कोविड के दौरान आम लोगों और प्रवासी श्रमिकों जैसे सबसे कमजोर वर्गों को अधिकारियों द्वारा उपेक्षित न किया जाए. इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस पारदीवाला ने अहमदाबाद सिविल अस्पताल और गुजरात सरकार पर तीखी टिप्पणियां की थीं.

पीठ ने कहा था,

अहमदाबाद सिविल अस्पताल की स्थिति बेहद दयनीय है और वह एक कालकोठरी जैसा है. क्या गुजरात सरकार को पता है कि वेंटिलेटर की कमी वहां के मरीजों के हाई डेथ रेट का कारण है. यहां तो मरीज चार या उससे ज्यादा दिनों के इलाज के बाद मर रहे हैं.

जस्टिस जेबी पारदीवाला की टिप्पणियों से गुजरात सरकार काफी आहत हुई और उसने ये टिप्पणियां वापस लेने के लिए अर्जी डाल दी. इस पर भी कोर्ट ने कह दिया कि सिविल अस्पताल को लेकर अभी वह प्रमाण पत्र नहीं दे सकता क्योंकि उसकी हालत बेहतर नहीं है. इस दौरान जस्टिस पारदीवाला की पीठ ने अधिकारियों को चेतावनी देते हुए ये भी कह दिया था कि पीठ अस्पताल की स्थिति चेक करने के लिए कभी भी औचक निरीक्षण भी कर सकती है.

आरक्षण के खिलाफ टिप्पणी की और संसद हिल गई!

साल 2015 में आरक्षण के विषय पर जस्टिस पारदीवाला की टिप्पणियों ने विवाद खड़ा कर दिया था. पाटीदार अनामत आंदोलन समिति के संयोजक हार्दिक पटेल के खिलाफ देशद्रोह के मामले में दर्ज एफआईआर को खारिज करते हुए जस्टिस पारदीवाला ने 'भ्रष्टाचार' को देश के लिए सबसे बड़ा खतरा और 'आरक्षण' को 'एमीबॉइड मॉन्‍स्टर' करार दिया था.

लाइव लॉ के मुताबिक उन्होंने टिप्पणी की थी,

"आज देश के लिए सबसे बड़ा खतरा भ्रष्टाचार है. देशवासियों को आरक्षण के लिए खून बहाने और हिंसा में लिप्त होने के बजाय सभी स्तरों पर भ्रष्टाचार के खिलाफ उठना और लड़ना चाहिए. आरक्षण ने केवल एक एमीबॉइड मॉन्‍स्टर की भूमिका निभाई है, जो लोगों के बीच कलह के बीज बो रहा है. किसी भी समाज में योग्यता के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता है."

जस्टिस पारदीवाला की इस टिप्पणी से कुछ राज्यसभा सांसद इतने नाराज हो गए कि उनके खिलाफ शिकायत लेकर तत्कालीन उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति मोहम्मद हामिद अंसारी के पास पहुंच गए. इन सांसदों ने पारदीवाला के खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही शुरू करने की अर्जी भी दे दी. जिसके बाद कोर्ट ने टिप्पणियां वापस ले लीं.

जेबी पारदीवाला के पिता विधायक रहे 

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेबी पारदीवाला ने वकालत के पेशे में 1989 में कदम रखा था. तब उन्होंने गुजरात के वलसाड में प्रैक्टिस शुरू की थी. हालांकि, एक साल बाद ही 1990 में वे गुजरात हाई कोर्ट चले गए और वहां प्रैक्टिस शुरू की. 2011 में उन्हें हाई कोर्ट की बेंच में अतिरिक्त जज के रूप में शामिल किया गया और 2013 में वे हाईकोर्ट के स्थायी जज बन गए.

जेबी पारदीवाला अपने पर‌िवार की चौथी पीढ़ी थे, जिन्होंने वकालत का पेशा अपनाया. उनके परदादा नवरोजजी भीखाजी पारदीवाल, उनके दादा और उनके पिता भी वकील थे. इन सभी ने भी वलसाड में ही प्रैक्टिस की थी. उनके पिता बुर्जोर कावासजी पारदीवाला 1955 में वलसाड की बार में शामिल हुए. वे विधायक भी रहे, साथ ही उन्होंने दिसंबर 1989 से मार्च 1990 तक गुजरात विधानसभा के स्पीकर का पद भी संभाला.

नोट: नूपुर शर्मा के लिए की गई टिप्पणियों का जिक्र सुप्रीम कोर्ट के आदेश में नहीं है.

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