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क्या सऊदी अरब और पाकिस्तान के रिश्तों में तल्खी आ चुकी है?

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस MBS भारत आए, मगर पाकिस्तान नहीं गए. इसकी असली वजह क्या है? और, क्या सऊदी अरब ने पाकिस्तान को झटका दे दिया है?

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India's PM Narendra Modi and Saudi Arabia's Crown Prince MBS
भारत के पीएम नरेंद्र मोदी और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस MBS
15 सितंबर 2023
Updated: 15 सितंबर 2023 19:08 IST
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जिनके आने की उम्मीद में पाकिस्तान ने आंखें बिछा रखीं थीं, वो नहीं आए. वो भारत आए. G20 समिट में हिस्सा लिया. अलग से डील भी की. मगर ना आते और ना ही लौटते वक़्त पाकिस्तान में रुके. हम सऊदी अरब के प्रधानमंत्री और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS की बात कर रहे हैं. वो 09 से 11 सितंबर तक भारत में थे. दौरा खत्म हुआ तो सीधे अपने मुल्क निकल गए. पाकिस्तान ने संकेत दिया था कि MBS लौटते टाइम कुछ घंटों के लिए उसके यहां रुकेंगे. नहीं रुके तो बात निकली कि उन्होंने पाकिस्तान को धोखा दे दिया है.

दरअसल, पाकिस्तान पिछले बरस से ही MBS की बाट जोह रहा है. नवंबर 2022 में दौरा फ़िक्स हो चुका था. मगर ऐन मौके पर तारीख़ आगे बढ़ा दी गई. पाकिस्तान, सऊदी अरब को अपना सबसे अच्छा दोस्त मानता है. चाहे कर्ज़ की ज़रूरत हो या डिप्लोमैटिक सपोर्ट की, वो सबसे पहले सऊदी की तरफ़ ही जाता है. जानकारों का कहना है कि MBS की बेरुखी से उसको झटका लगा है.

पीएम मोदी  और सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस MBS

तो, आइए जानते हैं,

- सऊदी अरब की बेरुखी की वजह क्या है?
- और, सऊदी अरब-पाकिस्तान संबंधों का इतिहास क्या है?

तारीख़, 01 सितंबर 2023. पाकिस्तान में विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में सवाल पूछा गया, क्राउन प्रिंस MBS भारत जा रहे हैं, क्या वो पाकिस्तान भी आएंगे? जवाब मिला, फिलहाल ऐसी कोई जानकारी नहीं है. 04 सितंबर को पाकिस्तानी अख़बार द एक्सप्रेस ट्रिब्यून ने सूत्रों के हवाले से एक रिपोर्ट छापी. क्या-क्या लिखा था?

- सरकार MBS को पाकिस्तान बुलाने के लिए पूरी कोशिश कर रही है. जब तक दोनों तरफ़ से सहमति नहीं आ जाती, तब तक ऑफ़िशियली कुछ नहीं कहा जाएगा.
- अगर विजिट फ़ाइनल हुई भी तो MBS कुछ घंटों के लिए ही पाकिस्तान में रुकेंगे.

लेकिन पाकिस्तान इतना बेसब्र क्यों था?

द एक्सप्रेस ट्रिब्यून की ही रिपोर्ट में कामरान युसुफ़ ने इसकी वजह भी बताई है. पॉइंट्स में जान लीजिए.

- नंबर एक.
पिछले कुछ समय से अधिकतर देश पाकिस्तान और भारत के साथ संबंधों को अलग-अलग करके देखने लगे हैं. खाड़ी के देश इस मामले में अपवाद हैं. उन्होंने भारत के साथ रिश्ते को पाकिस्तान से जोड़कर देखा है. मसलन, 2019 में MBS भारत आए तो पाकिस्तान भी गए थे. सरकार को लगता है कि अगर उन्होंने प्लान बदला तो जनता की नाराज़गी झेलनी पड़ सकती है.

- नंबर दो.
पाकिस्तान इस वक़्त भारी आर्थिक संकट में है. IMF और वर्ल्ड बैंक से कर्ज़ा लेना पड़ रहा है. इसमें ना सिर्फ़ ज्यादा ब्याज़ चुकाना पड़ता है, बल्कि उनके नियम भी मानने पड़ते हैं. इसके बरक्स सऊदी अरब ने हमेशा से उदार दानदाता की भूमिका निभाई है. पाकिस्तान में कई प्रोजेक्ट्स उसके पैसों से बने हैं. हाल के दिनों में भी उसने अरबों डॉलर की मदद दी है. सरकार को उम्मीद थी कि MBS के आने से और पैसा आएगा. और, सऊदी अरब के बाकी पड़ोसी भी पाकिस्तान में निवेश करेंगे.

ये तो थी पाकिस्तान की उम्मीद. असल में क्या हुआ?

- 09 सितंबर को MBS भारत आए. G20 समिट में हिस्सा लिया. सऊदी अरब G20 का स्थायी सदस्य है.

- उसी रोज़ ग्लोबल बायोफ़्यूल अलायंस (GBA) लॉन्च किया गया. और, इंडिया मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर पर सहमति बनी. सऊदी अरब दोनों का हिस्सा बना.

- 10 सितंबर को G20 समिट खत्म हो गई. अधिकतर देशों के नेता वापस लौट गए. मगर MBS रुके रहे. 11 सितंबर को उनका राजकीय दौरा शुरू हुआ. ये MBS की भारत की दूसरी राजकीय यात्रा थी. इससे पहले वो फ़रवरी 2019 में स्टेट विजिट पर आए थे.

इस बार के दौरे में स्ट्रैटजिक पार्टनरशिप काउंसिल (SPC) की पहली बैठक हुई. SPC की स्थापना 2019 में हुई थी. इसके तहत एक हाई-लेवल काउंसिल आपसी संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में काम करती है. सऊदी अरब ने ये व्यवस्था भारत के अलावा सिर्फ अमेरिका, रूस और चीन के साथ लागू की है.

- बैठक में और भी कई अहम प्रोजेक्ट्स पर दस्तखत हुए और आगे की योजना बनाई गई. दोनों पक्षों ने बातचीत को सफल बताया. कहा कि संबंध और बेहतर बनाए जाएंगे.

स्टेट विजिट के बाद MBS अपने डेलिगेशन के साथ भारत से निकले. चर्चा थी कि उनका प्लेन अब पाकिस्तान में उतरेगा. मगर ऐसा नहीं हुआ. प्लेन सीधा सऊदी अरब चला गया. इसने सबको हैरान कर दिया. आमतौर पर सऊदी अरब के नेता अगर भारत आते हैं तो पाकिस्तान भी जाते हैं. या, अगर पाकिस्तान जाएं तो भारत आते हैं. इस बार परंपरा उलटी पड़ गई.

ये तो हुई हाल की बात. अब एक नज़र दोनों देशों के संबंधों के इतिहास पर.

सऊदी अरब और पाकिस्तान में काफी अंतर हैं. मसलन, दोनों की सीमा एक साथ नहीं लगती. उनके बीच तकरीबन ढाई हज़ार किलोमीटर का फासला है. सऊदी अरब में राजशाही चलती है, जबकि पाकिस्तान इस्लामी गणतंत्र है. सऊदी अरब कच्चे तेल के सबसे बड़े उत्पादकों में गिना जाता है. पाकिस्तान में अभी तक ऐसा कोई भंडार मिला नहीं है. जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय के मामले में ज़मीन-आसमान का फर्क़ है.

इसके बावजूद दोनों देश करीब कैसे आए?

दरअसल, अंतर के बरक्स कई समानताएं भी हैं.

जैसे, दोनों की बुनियाद में इस्लाम है. दोनों ही जगहों पर सुन्नी मुस्लिमों का वर्चस्व है. इस्लाम के दो सबसे पवित्र स्थल मक्का और मदीना, सऊदी अरब में ही हैं. ये कनेक्शन दोनों देशों के लोगों को आपस में जोड़ते हैं.

अब टाइमलाइन जान लीजिए.

इतिहासकारों के मुताबिक, संबंधों की शुरुआत 1940 में हो चुकी थी. तब मोहम्मद अली जिन्ना की ‘ऑल इंडिया मुस्लिम लीग’ मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की मांग कर रही थी. उसी बरस सऊदी अरब के तत्कालीन राजा अब्दुल अज़ीज़ ने अपना डेलिगेशन कराची भेजा. उन्होंने जिन्ना से मुलाक़ात की और पाकिस्तान बनाने का समर्थन किया. अगस्त 1947 में भारत का विभाजन हो गया. पाकिस्तान नए मुल्क के तौर पर सामने आया. सऊदी अरब उसके साथ डिप्लोमैटिक संबंध स्थापित करने वाले शुरुआती देशों में से था. 1951 में मैत्री संधि हुई.

1965 में भारत-पाक युद्ध में सऊदी अरब ने पाकिस्तान की मदद की. 1971 के युद्ध में भी सऊदी ने भारत का विरोध किया. जबकि पाकिस्तान की हर तरह से मदद की.

इससे पहले ही हज़ारों पाक सैनिकों को सुरक्षा देने के लिए सऊदी अरब भेजा जा चुका था. 1969 में यमन ने हमला किया तो पाकिस्तानी पायलटों ने ही मोर्चा संभाला था.
1979 में आतंकियों ने मक्का में पुरानी मस्जिद पर कब्ज़ा कर लिया. तब पाकिस्तान ने मदद के लिए अपनी स्पेशल फ़ोर्स भेजी थी.

1979 में सोवियत-अफ़ग़ान वॉर हुआ. सऊदी अरब ने मुजाहिदीनों को पैसा दिया. पाकिस्तान को को-ऑर्डिनेशन की ज़िम्मेदारी मिली.

फिर 1980 में इराक़-ईरान युद्ध शुरू हुआ. नक्शा देखेंगे तो पता चलेगा कि, इराक़ की दक्षिणी सीमा सऊदी अरब से लगती है. जबकि ईरान और सऊदी के बीच में सिर्फ पर्शिया की खाड़ी है. इस युद्ध से सऊदी अरब को ख़तरा महसूस हुआ. फिर पाकिस्तान ने 15 हज़ार से अधिक सैनिक भेजे थे. युद्ध खत्म होने के बाद भी कुछ को वहीं रखा गया. ये सैनिक सऊदी अरब की सेना को ट्रेनिंग देने में जुट गए. मौजूदा समय में भी पाकिस्तानी सैनिक सऊदी अरब में तैनात हैं.

खैर, 1990 में दोनों देशों के रिश्तों में थोड़ी खटास आई. उस बरस इराक़ ने कुवैत पर हमला किया था. पाक आर्मी के तत्कालीन चीफ़ मिर्ज़ा असलम बेग़ ने सद्दाम को सपोर्ट किया. जबकि सऊदी अरब सद्दाम हुसैन के ख़िलाफ़ था. हालांकि, ये मनमुटाव जल्दी ही मिट गया.

1996 में तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा कर लिया. इस सरकार को सिर्फ तीन देशों ने मान्यता दी थी. यूएई, पाकिस्तान और सऊदी अरब.

सोवियत-अफ़गान वॉर के दौरान लड़ने मुजाहिदीन  

1998 में पाकिस्तान ने पहला परमाणु परीक्षण किया. सऊदी उसके साथ खड़े होने वाले चुनिंदा देशों में था. उसने बाकायदा बधाई दी थी. जब पश्चिमी देशों ने प्रतिबंध लगाए, तब कम कीमत पर तेल देने का भरोसा भी दिया. रिपोर्ट्स तो ये भी हैं कि पाकिस्तान के न्युक्लियर प्रोग्राम का पैसा सऊदी अरब ने ही दिया था. लंबे समय तक सऊदी अरब, पाकिस्तान के हथियारों का सबसे बड़ा खरीदार भी था.

फिर आया 1999 का साल. पाकिस्तान में तख़्तापलट हुआ. आर्मी चीफ़ परवेज़ मुशर्रफ़ ने प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को कुर्सी से उतार दिया. नज़रबंद कर दिया. कुछ समय बाद पूरे शरीफ़ परिवार को निर्वासन में भेज दिया गया. कहां भेजा गया? सऊदी अरब. वहां शरीफ़ फ़ैमिली का बिजनेस हैं. अरबों की संपत्ति है. आज के समय में मिलिटरी एस्टैब्लिशमेंट के बाद सबसे ज्यादा नवाज़ शरीफ़ की ही चलती है.

1999 के बाद एक बड़ा वाकया 2006 में हुआ. जब सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ पाकिस्तान के दौरे पर आए. उन्हें एयरपोर्ट पर रिसीव करने तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल परवेज़ मुशर्रफ़, प्रधानमंत्री शौक़त अज़ीज़, विपक्ष के नेता मौलाना फज़लुर रहमान, चारों प्रांतों के मुख्यमंत्री और तीनों सेनाओं के मुखिया इकट्ठा हुए थे.
पाकिस्तान में सऊदी के शासकों को सम्मान की नज़र से देखा जाता है. फ़रवरी 2019 में जब MBS गए थे तो सरकार ने छुट्टी घोषित कर दी थी. पाकिस्तान का फ़ैसलाबाद शहर पहले ल्यालपुर के नाम से जाना जाता था. सऊदी अरब के किंग फ़ैसल की याद में इसका नाम फ़ैसलाबाद किया गया. पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद की मशहूर फ़ैसल मस्जिद भी उन्हीं के नाम पर है.

ये तो हुई मधुर संबंधों वाली बात.
तल्खी कहां आई.
हालिया समय में दो उदाहरण सामने आते हैं.

- पहला 2015 का है. जब सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों पर हमले किए, तब उन्होंने पाकिस्तान को भी सेना भेजने के लिए कहा था. मगर पाकिस्तान ने मना कर दिया. बाद में उन्होंने भेजा ज़रूर, लेकिन कहा कि ये सैनिक बॉर्डर पार नहीं करेंगे.

- दूसरा उदाहरण 2020 का है.
अगस्त 2019 में भारत ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्ज़ा हटा लिया. मगर ना तो सऊदी अरब और ना ही OIC ने कड़ी आलोचना की. OIC का फ़ुल फ़ॉर्म है, ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कंट्रीज़. ये 1969 में बना था. 57 मुस्लिम-बहुल देशों का संगठन है. सऊदी अरब में इसका मुख्यालय है. पाकिस्तान और सऊदी अरब इसके संस्थापक सदस्यों में से हैं. अगस्त 2020 में पाकिस्तान के तत्कालीन विदेश मंत्री शाह महमूद क़ुरैशी ने खुले तौर पर OIC की आलोचना की. कहा कि हम अलग से मीटिंग बुला लेंगे. इससे सऊदी अरब भी गुस्सा हुआ. उसने कर्ज़ा लौटाने तक के लिए कह दिया.

इसके फौरन बाद फौज़ ने एक डेलिगेशन सऊदी अरब भेजा. क़ुरैशी को भी अपना लहजा नर्म करना पड़ा. वो OIC की तारीफ़ करने लगे. मई 2021 में तत्कालीन पीएम इमरान ख़ान सऊदी अरब गए. तब जाकर संबंध पटरी पर आ सके थे.

हाल के आर्थिक संकट में भी सऊदी अरब ने पाकिस्तान की काफी मदद की है. हालांकि, उसने ना तो कश्मीर पर अपना रुख बदला है. और, ना ही क्राउन प्रिंस या किंग ने पाकिस्तान का दौरा ही किया है. जबकि भारत में उनका दौरा भी हुआ है. और, इस बीच में व्यापारिक रिश्ते भी बेहतर हुए हैं.

इस चैप्टर को यहीं पर विराम देते हैं. अब आगे चलते हैं.

चैप्टर नंबर दो - द रिटर्न ऑफ़ नवाज़ शरीफ़.

पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की वापसी की तारीख़ पता चल गई है. उनके भाई और पूर्व पीएम शहबाज़ शरीफ़ ने कहा कि नवाज़ 21 अक्टूबर को पाकिस्तान आ रहे हैं.
12 सितंबर को इसका ऐलान लंदन में किया गया. लंदन में क्यों? क्योंकि 2019 में पाकिस्तान छोड़ने के बाद से नवाज़ लंदन में ही रह रहे हैं.
उन्होंने पाकिस्तान क्यों छोड़ा था?
दरअसल, 2016 में पनामा पेपर्स लीक में नवाज़ शरीफ़ का नाम आया. आरोप लगे कि उन्होंने मनी-लॉन्ड्रिंग के ज़रिए विदेश में संपत्ति खरीदी और उसकी जानकारी छिपाई. लीक के टाइम नवाज़ प्रधानमंत्री थे. 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा. 2018 में भ्रष्टाचार के मामले में 10 बरस की सज़ा सुनाई गई. नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल ग्राउंड पर 06 हफ़्ते की बेल दी. नवाज़ इलाज कराने लंदन गए. फिर वापस ही नहीं लौटे.

इस बीच क्या-क्या हुआ?

जब लंदन गए थे, तब इमरान ख़ान की सरकार थी. अप्रैल 2022 में उनकी पार्टी इमरान के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आई. उन्हें बिलावल भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (PPP) का साथ मिला. इमरान की सरकार गिर गई. नवाज़ के छोटे भाई शहबाज़ प्रधानमंत्री बन गए. सरकार की कमान तो शहबाज़ के पास थी, मगर असली डोर नवाज़ के हाथों से बंधी थी. जब भी कोई बड़ा फ़ैसला लेना होता था, पूरी कैबिनेट उड़कर नवाज़ के बंगले पर जाती थी. वहां जो डिसाइड होता था, वही ऐलान किया जाता था. कई लोगों ने कहा भी कि पाकिस्तान की सरकार इस्लामाबाद से नहीं, बल्कि लंदन से चल रही है. हालांकि, ताक़तवर भूमिका में होने के बावजूद नवाज़ वापस नहीं लौटे. कहा गया कि उन्हें गिरफ़्तारी का डर सता रहा है. लंदन में रहते हुए उन्होंने मिलिटरी एस्टैब्लिशमेंट की भी आलोचना की थी. ये भी उनके ख़िलाफ़ जा सकती थी.

फिर 09 अगस्त 2023 की तारीख़ आई. शहबाज़ शरीफ़ ने नेशनल असेंबली भंग कर दी. कार्यवाहक सरकार बिठाई गई. अनवारुल हक़ काकड़ को ऐक्टिंग पीएम बनाया गया. उनकी निगरानी में अगला आम चुनाव होना है. ये फ़ैसला भी नवाज़ की सहमति के बाद ही लिया गया था.

अब नवाज़ ने ख़ुद वापस लौटने का फ़ैसला किया है. वो पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं. सबसे बड़े विरोधी इमरान ख़ान जेल में हैं. अगर नवाज़ चुनाव लड़ते हैं तो प्रधानमंत्री पद पर सबसे अधिक दावेदारी उनकी ही होगी. लेकिन उनकी सज़ा का क्या होगा? ये देखना बड़ा दिलचस्प होगा.

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