लेकिन देखो हर पांचवें सेकंड पर इसी पृथ्वी पर जन्म लेता है एक और बच्चा और इसीभाषा में भरता है किलकारी और कहता है, 'मां' भाषा में किलकारी भरने आज से 64 बरसपहले एक अनंत प्रकाश का उदय हुआ. कवि, कहानीकार उदय प्रकाश का जन्म हुआ. कलबुर्गीकी हत्या के विरोध में सबसे पहले साहित्य अकादमी पुरस्कार लौटाने वाले उदय. कहा- अबचुप रहने का और मुंह सिलकर सुरक्षित कहीं छिप जाने का वक्त नहीं है. वरना खतरे बढ़जाएंगे. उदय अपनी कहानियों के लिए जाने जाते हैं. उपरांत और मोहनदास कहानियों परफिल्में भी बन चुकी हैं. उदय की कहानियों को कई इंटरनेशनल अवॉर्ड भी मिल चुके हैं.ये कहानियां वाणी प्रकाशन ने छापी हैं. क्योंकि आज उदय प्रकाश का बर्थडे है तो हमआपके लिए लाए हैं उनकी मशहूर कहानी- नेलकटर. और कहानी के बाद उदय प्रकाश की कहानी'राम सजीवन की प्रेम कथा' पर देखिए रंगरेज थियेटर की पेशकश. पर पहले 'नेलकटर'कहानी: नेलकटरसावन में घास और वनस्पतियों के हरे रंग में हल्का अंधेरा-सा घुला होता है. हवा भारीहोती है और तरल. वर्षा के रवे पर्तों में तैरते हैं. मैं नौ साल का था. इसी महीनेराखी बंधती है. कजलैयां होती है. नागपंचमी में गोबर की सात बहनें बनाई जाती हैं.धान की लाई और दूध दोने में भरकर हम सांपों की बांबियां खोजते फिरते हैं. हरियरीअमावस भी इसी महीने होती है. मैं बांस की खूब ऊंची जेंड़ी बनाकर उस पर चढ़कर दौड़ताथा. मेरी ऊंचाई कम से कम बारह फुट की हो जाती होगी. मां दक्षिण की ओर के कमरे मेंरहती थीं. बम्बई के टाटा मेमोरियल अस्पताल से उन्हें ले आया गया था. सिर्फ अनार कारस पीती थीं. वे बोलने के लिए अपने गले में डॉक्टरों द्वारा बनाई गई छेद में उंगलीरख लेती थीं. वहां एक ट्यूब लगी थी. उसी ट्यूब से वे सांस लेती थीं. बहुत बारीक,ठंडी और कमज़ोर आवाज़ होती थी वह. कुछ-कुछ यंत्रों जैसी आवाज़. जैसे बहुत धीमेवाल्यूम में कोई रेडियो तब बोलता है जब बाहर खूब ज़ोरों की बारिश हो रही हो औरबिजलियां पैदा हो रही हों, या तब जब सुई किन्हीं बहुत दूर के दो स्टेशनों के बीचकहीं अटक गई हो. मां को बोलने में दर्द बहुत होता होगा. इसलिए कम ही बोलती थीं. उसयंत्र जैसी आवाज़ में हम मां की पुरानी अपनी आवाज़ खोजने की कोशिश करते. कभी-कभी उसअसली और मां जैसी आवाज़ का कोई एक अंश हमें सुनाई पड़ जाता. तब मां हमें मिलती, जोहमारी छोटी-सी समृति में होती थी. लेकिन मां सुनना सब कुछ चाहती थीं. सब कुछ. हमबोलते, लड़ते, चिल्लाते या किसी को पुकारते तो व्याकुलता से वे सुनतीं. हमारे शब्दउन्हें राहत देते होंगे. उनकी सिर्फ आंखें बची थीं, जिन्हें देखकर मुझे उम्मीदबंधती थी कि मां कहीं जाएगी नहीं मेरे पूरे जीवन भर रही आएंगी. मैं हमेशा के लिएउनकी उपस्थिति चाहता था. चाहे वे चित्र की तरह या मूर्ति की तरह ही रही आयें. और नबोलें. लेकिन उनके जीवित होने का विश्वास भी रहा आये, जैसा कि चित्रों के साथ नहींहोता. मैं कभी-कभी बहुत डर जाता था और रोता था. अपने जीवन में अचानक मुझे कोई एकबहुत खाली-बिल्कुल खाली जगह दिख जाती थी. यह बहुत डरावना होता था. उस दिन मां नेमुझे बुलाया. बाहर मैदान में घास का रंग गहरा हरा था. बादल बहुत थे और हवा में भारथा. वह भीगी हुई थी. मां ने अपनी हथेली मेरे सामने फैला दी. दायें हाथ की सबसे छोटीउंगली की बगलवाली ऊंगली का नाखून एक जगह से उखड़ गया था. उससे उन्हें बेचैनी होतीरही होगी. इस उंगली को सूर्य की उंगली कहते हैं. मैं समझ गया और नेलकटर लाकर मां कीपलंग के नीचे फर्श पर बैठ गया. नेलकटर में लगी रेती से मुझे उनकी उंगली का नाखूनघिसकर बराबर करना था. मां यही चाहती थीं. वह नेलकटर पिताजी इलाहाबाद से लाए थे,कुंभ के मेले से लौटने पर, दो साल पहले. नेलटकर में नीले कांच का एक सितार बना था.मां की उंगलियां बहुत पतली हो गई थीं उनमें रक्त नहीं था. पीली-सी त्वचा. पतंगीकागज़ जैसी. पीली भी नहीं, ज़र्द. और बेहद ठंडी. ऐसा ठंडापन दूसरी, बेजान चीज़ोंमें होता है. कुर्सियों, मेज़ों, किवाड़ों या साइकिल के हैडिल जैसा ठंडापन. और हाथउनका इतना हल्का कैसे हो गया था ? कहां चला गया सारा वज़न ? वह भार शायद जीवन होताहै, जिसे पृथ्वी अपने चुबंक से अपनी ओर खींचा करती है. जो अब मां के पास बहुत कमबचा था. उन्हें पृथ्वी खींचना छोड़ रही थी. मैंने उसकी हथेली थाम रखी थी. और नाखूनको रेती से धीरे-धीरे घिस रहा था. मैं उनके नाखून को बहुत सुन्दर, ताज़ा और चिकनाबना डालना चाहता था. मैं एक बार हंसा. फिर मुस्कराता ही रहा. मां को ढांढस बंधानेऔर उन्हें खुश करने का यह मेरा तरीका था. मैंने देखा, मां को नाखून का हल्का-हल्कारेती से घिसा जाना बहुत अच्छा लग रहा है. उसके चेहरे पर एक सुख था, जो एक जगह नहींबल्कि पूरे शरीर की शान्ति में फैला हुआ था, उन्होंने आंखें मूंद रखी थीं. एक घंटालगा. मैंने उनकी एक उगली ही नहीं, सारी उंगलियों के नाखून खूब अच्छे कर दिये. मांने अपनी उंगलियां देखीं. यह कितना कमजोर और हार का क्षण होता है, जब नाखून जीवन काविश्वास देते हैं. कितने सुदंर और चिकने नाखून हो गये थे. मां ने मेरे बालों कोछुआ. वे कुछ बोलना चाहती थीं. लेकिन मैंने रोक दिया. वे बोलतीं तो पूछतीं कि मैंसिर से क्यों नहीं नहाता? बालों में साबुन क्यों नहीं लगाता? इतनी धूल क्यों है? औरकंघी क्यों नहीं कर रखी है? रात में ठंड थी. बाहर पानी ज़ोरो से गिर रहा था. सावनमें रात की बारिश की अपनी एक गम्भीर आवाज़ होती है. कुछ-कुछ उस तरह जैसे दुनियां कीसारी हवाएं किसी बड़े से घडे़ के अन्दर घूमने लग गयी हों. हर तरफ से बन्द. सुबहपांच बजे आंगन में पांच औरतें रो रही थीं. यह रोना नहीं था, विलाप था, पता चला मांरात में नींद में ही खत्म हो गयीं. मां खत्म हो गयीं. मैंने फिर कभी उनके घिसे हुएनाखून नहीं देखे. मैंने उस रात सोने से पहले अपने तकिए के नीचे वह नेलकटर रख दियाथा. उसे मैंने बहुत खोजा. बल्कि आज तक. कई वर्षों बाद भी. लेकिन वह आज भी नहींमिला. वह पता नहीं कहां खो गया था. हो सकता है वह किसी बहुत ही आसान-सी जगह पर रखाहुआ हो और सिर्फ़ मेरे भूल जाने के कारण वह मिल नहीं पा रहा हो. मैं अक्सर उसेखोजने लगता हूं. क्योंकि चीज़े कभी खोती नहीं हैं वे तो रहती ही हैं. अपने पूरेअस्तित्व और वज़न के साथ. सिर्फ़ हम उनकी वह जगह भूल जाते हैं.देखिए: राम सजीवन की प्रेम कथाhttps://www.youtube.com/watch?v=gwlthYIAz6shttps://www.youtube.com/watch?v=IgSNCvnAONQhttps://www.youtube.com/watch?v=OQX2t-r_1w8