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जब गुरु दत्त ने अपने बर्थडे पर खुद का आलीशान बंगला गिरवा दिया था

‘साहेब, बीवी और गुलाम’ का ओपनिंग सीन. बहुत सारे मज़दूर बरसों पुरानी हवेली को गिरा रहे होते हैं. कुछ मज़दूर खुदाई भी कर रहे होते हैं. फिर लंच ब्रेक का ऐलान होता है. सारे मज़दूर खाने निकल जाते हैं. अगले सीन में गुरु दत्त की एंट्री होती है. सूट-बूट पहने. हाथ में नक्शा और टोपी लिए. मज़दूरों के जाते ही गुरु दत्त उस वीरान पड़े खंडहर में खो जाते हैं. टूटे मलबों को याद करते हैं, जैसे बरसों पहले यहां आए हो और उस हवेली से उनका जन्मों का नाता हो.

अब सिनेमाई पर्दे से हटकर पीछे चलते हैं. मतलब बहुत पीछे. लगभग 58 साल पहले. बंबई, 1963. बर्लिन फिल्म फेस्टिवल से गुरु दत्त बंबई लौटते हैं. ये उस वक्त की बात है, जब वहीदा जी से उनका रिश्ता खत्म हो चुका था. और काफी उदास रहने लगे थे. हफ़्तों ठीक से सो नहीं पा रहे थे. नींद के लिए भी दवाइयों के आदी हो चुके थे.

गुरु दत्त (Guru Dutt) साब बंबई के पाली हिल में रहा करते थे. पॉश इलाक़ा है. उनका आलीशान बंगला यहीं पर था. वो बंगला सपने जैसा था. लेकिन गुरु दत्त के लिए ये बंगला बुरा सपना साबित हुआ. इस बंगले के बारे में कहा जाता था कि वो भूतिया बंगला था. गुरु दत्त साब की बहन ललिता लाज़मी कहती हैं,

‘गीता को लगता था कि वो बंगला भूतिया था. उस बंगले में एक पेड़ था. एक भूत उस पर रहता था. और वो अपशकुन लाता था. जिसकी वजह से उनकी शादीशुदा ज़िंदगी खराब हो रही थी. बड़े से ड्राइंग रूम में रखे बुद्ध भगवान की मूर्ति से भी गीता को शिकायत थी.’

ये वो दौर भी था, जब पत्नी गीता दत्त से उनकी बन नहीं रही थी. मतलब पर्सनल लाइफ खराब हो रखी थी. और अवसाद ने गुरु दत्त साब को जकड़ रखा था. दो बार गुरुदत्त ने सुसाइड करने की कोशिश भी की थी. और दोनों बार बच भी गए.

तो एक बार की बात है. गुरु दत्त साब अपने एक दोस्त के साथ बैठे बातें कर रहे थे. दोस्त ने गुरु दत्त से पूछा,

‘यार तुम सुसाइड क्यों करना चाहते हो? तुम्हारे पास तो सब कुछ है. धन है, दौलत है, शोहरत है. वो सब कुछ है, जिसका लोग सपना देखते हैं. तो अपनी जिंदगी से इतने असंतुष्ट क्यों?’

गुरु दत्त साब जवाब देते हैं,

‘मैं अपनी ज़िंदगी से असंतुष्ट नहीं हूं. मैं खुद से और खुद में असंतुष्ट हूं. ये बात सच है कि मेरे पास वो सब कुछ है, जिसकी लोग चाहत रखते हैं. लेकिन मेरे पास वो नहीं, जो ज़्यादातर लोगों को हासिल है. एक कोना, जहां मुझे शांति मिल सके. अगर मुझे ये मिल जाता है, तो फिर मेरी ज़िंदगी जीने लायक होगी.’

9 जुलाई 1963. शहर बंबई, पाली हिल. गुरु दत्त साब का हैप्पी बड्डे. लेकिन इस तारीख को गुरु दत्त साब कभी याद नहीं रखना चाहते थे. मिटा देना चाहते थे. सब कुछ भुला देना चाहते थे. और इसकी शुरुआत भी वह कर चुके थे. कुछ मज़दूरों को ऑर्डर देते हैं कि आलीशान बंगले को गिरा दो. तोड़ दो. जमींदोज़ कर दो. और यही होता है.

अब याद करिए ‘साहेब बीवी और गुलाम’ का वो ओपनिंग सीन. जहां गुरु दत्त साब सभी मज़दूरों से उस वीरान बंगले को गिरवा देते हैं. मुझे लगता है कि गुरु दत्त साब की ज़िंदगी ही फिल्म थी. और फिल्म ही ज़िंदगी थी. उनको पढ़ने से ज्यादा उनकी फिल्में देखिए. सबकुछ पता चल जाता है. वो इंसान, जो सबके सामने खुली किताब था. और उन्हें समझना उतना ही मुश्किल.

अगले दिन राइटर बिमल मित्र बंबई आते हैं. और गुरु दत्त साब के नए फ्लैट पर उनसे मिलने जाते हैं. ये किराए का फ्लैट था. और हर किसी की समझ से बाहर कि इस इंसान ने अपना आलीशान बंगला क्यों गिरवा दिया? क्या वजह रही? ऐसा क्यों किया? जब बिमल साब ने गुरु दत्त से पूछा तो उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया.

हाँ, ये ज़रूर कहा कि चलो तुम्हें वहीं लेकर चलते हैं. इसके बाद बिमल मित्र और गुरु दत्त साब पाली हिल जाते हैं. और ज़मींदोज़ हुए बंगले को बड़ी हैरानी से देख रहे होते हैं. गुरु दत्त साब के चेहरे पर एक खामोशी है. चेहरे पर उदासी और आंखों में कुछ खोने का गम. फिर दोनों कार में बैठते हैं और बिमल मित्र फिर पूछते हैं कि ऐसा क्यों किया तुमने? तो गुरु दत्त कहते हैं,

 ‘गीता की वजह से.’

बिमल मित्र हैरानी से फिर पूछते हैं कि इसका क्या मतलब? तो गुरु दत्त साब सिगरेट निकालते हैं. होंठों पर रखते हैं. लाइटर निकालते हैं. जलाकर एक लंबा कश लगाते हुए कहते हैं-

‘घर न होने की तकलीफ से, घर होने की तकलीफ और भयंकर होती है दोस्त..


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