Submit your post

Follow Us

1965-71 की जंग के बाद मोरारजी देसाई ने बेदी को किस मोर्चे पर भेजा!

साल 1965 और 1971 की लड़ाई हर किसी ने सुनी है. लेकिन उसके बाद खराब हुए भारत-पाकिस्तान रिश्तों को सुधारने के लिए एक क्रिकेट सीरीज़ खेली गई. सीरीज़ का नाम पड़ा ‘गुडविल टूर’. 18 सालों के लंबे इंतज़ार के बाद 1978 में क्रिकेट की वापसी हुई. उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई और पाकिस्तान के जनरल जिया उल हक ने क्रिकेट के ज़रिये दोनों मुल्कों के रिश्ते सुधारने की पहल की.

भारतीय टीम पाकिस्तान के दौरे पर जाने के लिए तैयार हुई. भारत की कप्तानी बिशन सिंह बेदी को सौंपी गई. वहीं पाकिस्तान के कप्तान बने मुश्ताक मोहम्मद.

भारतीय बैटिंग vs पाकिस्तानी अंपायर्स:

इस सीरीज़ से पहले भारत और पाकिस्तान के बीच कुल तीन सीरीज़ खेली जा चुकी थीं. लेकिन कभी भी पाकिस्तान भारत को हरा नहीं पाया था. इस दौरे पर जाने से पहले दोनों मुल्कों में खूब हल्ला था कि ये जंग इंडियन बैटिंग और पाकिस्तानी बोलिंग के बीच है. लेकिन असल में सीरीज़ में हुआ कुछ और ही. भारतीय बल्लेबाज़ तो डटे हुए थे लेकिन सामने पाकिस्तानी गेंदबाज़ी के बजाए पाकिस्तानी अंपायर्स ने मोर्चा संभाल लिया था.

Sarfraz
सरफराज़ अहमद. फोटो: ICC

इस दौरे पर अंपायरिंग के स्तर को लेकर बहुत सारे सवाल उठे. टीम इंडिया के पूर्व खिलाड़ी अंशुमन गायकवाड़ ने तो यहां तक बताया है कि पाकिस्तानी तेज़ गेंदबाज़ सरफराज नवाज़ ने उनसे आकर कहा था कि

”पाजी देखना ये तुम्हारे ऊपर वाले बैट्समेन को आउट देंगे, नीचे वालों को नहीं देंगे.”

सीरीज़ में हुआ भी बिल्कुल वैसा ही. फैसलाबाद में खेला गया सीरीज़ का पहला मैच ड्रॉ हो चुका था. जबकि लाहौर के गद्दाफी स्टेडियम में खेले गए दूसरे मुकाबले में भारत की आठ विकेट से हार हुई.

आखिरी टेस्ट में बिशन सिंह बेदी की ज़िद:

सीरीज़ बचाने के लिए कराची में खेला जाने वाला आखिरी मैच हर हाल में जीतना था. लेकिन वहां फिर से कुछ खराब अंपायरिंग और कुछ बिशन सिंह बेदी की ज़िद ने मैच और सीरीज़ हमसे छीन ली.

मैच की शुरुआत 14 नवंबर के दिन हुई. भारत ने टॉस जीता और बैटिंग चुन ली. सुनील गावस्कर ने धमाकेदार बैटिंग की और उनके शतक के साथ भारत ने 344 रन बनाए. दूसरे दिन पाकिस्तान की बैटिंग आई और उन्होंने भारतीय गेंदबाज़ी को बिल्कुल भी नहीं बख्शा. जावेद मियांदाद के शतक के साथ पाकिस्तान ने 481 रन बना डाले.

पाकिस्तान ने चौथे दिन तक बैटिंग की और 481 के स्कोर पर पारी घोषित कर दी. अब भारत के सामने इमरान खान, सरफराज़ नवाज़, सिकंदर बख्त जैसे गेंदबाज़ों के सामने डेढ़ दिन बैटिंग करने का सवाल था.

सुनील गावस्कर फिर से बैटिंग के लिए उतरे. गावस्कर पाकिस्तानी गेंदबाज़ों को जमकर धो रहे थे. चौथे दिन का खेल जब खत्म हुआ तो भारत 131 रन पर सिर्फ दो विकेट गंवाकर खेल रहा था. लगने लगा था कि ये सीरीज़ तो गई लेकिन ये टेस्ट बच सकता है.

चौथे दिन खेल खत्म होने पर गावस्कर 67 रन बनाकर नॉट-आउट लौटे थे. भारत की उम्मीदें ज़िंदा थीं. लेकिन पांचवे दिन 12 रन के अंदर ही किरमानी आउट हो गए. किरमानी के बाद विश्वनाथ और विश्वनाथ के बाद सुरिंदर अमरनाथ भी चलते बने.

एक एंड पर विकेट गिरते रहे और गावस्कर एक छोर थामे हुए थे. गावस्कर ने मुकाबले में अपना दूसरा शतक पूरा किया और टीम इंडिया 300 रन बनाकर ऑल-आउट हो गई.

आखिरी दिन कैसे बचे बचाए मैच को भारत ने गंवा दिया:

दिन का खेल खत्म होने में सिर्फ 26 ओवर थे और पाकिस्तान को जीतने के लिए 164 रनों की ज़रूरत थी. पाकिस्तान पहले ही सीरीज़ जीत चुका था. वो तसल्ली से थे. उन्हें सिर्फ दिन के आखिरी सेशन को खेलना था.

पाकिस्तानी कप्तान ने आसिफ इकबाल को पारी शुरू करने भेजा. वहीं जावेद मियांदाद को वन डाउन. लेकिन कपिल देव ने पाकिस्तानी ओपनर माजिद को 14 के स्कोर पर कैच आउट करवा दिया. इसके बाद आसिफ इकबाल और जावेद मियांदाद ने तेज़ तर्रार बैटिंग शुरू कर दी. दोनों ने विकेटों के बीच एक रन को दो में और दो को तीन में कनवर्ट किया. इन दोनों की ऐसी बल्लेबाज़ी से साफ हो गया कि पाकिस्तानी जीत की तरफ देख रहा है.

लेकिन 118 के स्कोर पर आसिफ इकबाल अमरनाथ का शिकार बने गए. यहां से भी भारत मैच आसानी से ड्रॉ करा सकता था क्योंकि इस वक्त पाकिस्तान को जीतने के लिए गेंदों से ज़्यादा रनों की ज़रूरत थी. उस वक्त ओवर्स का भी कोई अहम रोल नहीं था, बल्कि समय की बात थी और समय काफी कम बचा था.

भारत चाहता तो दोनों छोर से तेज़ गेंदबाज़ों को लगाकर समय अधिक ले सकता था. जिससे कम ओवर्स फेंके जा सकें. लेकिन ऐसा कहा जाता है कि भारतीय कप्तान बिशन सिंह बेदी इनफॉर्म इमरान खान का विकेट चटकाना चाहते थे. जिसकी वजह से उन्होंने खुद एक एंड से गेंदबाज़ी जारी रखी और किसी तेज़ गेंदबाज़ को नहीं लगाया. बिशन उस मैच में ये ही सोच रहे थे कि

‘भाई कितना मारेगा, एक मारेगा, दो मारेगा, एक गलती किया और आउट.’

लेकिन बिशन सिंह बेदी की इस ज़िद से पाकिस्तानी बल्लेबाज़ों को ज़्यादा ओवर्स खेलने को मिले और इमरान खान ने बेदी पर दो चौके और एक छक्का लगाकर खत्म कर दिया.

इस तरह से भारतीय टीम आज़ादी के बाद 31 सालों में पहली बार पाकिस्तान के हाथों हार गई.


PSL चैम्पियन कराची किंग के बाबर,वसीम,इमाद ने IPL 2020 से जुड़े किस शख्स को शुक्रिया बोल रहे हैं?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

पॉलिटिकल किस्से

जब चंद्रशेखर सिंह सत्ता गंवाने वाले बिहार के इकलौते मुख्यमंत्री बने थे

9 जुलाई 1986 को इनका निधन हो गया था.

बिहार का वो सीएम, जिसका एक लड़की के किडनैप होने के चलते करियर खत्म हो गया

वो नेता जिनसे नेहरू ने जीवन भर के लिए एक वादा ले लिया.

महात्मा गांधी का 'सरदार,' जो कभी मंत्री नहीं बना, सीधा मुख्यमंत्री बना

सरदार हरिहर सिंह के बिहार के मुख्यमंत्री बनने की कहानी

मजदूर नेता से सीएम बनने का सफर तय करने वाले बिंद्श्वरी दुबे का किस्सा सुनिए

बेंगलुरू की मशहूर नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी इन्हीं की देन है.

बिहार के उस सीएम की कहानी जिसने लालू को नेता बनाया

वो CM जिसे बस कंडक्टर के चक्कर में कुर्सी गंवानी पड़ी.

बिहार का वो सीएम जिसे तीन बार सत्ता मिली, लेकिन कुल मिलाकर एक साल भी कुर्सी पर बैठ न सका

बिहार के पहले दलित सीएम की कहानी.

मुख्यमंत्री: मंडल कमीशन वाले बिहार के मुख्यमंत्री बीपी मंडल की पूरी कहानी

बीपी मंडल, जो लाल बत्ती के लिए लोहिया से भिड़ गए थे.

बिहार का वो मुख्यमंत्री जिसकी मौत के बाद तिजोरी खुली तो सब चौंक गए

वो सीएम जो बाबाधाम की तरफ चला तो देवघर के पंडों में हड़कंप मच गया था.

श्रीकृष्ण सिंह: बिहार का वो मुख्यमंत्री जिसकी कभी डॉ. राजेंद्र प्रसाद तो कभी नेहरू से ठनी

बिहार के पहले मुख्यमंत्री की कहानी.

कहानी तीन दिन के लिए बिहार के सीएम बने सतीश प्रसाद सिंह की

वो सीएम जिसने 'जोगी और जवानी' नाम की फिल्म बनाई.