मध्य-एशिया के एक देश में कुछ उलटा हो रहा है. इस देश का नाम है, कज़ाख़िस्तान.यहां नए साल की शुरुआत में ही हालात बिगड़ने लगे हैं. जनता सरकार के ख़िलाफ़ सड़कोंपर है. प्रोटेस्ट के चलते पूरी कैबिनेट को इस्तीफ़ा देना पड़ा है. कई शहरों मेंइमरजेंसी लगा दी गई है. बुनियादी मांगें मान लिए जाने के बाद भी लोग पीछे हटने कोतैयार नहीं हैं. प्रदर्शनकारी अब बड़ा निशाना लगाने की तैयारी कर रहे हैं. ये बड़ानिशाना क्या है? कज़ाकिस्तान की पूरी कहानी क्या है? हालिया प्रोटेस्ट को अपवादक्यों कहा जा रहा है? और, इससे कज़ाख़िस्तान में क्या कुछ बदल जाएगा? आज की कहानीसुनाने से पहले इतिहास समझ लेते हैं. चीन के शिनजियांग प्रांत का नाम तो आपने सुनाही होगा! वही प्रांत, जहां उइग़र मुसलमानों के नरसंहार की ख़बरें अक्सर चर्चा मेंरहतीं है.कज़ाकिस्तान की पूर्वी सीमा शिनजियांग से सटी हुई है. उत्तर की तरफ़ रूसहै.कज़ाकिस्तान एक समय तक चीन और रूसी साम्राज्य का हिस्सा रह चुका है. इस वजह सेदोनों देश समय-समय पर कज़ाकिस्तान को अपना हिस्सा बनाने की बात करते रहते हैं. इसइलाके से चीन का पहला संपर्क दूसरी शताब्दी ईसापूर्व में हो चुका था. आठवीं सदी मेंअरब आक्रमणकारी अपने साथ इस्लाम धर्म लेकर आए. 13वीं सदी की शुरुआत में मंगोलों काकहर चरम पर था. चंगेज़ ख़ां की सेना समूचे मध्य एशिया पर क़ब्ज़ा कर चुकी थी. इसलहर की चपेट में कज़ाख़िस्तान भी आया. आठवीं सदी में आए अरबी कबीलों और 13वीं सदीके मंगोलों के मिश्रण से एक नई जाति ने आकार लिया. इन्हें कज़ाख़ कहा गया. 15वींसदी में कज़ाख़ सल्तनत की स्थापना हुई. उसके बाद से वे अपना अलग शासन चलाने लगे.कुछ समय बाद कज़ाख़ तीन अलग-अलग कबीलों में बंट गए. फिर उन्हें मंगोलों से ख़तरालगा. उन्होंने सोचा कि मंगोलों की बर्बरता से बचना है तो किसी शक्तिशाली का दामनथाम लो. उन्होंने रूस से मदद मांगी. रूस ने कहा, इट्स ओके. अब तुम हमारे भाई हुए.इस तरह कज़ाख़िस्तान रूसी साम्राज्य का हिस्सा बन गया. रूसी साम्राज्य कोई दूध काधुला तो था नहीं. उसने भी कज़ाख़िस्तान का इस्तेमाल ग़ुलाम की तरह किया. इससेनाराज़ कबीलों ने रूसी ज़ारशाही के ख़िलाफ़ विद्रोह कर दिया. रूस ने विद्रोह कोकुचल दिया. कबीले के सुल्तानों को गद्दी से उतारकर अपना गवर्नर बिठा दिया. रूस अबकज़ाख़िस्तान में जो चाहे कर सकता था. उसने हज़ारों की संख्या में रूसी और यूक्रेनीकिसानों कोकज़ाकिस्तान में बसने के लिए भेजा. ये प्रोसेस 1916 तक चला. फिर 25 जून1916 की तारीख़ आई. इस दिन ज़ार की तरफ़ से एक आदेश जारी हुआ. इसके तहत, रूसीसाम्राज्य के अधीन वाले इलाकों के युवाओं को फौज में काम करना अनिवार्य कर दियागया. इस आदेश से पहले तक गैर-रूसी लोगों को छूट मिली हुई थी. 1916 तक पहलाविश्वयुद्ध अपने चरम पर पहुंच चुका था. इसमें रूस भी लड़ रहा था. उसे जानमाल काभारी नुकसान उठाना पड़ा था. इसी वजह से वो नए लोगों को भर्ती करने की फ़िराक़ मेंथा. इसलिए, गैर-रूसी लोगों को सेना में भर्ती होने के लिए कहा गया था. लेकिन लोगइसके लिए तैयार नहीं थे. उन्होंने विरोध किया. रूस ने दमन का रास्ता चुना. इसनरसंहार में दो से तीन लाख लोग मारे गए. लाखों लोग भागकर चीन और अफ़ग़ानिस्तान आगए. आज भी उनके वंशज इन देशों में रहते हैं. मध्य एशिया में नरसंहार चल ही रहा थाकि क्रांति हो गई. रूस में बोल्शेविकों ने ज़ारशाही का अंत कर दिया. नई बोल्शेविकसरकार युद्ध के पक्ष में नहीं थी. नवंबर 1917 में लेनिन ने शांति समझौते पर दस्तख़तकिया. इस तरह रूस ने फ़र्स्ट वर्ल्ड वॉर से अपना नाम वापस ले लिया. रूस के अंदरसत्ता परिवर्तन हुआ था. वहां सब अस्त-व्यस्त चल रहा था. कज़ाख़ नेताओं ने इसकाफायदा उठाने का प्लान बनाया. उन्होंने रूस से आज़ादी का ऐलान कर दिया. ये आज़ादीलंबे समय तक टिकने वाली नहीं थी. दो साल बाद ही लेनिन की रेड आर्मी ने धावा बोलदिया. कज़ाख़ नेताओं ने सरेंडर कर दिया. इसके बाद कज़ाकिस्तान को सोवियत संघ मेंशामिल कर लिया गया. जब तक सोवियत संघ का शासन चला, तब तक कज़ाकिस्तान उनकीप्रयोगशाला बना रहा. उसने इसकी भारी कीमत भी चुकाई. 1924 में जोसेफ़ स्टालिन सोवियतसंघ का नया शासक बना. वो सामूहिक खेती वाला सिस्टम लेकर आया. किसानों खेतिहर मज़दूरबनकर रह गए. स्टालिन की ये योजना बुरी तरह फ़ेल हुई.कज़ाकिस्तान में दस लाख से अधिकलोग भुखमरी के कारण मारे गए. सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद महाशक्तियों के बीच परमाणुहथियारों की रेस शुरू हुई. सोवियत संघ ने अपना पहला परमाणु परीक्षण कज़ाकिस्तान मेंकिया. सोवियत संघ का पहला मानवयुक्त अंतरिक्षयान भी कज़ाकिस्तान से ही लॉन्च हुआथा. मार्च 1953 में स्टालिन की मौत हो गई. निकिता ख्रुश्चेव कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़सोवियत यूनियन के सेक्रेटरी बने. उन्होंने वर्जिन लैंड्स कैंपेन शुरू किया.ख्रुश्चेव सोवियत संघ में फसल की उपज बढ़ाना चाहते थे. इसके लिए खेती लायक ज़मीन कीदरकार थी. कज़ाख़िस्तान में ज़मीन पर्याप्त थी. कमी थी तो किसानों की. तब 20 लाखरूसी किसानों को कज़ाख़िस्तान में बसाया गया. ख्रुश्चेव का अभियान सफ़ल रहा यानहीं, इसको लेकर अलग बहस चलती है. लेकिन बसाहट से हुआ ये कि मूल कज़ाख़ अल्पसंख्यकहो गए. ये देखकर सोवियत संघ ने एक और एक्सपेरिमेंट किया. 1985 में मिखाइल गोर्बोचोवसोवियत संघ की गद्दी पर बैठे. उन्होंने गेनेडी कोल्बिन को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़कज़ाकिस्तान (CPK) का मुखिया बना दिया. कोल्बिन रूसी मूल के थे. कज़ाख़ इससे नाराज़हो गए. उन्होंने अल्माटी में भयानक प्रोटेस्ट किया. कोल्बिन कभी आराम से शासन नहींचला पाए. 1989 आते-आते सोवियत संघ की नियति तय हो चुकी थी. सोवियत संघअफ़ग़ानिस्तान से हारकर लौट रहा था. संघ में शामिल देशों में अलग होने की होड़ मचीहुई थी. ऐसे ही दौर में नूर सुल्तान नज़रबायेव CPK के नए मुखिया बनते हैं. दिसंबर1991 में राष्ट्रपति चुनावों की घोषणा होती है. नज़रबायेव निर्विरोध चुनाव जीत लेतेहैं. इसी के साथ कज़ाकिस्तान सोवियत संघ से आज़ाद हो जाता है. कज़ाकिस्तान सोवियतसंघ से तो आज़ाद हो गया था, लेकिन अपनी नियति से नहीं. नज़रबायेव के शासन मेंकज़ाकिस्तान ने ख़ूब पैसे कमाए. तेल और गैस का उत्पादन बढ़ा. तेल का निर्यात शुरूहुआ. समझ लीजिए कि तरक्की की बारिश हो रही थी. लेकिन इस बारिश पर हक कुछ ही लोगोंका रहा. ये लोग नज़रबायेव के करीबी हैं. आम जनता की किस्मत वैसी की वैसी ही रही.कुएं से निकलने के बाद वे खाई में गिर पड़े थे. नज़रबायेव ने विपक्ष को पिंजड़े मेंबंद रखा था. विरोध की इजाज़त नहीं थी. मीडिया पर सरकार का नियंत्रण रहा. चुनावोंमें जमकर धांधली की गई. नज़रबायेव ने आजीवन सत्ता में रहने के लिए संविधान तक बदलदिया. कज़ाख़िस्तान की नई पीढ़ी ने नज़रबायेव के अलावा किसी को देखा ही नहीं था.फिर मार्च 2019 में एक अचंभा हुआ. नज़रबायेव ने राष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया.इस मौके पर उन्होंने कहा कि मैं नई पीढ़ी के नेताओं को मौका देना चाहता हूं.हालांकि, इस्तीफ़ा देने के बावजूद नज़रबायेव ने सत्ता पर से नियंत्रण नहीं छोड़ाथा. वो लीडर ऑफ़ द नेशन बने रहे. उन्होंने अपनी जगह पर एक कठपुतली राष्ट्रपतिनियुक्त किया. कासिम जोमार्त तोकायेव. उससे पहले तक तोकायेव संसद के ऊपरी सदन मेंस्पीकर के तौर पर काम कर रहे थे. कज़ाकिस्तान में भले ही सत्ता बदली थी, लेकिनशक्ति नज़रबायेव के पास कायम रही. तोकायेव उन्हीं के इशारों पर चलते रहे. आज हमकज़ाख़िस्तान की कहानी क्यों सुना रहे हैं? दरअसल, कज़ाकिस्तान में भारीविरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं. एक जनवरी 2022 को सरकार ने एलपीजी की कीमतों पर लगा कैपहटा दिया. इसके बाद गैस के दाम अचानक से बढ़ने लगे. कज़ाकिस्तान में 70 फीसदी सेअधिक गाड़ियां एलपीजी पर चलतीं है. प्रोटेस्ट सबसे पहले झेनोज़ेन प्रांत में शुरूहुआ. इसी जगह पर 2011 में भी एक प्रोटेस्ट हुआ था. उस समय तेल कंपनी में काम करनेवाले मज़दूर वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल पर बैठ गए थे. पुलिस ने उस बारप्रदर्शन को कुचल दिया था. सरकारी आंकड़ों के अनुसार, इस घटना में 16 मज़दूर पुलिसकी गोली का शिकार बने थे. स्वतंत्र रिपोर्ट्स में दावा किया जाता है कि ये संख्याकई गुणा अधिक थी. पिछली बार का प्रोटेस्ट तो दबा दिया गया था. लेकिन इस बार लोगपीछे हटने के मूड में नहीं हैं. प्रोटेस्ट के बीच राष्ट्रपति तोकायेव ने राजधानीनूर सुल्तान समेत तीन शहरों में आपातकाल लगा दिया है. कज़ाकिस्तान के सबसे बड़े शहरअल्माटी और मेंगिस्ताउ में दो हफ़्तों के लिए पाबंदियां लगाईं गई है. इसके तहत, रातके 11 बजे से लेकर सुबह के 05 बजे तक कर्फ़्यू रहेगा. आपातकाल के दौरान लोगों केइकट्ठा होने पर रोक रहेगी. बिना इजाज़त लोगों के कहीं आने-जाने पर भी प्रतिबंधरहेगा. 04 जनवरी की रात तक तोकायेव इस बात पर कायम थे कि सरकार कायम रहेगी. किसी काइस्तीफ़ा नहीं होगा. लेकिन पांच की सुबह होते-होते ख़बर आई कि राष्ट्रपति ने पूरीकैबिनेट को बर्ख़ास्त कर दिया है. प्रधानमंत्री असकार ममीन ने इस्तीफ़े की पेशकश कीथी. जिसे राष्ट्रपति ने स्वीकार भी कर लिया. नई कैबिनेट के गठन तक उप-प्रधानमंत्रीको सरकार की ज़िम्मेदारी सौंपी गई है. तोकायेव ने प्रदर्शनकारियों से शांति बरतनेकी अपील की. उन्होंने कहा कि सभी मांगों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा. नौजवान घरलौट जाएं. अपना और अपने चाहनेवालों का जीवन बर्बाद न होने दें. किसी भी तरह केविरोध को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा. जैसी कि परंपरा रही है, तोकायेव ने भीप्रदर्शनकारियों को विदेशी एजेंट बता दिया. उन्होंने कहा कि ये सब बाहरी ताक़तों कीसाज़िश है. तोकायेव का लहजा सलाह से ज़्यादा धमकी से भरा था. लेकिन लोग इस बार उनकीकोई भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं हैं. वे अब नज़रबायेव को हटाने की मांग करनेलगे हैं. राष्ट्रपति पद छोड़ने के बाद भी नज़रबायेव सरकार के काम-काज में दखल देतेरहते हैं. वो कज़ाकिस्तान की सिक्योरिटी काउंसिल के मुखिया बने हुए हैं. उन्हेंकानूनी कार्रवाई से भी छूट मिली हुई है. सरकार के इस्तीफ़े और आपातकाल के ऐलान केबावजूद बहुत कुछ बदलता नहीं दिख रहा है. प्रदर्शनकारी सरकारी इमारतों पर क़ब्ज़ाकरने लगे हैं. कई जगहों पर आगजनी की ख़बर भी है. धीरे-धीरे प्रोटेस्ट की आंचकज़ाख़िस्तान के सुदूर इलाकों में भी पहुंचने लगी है. दो सौ से अधिक लोगों कोगिरफ़्तार किया जा चुका है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, अभी तक सौ से अधिक लोगघायल हो चुके हैं. घायलों में कई पुलिसवाले भी शामिल हैं. सरकार ने इंटरनेट और सोशलमीडिया ऐप्स पर बैन लगा दिया है. जो कुछ वीडियोज़ और तस्वीरें बाहर आ पा रहीं है,उसमें हालात बेहद गंभीर दिख रहे हैं. कज़ाकिस्तान में रैली आयोजित करने के लिए पहलेसे इजाज़त लेनी होती है. लेकिन इस बार स्थिति पलटी हुई है. लोग सरकारी आदेश केबावजूद पीछे नहीं हट रहे हैं. गैस की कीमतों में वृद्धि तो तात्कालिक वजह है. लोगोंका गुस्सा दशकों से ज़मा हो रहा था. अब घड़ा भर चुका है. भले ही इस प्रोटेस्ट सेकज़ाख़िस्तान में तानाशाही को कोई फर्क ना पड़े, लेकिन इसने बहरी सरकार को ज़ोरदारतमाचा तो ज़रूर जड़ा है. नज़रबायेव को रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का समर्थनमिला हुआ है. इस मामले में रूस ने फिलहाल चुप्पी साध रखी है. लेकिन उसने कहा है किहम स्थिति पर नज़र बनाए हुए हैं.