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क्या है वायग्रा टैबलेट की कहानी? कैसे इस दवा ने मेडिकल जगत में क्रांति ला दी?

दवा ट्रायल के रिजल्ट्स की जैसी उम्मीद की गई थी, वैसा कुछ नहीं हुआ. दवा ट्रायल के इंचार्ज Ian Osterloh को कुछ ऐसे परिणाम दिखे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.

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वायग्रा टैबलेट
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8 फ़रवरी 2024 (Updated: 8 फ़रवरी 2024, 23:00 IST)
Updated: 8 फ़रवरी 2024 23:00 IST
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नब्बे के दशक की बात है, पूरी दुनिया बदलाव की ओर बढ़ रही थी. नए-नए बदलाव हो रहे थे. इसी समय लोगों के बीच एक बीमारी भी अपने पैर पसार रही थी. ये एक तरह का चेस्ट इन्फेक्शन था जिससे लोगों की छाती में संक्रमण फैल रहा था. पूरी दुनिया के डॉक्टर इसका इलाज ढूँढने की कोशिश कर रहे थे. तो, दवा बनी, दवा का टेस्ट भी हुआ पर ये अपना काम करने में असफल रही. पर इस दवा ने कुछ ऐसा कर दिया जिससे आने वाले सालों में कई पुरुषों में ये उम्मीद जगी कि वो भी सेक्सुअली एक्टिव हो पाएंगे. इस दवा का नाम दिया गया वायग्रा. और अब एक और खोज सामने आई है जिसमें पता चला है वायग्रा न सिर्फ पुरुषों की सेक्स से संबंधित समस्या,बल्कि एक और गंभीर रोग को  ठीक करने में कारगर है.
तो समझते हैं-

-वायग्रा की शुरुआत कैसे हुई?
-कैसे इसने मेडिकल जगत में एक क्रांति ला दी ?
-और नई खोज में वायग्रा के बारे में क्या पता चला है ?


आपने सोशल मीडिया पर एक मीम देखा होगा जिसमें दो तरह की टैबलेट लिए एक व्यक्ति खड़ा रहता है और आपको कोई एक चुनने को कहता है. मसलन लाल टैबलेट से ज़िंदगी भर का फ्री ट्रैवल और नीली टैबलेट से पूरी लाइफ फ्री फूड. हालांकि ये बस एक मीम है, ऐसा सच में नहीं होता. पर जादुई न सही, एक ऐसी नीली टैबलेट इस दुनिया में है जिसने वाकई इस दुनिया में और मेडिकल साइंस के क्षेत्र में क्रांति ला दी.

वायग्रा की कहानी शुरू होती है 1990 के दशक से. इस समय फाइज़र नाम की फार्मा कंपनी एक नई दवा सिल्डेनाफिल पर प्रयोग कर रही थी. इस दवा का इस्तेमाल हाइपरटेंशन और दिल से जुड़ी एक बीमारी angina pector के इलाज में किया जानाथा. ये ऐसी बीमारी थी जिसमें छाती में असहनीय दर्द उठता. इसकी बड़ी वजह थी शरीर में दिल की मांसपेशियों तक ब्लड का ठीक से न पहुंचना.  इस दवा को बनाने वाली टीम को लीड कर रहे थे ब्रिटिश केमिस्ट Simon Campbell. दवा बन गई और बारी आई इसके ट्रायल की. दवा के शुरुआती ट्रायल हुए इंग्लैंड के Morriston Hospital में. Swansea शहर में पड़ने वाला ये अस्पताल अघोषित तौर पर वायग्रा के ट्रायल का पहला गवाह बना.

ट्रायल में क्या पता चला ?
पर ट्रायल के रिजल्ट्स की जैसी उम्मीद की गई थी, वैसा कुछ नहीं हुआ. दवा ट्रायल के इंचार्ज  Ian Osterloh को कुछ ऐसे परिणाम दिखे जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी.  Ian Osterloh ने पाया कि ये दवा शरीर के ब्लड फ़्लो को बढ़ा तो रही है, पर सिर्फ शरीर के निचले हिस्से में.  ये दवा पुरुषों के शरीर में उत्तेजना पैदा करने लगी. इस तरह के नतीजे सामने आने के बाद शोध करने वालों ने इस पर हार्ट की बीमारियों के लिए हो रहे ट्रायल को रोकने का फैसला किया. उन्होंने इस दवा को एक अलग दिशा में आगे बढ़ाया. यानी शोधकर्ता अब सिल्डेनाफिल को अब दिल की बीमारी के लिए नहीं, बल्कि पुरुषों में इरेक्शन की समस्या के लिए इस्तेमाल किये जाने की दिशा में आगे बढ़ने लगे. यानी दवा बनाई जानी थी दिल की बीमारियों के लिए पर, इसने सेक्शुअल हेल्थ की दुनिया में ऐसी क्रांति ला दी, जिससे कई पुरुषों की ज़िंदगी बदल गई. ये वो समय था जब एक तिहाई पुरुष इरेक्शन को लेकर समस्या से जूझ रहे थे.

पर दवा बनने मात्र से कुछ नहीं होता, भले ये कितनी ही कारगर हो. जब तक इसे अमेरिका के Food and Drug Administration (FDA) से मंजूरी नहीं मिलती तबतक फ़ाईज़र इसे मार्केट में नहीं उतार सकती थी. आवेदन किया गया और अंततः 27  मार्च, 1998 को Food and Drug Administration  ने वायग्रा के इस्तेमाल को मंजूरी दे दी. और बाजार में आई नीली टैबलेट जिसने पुरुषों को उनकी कई आदतों मसलन जेनेटिक, खराब खान-पान, लापरवाह लाइफस्टाइल. इन सबकी वजह से जन्मी इरेक्टाइल disfunction की समस्या के लिए मार्केट में एक नाम प्रचलित हो गया वायग्रा. आज भी ये दवा दुनिया भर में पुरुषों की पहली पसंद बनी हुई है. वायग्रा की लोकप्रियता इतनी बढ़ गई कि इसके विज्ञापन में अमेरिका के रिपब्लिकन सीनेटर बाब डोल नजर आए.

समय बीता और वायग्रा का बाजार लगातार नई ऊंचाइयों को छूता गया. बिक्री के पहले दो हफ्ते में ही अमेरिका में इसको लेकर डेढ़ लाख प्रिस्क्रिप्शन लिखे गए. अमेरिका में उस व्यक्त वायग्रा के एक टैबलेट की कीमत 10 डॉलर थी. बाकी देशों में बिक्री शुरू होने से पहले ही वायग्रा इतना लोकप्रिय हो गया कि इजराइल, पोलेंड और सऊदी अरब में तो इसकी ब्लैक मार्केटिंग तक होने लगी. आज भी कई और दवाओं को भी वायग्रा नाम से ही बेचा जाता है. ये कुछ कुछ वैसा ही है, जैसे टंकी किसी भी ब्रांड की हो, पर जनता सिंटेक्स ही कह देती है. तो लोग दवा की दुकान पर जाते हैं, और सीधे वायग्रा की मांग करते है. भले उन्हें फाइज़र की दवा मिले, या किसी और कंपनी की.  

अब समझते हैं इस दवा से जुड़ी लेटेस्ट अपडेट पर. हाल में हुई एक रिसर्च में पता चला है कि वायग्रा सिर्फ इरेक्टाइल डिस्फंक्शन ही नहीं बल्कि एक और बीमारी का खतरा कम करने में सहायक है. यानी वायग्रा को बनाया गया था ब्लड फ़्लो के लिए. दवा बन गई इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की. और अब अगर ये शोध आगे कुछ  पाज़िटिव परिणाम देता है तो ये दवा एक खतरनाक रोग अल्जाइमर में भी काम आएगी.

अल्जाइमर दरअसल एक मानसिक बीमारी है. अगर ये बढ़ जाए तो ये डिमेंशिया यानी मानसिक पागलपन का प्रमुख कारण बनता है. अकेले अमेरिका में ही 50 लाख से अधिक लोग अल्जाइमर  से पीड़ित हैं. पूरी दुनिया में इसके ढाई करोड़ से अधिक मरीज होने का अनुमान है. अल्जाइमर का अगर समय पर इलाज न हो पाए तो इसके कारण डिमेंशिया होने का खतरा भी बढ़ सकता है.  भारत में भी इस रोग के मामले पिछले कुछ वर्षों में काफ़ी बढ़े हैं.

 क्या बताया है शोधकर्ताओं ने ?
शोधकर्ता दरअसल अल्जाइमर के इलाज पर स्टडी कर रहे थे. इसी दौरान उन्होंने पाया कि वायग्रा अल्जाइमर रोग के खतरे को कम करने में मददगार साबित हो सकती है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि जिन पुरुषों को वायग्रा की दवा दी गई, उनमें अल्जाइमर रोग या डिमेंशिया होने का खतरा 18 प्रतिशत कम था. इतना ही नहीं, जिन लोगों ने इस स्टडी के दौरान 20-50  बार वायग्रा का सेवन किया, उनमें उनमें अल्जाइमर का खतरा 44 प्रतिशत तक कम पाया गया. बीबीसी से बात करते हुए ब्रिटिश न्यूरोसाइंस एसोसिएशन के प्रेसिडेंट और यूनिवर्सिटी ऑफ एडीनबर्ग में प्रोफेसर Tara Spires-Jones कहते हैं कि
 

"अभी भी ये स्टडी ये साबित नहीं करती कि  इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की ये दवा अल्जाइमर के जोखिम को कम करती हैं. लेकिन इससे हमें एक उम्मीद जरूर जागी है कि इस तरह की दवाएं भविष्य में अध्ययन के लायक है ."

 

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