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वाजपेयी के दोस्त सिकंदर बख्त से RSS की क्या खुन्नस थी?

एक नेता जिसकी सियासी जड़ें तो कांग्रेसी थी, लेकिन आगे चलकर जब कांग्रेस ही कांग्रेस नहीं रह सकी, तब वह अटल बिहारी वाजपेयी का दोस्त बन गया, इतना पक्का दोस्त कि जब वह बाकी भाजपा नेताओं की तरह जय श्री राम का नारा लगा रहा था, तब खुद उसे वाजपेयी ने रोक दिया. फिर वह दौर भी आया, जब वाजपेयी ने उसे खुद के बाद नंबर 2 कैबिनेट मंत्री के तौर पर शपथ दिलवाई. और जब उसकी आखिरी बेला आने को हुई, तब भी एक विवाद खड़ा होने लगा कि ‘मृत्यु के बाद उसे दफनाया जाएगा या जलाया जायगा.’

जी हां, पाॅलिटिकल किस्सों में हम आज बात कर रहे हैं सिकंदर बख्त की. वही सिकंदर बख्त जिन्हें भारतीय जनता पार्टी का पहला बड़ा मुस्लिम चेहरा माना जाता था. इतना बड़ा चेहरा कि 90 के दशक में वे संसद में भाजपा के 2 फ्लोर लीडर्स में से एक हुआ करते थे. उस दौर में लोकसभा में भाजपा के फ्लोर लीडर अटल बिहारी वाजपेयी होते थे, जबकि राज्य सभा में यह जिम्मेदारी सिकंदर बख्त के जिम्मे थी.

सिकंदर बख्त खांटी दिल्ली वाले थे. जन्म, पढ़ाई लिखाई, ब्रिटिश काल में सप्लाई डिपार्टमेंट में शुरुआती नौकरी – सब कुछ दिल्ली में. बाद में कांग्रेस ज्वाइन की और म्युनिसिपल काॅर्पोरेशन की नेतागिरी करने लगे. 1952 में MCD का चुनाव भी जीते और अगले 2 दशक तक MCD में कांग्रेस का झंडा बुलंद करते रहे. वह भी उस दौर में जब रिफ्यूजियों की पार्टी कही जाने वाली जनसंघ पहाड़गंज की रिफ्यूजी बस्ती से आगे निकलकर पूरी MCD में अपना पांव पसार रही थी. लेकिन तब भी बख्त खांटी कांग्रेसी बने रहे. हालांकि बाद में उन्होंने कांग्रेस छोड़ी और उसी जनसंघ के लोगों के साथ आए, जो दिल्ली में कांग्रेस की जड़ों में मठ्ठा डाल रही थी. लेकिन इसमें दशक भर का वक्त था और इस बीच में जेल, लोकसभा और कैबिनेट मंत्री का पद भी नसीब होना था. लेकिन ये सब कैसे हुआ? आगे बताते हैं.

सिकंदर बख्त 50 और 60 के दशक में दिल्ली म्युनिसिपल काॅर्पोरेशन (MCD) में कांग्रेस के पार्षद हुआ करते थे.
सिकंदर बख्त 50 और 60 के दशक में दिल्ली म्युनिसिपल काॅर्पोरेशन (MCD) में कांग्रेस के पार्षद हुआ करते थे.

कांग्रेस में महाटूट और बख्त इंदिरा विरोधी खेमे में 

सिकंदर बख्त 40 के दशक में सप्लाई डिपार्टमेंट की अपनी नौकरी छोड़कर कांग्रेस में आए थे. लेकिन तब कांग्रेस सभी विचारधारा के लोगों का एक अंब्रेला ऑर्गनाइजेशन हुआ करती थी. वहां सबकी सुनी जाती थी. एक वाकया बताते हैं, जिससे आप समझ जाएंगे कि कांग्रेस में कितनी इनर डेमोक्रेसी थी.

‘यह 50 के दशक की बात है. उस दौर में कैबिनेट में खूब बहस होती. कई बार प्रधानमंत्री नेहरू की आलोचना भी होती. नेहरू सब सुनते रहते और कई बार आजिज़ आकर अपने इस्तीफे की पेशकश कर देते. उनकी इस पेशकश पर मामला सलट जाता था. ऐसे हीं एक बार नाराज होकर नेहरू ने कैबिनेट की बैठक में कह दिया कि ‘मुझसे इतनी ही प्राॅब्लम है तो मैं इस्तीफा दे देता हूं.’ इसपर संचार मंत्री रफी अहमद किदवई से रहा नहीं गया और उन्होंने तत्काल कह दिया,“हां हां, आप इस्तीफा दे ही दीजिए. मैं सब कुछ संभाल लूंगा और ऐसे संभाल लूंगा कि 6 महीने बाद आपको कोई याद भी नहीं करेगा.” इसके बाद नेहरू ने अपने इस्तीफे की धमकी देना हमेशा के लिए बंद कर दिया.’

इस एक वाकये से आप समझ सकते हैं कि उस दौर में राजनीतिक दलों में अपनी बात रखने की कितनी ज्यादा आजादी थी. कोई किसी का बुरा नहीं मानता था. सिकंदर बख्त ने भी इसी दौर में और इसी माहौल में कांग्रेस ज्वाइन की थी. लेकिन 1969 आते-आते सब कुछ बदल गया. अब इंदिरा गांधी का नया जमाना आ गया था और इस जमाने में राजनीतिक दलों को प्राइवेट लिमिटेड की तरह चलाने की प्रकिया शुरू हो गई थी. इसी दौर में उस परिपाटी ने जन्म लिया, जिसमें किसी आदमी को आलाकमान से अलग राय रखने पर सीधे बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है. 1969 में कांग्रेस में अंदरूनी लड़ाई शुरू हो गई. ओल्ड गार्ड्स वर्सेज यंग तुर्क. और यह लड़ाई अंततः कांग्रेस के महाविभाजन के रूप में सामने आई. इस महाविभाजन में सिकंदर बख्त ओल्ड गार्ड्स के साथ इंदिरा विरोधी खेमे में चले गए. इस खेमे को संगठन कांग्रेस कहा गया.

सिकंदर बख्त ने 1969 के कांग्रेस विभाजन के बाद संगठन कांग्रेस का दामन थाम लिया था.
सिकंदर बख्त ने 1969 के कांग्रेस विभाजन के बाद संगठन कांग्रेस का दामन थाम लिया था.

कैबिनेट मंत्री का पोर्टफोलियो वाया जेल 

सब जानते हैं कि मिड सेवेंटीज आते-आते गुजरात का छात्र आंदोलन, जॉर्ज फ़र्नान्डिस के नेतृत्व वाली रेल हड़ताल और अंत में इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा रायबरेली से इंदिरा गांधी की सांसदी रद्द करने का फैसला. इन सब ने मिलकर परिस्थितियों का एक ऐसा कॉकटेल तैयार कर दिया, जिसमें अपनी सत्ता बचाने के चक्कर में इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोप दी. तमाम विपक्षी नेता और स्टूडेंट्स जेल भेज दिए गए. यूनिवर्सिटी की यूनिवर्सिटी खाली हो गई. इसी दौर में सिकंदर बख्त भी जेल चले गए. और इन सबके जेल जाने के बाद शुरू हुआ संजय गांधी का जबरिया नसबंदी कार्यक्रम. दिल्ली में इस कार्यक्रम का सबसे वीभत्स रूप सामने आया तुर्कमान गेट और पुरानी दिल्ली के इलाकों में, जहां प्रशासन के लोग जबरन नसबंदी करवाने और अपना टार्गेट अचीव करने के चक्कर में मार-पीट पर उतर आते थे.

लेकिन 19 महीने बाद इस सब का अंत हुआ, जब इमरजेंसी में ढील देते हुए चुनाव करवाए गए. इस चुनाव में इंदिरा गांधी का मुकाबला करने के लिए सोशलिस्ट, जनसंघ, स्वतंत्र पार्टी और संगठन कांग्रेस ने मिलकर जनता पार्टी बनाई. कैंडिडेट खोजे जाने लगे. दिल्ली की सीटों में सबसे ज्यादा माथापच्ची चांदनी चौक सीट के कैंडिडेट को लेकर हुई, क्योंकि यहां संजय गांधी के विवादास्पद कार्यक्रमों की जोर-जबरदस्ती बहुत ज्यादा हुई थी. अंत में नाम फाइनल हुआ सिकंदर बख्त का. उनके प्रचार में पहुंचे पड़ोस की नई दिल्ली सीट से चुनाव लड़ रहे अटल बिहारी वाजपेयी. वाजपेयी ने लोगों को विश्वास दिलाते हुए कहा,

 “यदि हमलोग सरकार में आते हैं , तो मेरा भरोसा रखिए. किसी को भी जबरन नसबंदी कराने पर मजबूर नहीं किया जाएगा.”

लोगों ने भी उनका भरोसा किया और सिकंदर बख्त को लोकसभा भेज दिया. लोकसभा पहुंचे सिकंदर बख्त को मोरारजी देसाई ने अपनी कैबिनेट में शामिल कर लिया. उन्हें हाऊसिंग, सप्लाई और रिहैबिलिटेशन मंत्री बनाया गया. यह महकमा उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र की जिम्मेदारी के लिहाज से भी माकूल लगा था. क्योंकि इमरजेंसी के दरम्यान दिल्ली को सुंदर बनाने के नाम पर इसी इलाके के तुर्कमान गेट में तोड़-फोड़ कर हजारों परिवारों को बेघर कर दिया गया था. बतौर मंत्री सिकंदर बख्त ने सबका पुनर्वास करवाया. लेकिन 3 साल बीतते-बीतते ख़ुद सिकंदर बख्त को अपने राजनीतिक पुनर्वास की नौबत आ गई, क्योंकि जनता पार्टी का कुनबा बिखर चुका था.

भाजपा में कैसे आए 

1979 में जनता पार्टी और सरकार के बिखरने के बाद जनसंघ के लोगों में भी अपनी हिंदूवादी राजनीति को बनाए रखने की कसमसाहट शुरू हो गई. और इसी मकसद से 6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी का एक बार फिर विभाजन हो गया. जब जनसंघ के लोगों ने भारतीय जनता पार्टी के नाम से अपनी अलग पार्टी बना ली. अटल बिहारी वाजपेयी को इस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया. वाजपेयी ने भी नई पार्टी की स्थापना बैठक में जनसंघ के ‘हिंदी-हिंदू-हिंदुस्तान’ के नारे की जगह ‘गांधीवादी समाजवाद’ का राग अलाप दिया. नतीजा यह हुआ कि इस नई पार्टी में खांटी कांग्रेसी मिजाज वाले सिकंदर बख्त भी वाजपेयी के बगलगीर नजर आने लगे. उन्हें पार्टी का जनरल सेक्रेटरी बनाया गया. 84 आते-आते बख्त पार्टी के उपाध्यक्ष बना दिए गए. लेकिन 80 के दशक के आखिर में, भाजपा में आडवाणी युग शुरू हो गया और 2 लोकसभा सीटों वाली पार्टी 86 तक पहुंच गई. साल 1990 में सिकंदर बख्त को मध्यप्रदेश से राज्यसभा भेज दिया गया. इस दौर में राज्यसभा में भाजपा के फ्लोर लीडर थे अटल बिहारी वाजपेयी. बख्त को उनका डिप्टी बनाया गया. यानी 13 साल पहले मोरारजी कैबिनेट में शुरू हुआ दोनों का साथ राज्यसभा तक बरकरार था. परस्पर विश्वास और भरोसे का प्रतीक बन चुके दोनों के इस साथ को आगे भी बरकरार रहना था. 1992 में सिकंदर बख्त राज्यसभा में विपक्ष के नेता बन गए.

तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों सर्वश्री चंद्रशेखर, पीवी नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सिकंदर बख्त (अगली पंक्ति में सबसे बाएं).
तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों चंद्रशेखर, पीवी नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सिकंदर बख्त (अगली पंक्ति में सबसे बाएं).

आरएसएस के साथ तनातनी 

सिकंदर बख्त भले ही भाजपा का हिस्सा हो गए थे, लेकिन माना जाता है कि संघ परिवार उनको लेकर बहुत सहज नहीं था. इस मामले में जब हमने संघ और भाजपा पर पैनी नजर रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार और कई किताबों के लेखक विजय त्रिवेदी से बात की तो उन्होंने बताया,

“सिकंदर बख्त हमेशा से वाजपेयी के करीबी रहे. वाजपेयी ही उन्हें पार्टी में लेकर आए और उन्होंने ही उन्हें राज्यसभा में पार्टी का फ्लोर लीडर और मंत्री बनाया. संघ की सिकंदर बख्त से हमेशा खुन्नस रही ,लेकिन तब भी वाजपेयी ने उन्हें पूरा मान-सम्मान दिया और पार्टी में रखा.”

विजय त्रिवेदी की बातों की पुष्टि संघ के मुखपत्र कहे जाने वाले ऑर्गनाइजर के एक पुराने अंक से भी होती है. इस पत्रिका के जून 1952 के अंक में सिकंदर बख्त के बारे में काफी आपत्तिजनक बातें लिखी गई है. इसमें लिखा गया है कि,

“सिकंदर बख्त एक वेश्या का बेटा है. वह पहले मुस्लिम लीग में था और बाद में जब 1947 में विभाजन के बाद दंगे शुरू हुए, तब कांग्रेस ने उसे दंगों को रोकने के मकसद से कांग्रेस में शामिल करवाया था. उस दौरान उसकी कांग्रेस नेत्री सुभद्रा जोशी से दोस्ती हो गई. दोनों साथ-साथ रहने भी लगे. इस दरम्यान बख्त ने सुभद्रा जोशी की मदद से कुछ रिफ्यूजियों की प्रॉपर्टी भी कब्जाई.”

  • सुभद्रा जोशी का जिक्र आया तो इनके बारे में भी बता ही देते हैं. 1962 के लोकसभा चुनाव में यूपी की बलरामपुर सीट पर भाजपा के सीटिंग एमपी अटल बिहारी वाजपेयी के खिलाफ कांग्रेस ने दिल्ली से एक कैंडिडेट भेजा था. उन कैंडिडेट का नाम था, सुभद्रा जोशी. सुभद्रा जोशी के पक्ष में चुनाव प्रचार करने के लिए मशहूर फिल्म एक्टर बलराज साहनी ने बलरामपुर में डेरा डाल दिया था. उस वक्त काफी चर्चा में रहे इस चुनाव का जब नतीजा आया, तब सुभद्रा जोशी वाजपेयी पर भारी पड़ी थीं. वाजपेयी चुनाव हार गए थे.

 

ऑर्गेनाइजर का जून 1952 का अंक जिसमें सिकंदर बख्त के बारे में बेहद घटिया बातें लिखी गई थी.
ऑर्गेनाइजर का जून 1952 का अंक जिसमें सिकंदर बख्त के बारे में बेहद घटिया बातें लिखी गई थी.

जब वाजपेयी ने जय श्री राम का नारा लगाने से रोका

80 के दशक का आखिरी दौर और 90 के दशक का शुरुआती दौर भाजपा के लिए राम मंदिर आंदोलन का दौर था. इस दौर में ‘जय श्री राम’ का नारा भाजपा कार्यकर्ताओं का मुख्य नारा बन चुका था. ऐसे में एक दिन अटल बिहारी की वाजपेयी की एक सभा में जय श्री राम का नारा लगने लगा. पार्टी वर्कर्स की देखा-देखी सिकंदर बख्त भी जय श्री राम का नारा लगाने लगे. उन्हें जय श्री राम का नारा लगाते देख वाजपेयी ने टोकते हुए कहा,

“आप जय श्री राम का नारा क्यों लगा रहे हैं? आप इन सब पचड़े में मत पड़िए और अल्लाह की इबादत कीजिए.’ भगवान और अल्लाह में कोई फर्क नहीं है.”

जब रूठे सिकंदर बख्त को वाजपेयी ने विदेश मंत्री बनाया 

यह 1996 का साल था. लोकसभा चुनाव हो चुके थे और उस चुनाव में पहली बार भारतीय जनता पार्टी 161 सीटों के साथ सिंगल लार्जेस्ट पार्टी बनकर तो उभरी थी, लेकिन बहुमत के आंकड़े से काफी दूर थी. फिर भी राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी को सरकार बनाने का न्यौता दे दिया. यह वो दौर था, जब भाजपा को लेकर देश के अल्पसंख्यक समुदायों में एक ख़ास किस्म का संशय हुआ करता था. लोगों को लगता था कि पता नहीं ये लोग सत्ता में आने पर क्या करेंगे, क्या नहीं करेंगे! लेकिन इस प्रकार के संदेहों पर वाजपेयी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह से ही विराम लगाने की कोशिश की.

16 मई 1996 को वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली. लेकिन लोगों को घोर आश्चर्य तब हुआ, जब मुरली मनोहर जोशी और जसवंत सिंह जैसे लोगों के रहते, वाजपेयी के ठीक बाद सिकंदर बख्त को शपथ दिलाई गई. इससे समाज में मैसेज गया कि वाजपेयी सभी समुदायों को साथ लेकर चलना चाहते हैं.

लेकिन सरकार में नंबर 2 मंत्री सिकंदर बख्त को कोई बड़ा विभाग नहीं दिया गया. उन्हें शहरी विकास मंत्री बनाया. इससे वे बड़े नाराज हुए और कार्यभार संभालने ही नहीं गए. उन्हें लगता था कि ‘मैं काफी सीनियर हूं इसलिए मुझे रायसीना पहाड़ी पर ऑफिस वाले टाॅप 4 मिनिस्ट्री (गृह, विदेश, रक्षा और वित्त) में से कोई एक मिनिस्ट्री मिलेगी.’ लेकिन ऐसा हुआ नहीं. फिर जब वाजपेयी को अपने दोस्त बख्त की नाराजगी का पता चला, तो उन्होंने तत्काल उन्हें साउथ ब्लाॅक के रूम नंबर 171 में बैठा दिया. वाजपेयी ख़ुद भी डेढ़ दशक पहले करीब 28 महीनों तक इस कमरे में बैठ चुके थे. बतौर विदेश मंत्री. और अब यह जिम्मेदारी उन्होंने सिकंदर बख्त के जिम्मे डाल दी. लेकिन बख्त इस कुर्सी पर पखवाड़ा भी पूरा नहीं कर सके, क्योंकि 13 दिनों में ही बहुमत नहीं होने के कारण वाजपेयी सरकार को जाना पड़ा था.

अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सिकंदर बख्त.
अटल बिहारी वाजपेयी के साथ सिकंदर बख्त.

लेकिन उन्हें 2 साल बाद फिर मंत्री बनने का मौका मिला, जब अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार दोबारा बनी. इस बार सिकंदर बख्त उद्योग मंत्री बनाए गए. लेकिन वाजपेयी की यह दूसरी सरकार एक बार फिर 13 के फेर में फंस गई. दरअसल 13 महीने बाद जब 269 और 270 के फेर में एक वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई. लेकिन मध्यावधि चुनाव के बाद एक बार फिर वाजपेयी की सरकार ही सत्ता में वापस आ गई. पर इस बार सिकंदर बख्त सत्ता में नहीं आ सके. उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया था. कहा जाता है कि RSS के दबाव में उन्हें मंत्री नहीं बनाया गया. लेकिन तब वाजपेयी ने अपने दोस्त बख्त को और भी बहुत कुछ दिया. उन्हें पद्म विभूषण से नवाजा गया. साथ ही कुछ दिनों बाद उन्हें केरल के राजभवन में भेज दिया गया, जहां वे अपने अंतिम दिनों तक रहे.

23 फरवरी 2004 को राज्यपाल पद पर रहते हुए उनका निधन हो गया. उनके निधन के समय भी यह चर्चा गरम थी कि उनका अंतिम संस्कार मुस्लिम रीति-रिवाज से होगा या हिंदू रीति-रिवाज से. दूसरे शब्दों में कहें तो दफनाया जाएगा या दाह संस्कार किया जाएगा. इसको लेकर काफी चर्चाएं हो रही थी. इन चर्चाओं का कारण यह था कि उन्होंने राज शर्मा नाम की हिंदू लड़की से शादी की थी. इस शादी से उनके 2 बेटे हुए – अनिल बख्त और सुनील बख्त. कहा जाता है कि दोनों हिंदू रीति-रिवाजों में आस्था रखते हैं. इसलिए इस प्रकार के कयासों को बल मिला था. लेकिन अंततः उनको मुस्लिम परंपरा के अनुसार ही दिल्ली में सुपुर्द-ए-खाक किया गया.

उनको जानने वाले लोग आज भी उनके बातूनी स्वभाव, बिखरे बालों और उनकी इंटेलेक्चुअलिटी को याद करते हैं. राज्य सभा में बतौर विपक्ष के नेता और बाद में सदन के नेता, उनको संसद भवन में जो दफ्तर मिला था, वहां अक्सर पत्रकारों की बैठकी लगा करती थी और किस्से-कहानियों का दौर चलता रहता था.


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