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वो फिल्म जिसकी स्क्रिप्ट रखकर डायरेक्टर चला गया और अमिताभ ने वो फिल्म मुफ्त में की

संजय लीला भंसाली ने अपने करियर की शुरुआत बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर की थी. वो विधु विनोद चोपड़ा को असिस्ट करते थे. जब विधु 1994 में ‘1942: अ लव स्टोरी’ बना रहे थे, तब संजय हेलन केलर के बारे में पढ़ रहे थे. वो उनकी कहानी से काफी प्रभावति थे. सोचा था कभी इस पर भी फिल्म बनाएंगे. अपनी पहली फिल्म ‘खामोशी’ के बाद वो इसी सब्जेक्ट पर फिल्म बनाना चाहते थे. लेकिन उन्हें ‘खामोशी’ की रिलीज़ वाले दिन एक फोन आया. इस कॉल के बाद भंसाली ने कुछ महीनों तक किसी का फोन नहीं उठाया. क्योंकि उस दिन फोन उठाते ही उन्हें सुनाई दिया- ‘बैठ गई’. नर्वसाकर पूछा, क्या बैठ गई? जवाब आया, ‘अपनी पिक्चर बैठ गई’. ये फोन ‘खामोशी’ के प्रोड्यूसर का था. इस असफलता ने भंसाली को तोड़ दिया. या यूं कहें कि आगे आने वाली चुनौतियों के लिए तैयार करना शुरू कर दिया. हालांकि अब उनका वो कॉन्फिडेंस चला गया था कि वो हेलन केलर की लाइफ से प्रेरित कोई फिल्म बनाएं. प्रोड्यूसर झामू सुगंध और सलमान खान से मोटिवेशन पाकर वो वापस खड़े हुए और ‘हम दिल दे चुके सनम’ बनाई. इस फिल्म ने मार्केट में उनकी इमेज ऐसी बदली कि उनका अगला प्रोजेक्ट इंडिया की सबसे महंगी फिल्म थी. ‘देवदास’.

‘देवदास’ की रिलीज़ के दौरान मैगज़ीन मैंज वर्ल्ड को दिए एक इंटरव्यू में भंसाली ने बताया कि वो आगे क्या करने वाले हैं. उन्होंने बताया कि उनकी इच्छा अमिताभ बच्चन के साथ काम करने की है. लेकिन वो उनके साथ किसी ऐसी फिल्म पर काम करना चाहते हैं, जो उनके कद और टैलेंट के साथ न्याय कर पाए. अगली खबर ये आई कि ‘देवदास’ फेम संजय लीला भंसाली अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी को लेकर ‘ब्लैक’ नाम की एक फिल्म बना रहे हैं. सब लोग हैरान थे कि फ्रेम्स को रंगों से भरने वाला आदमी ‘ब्लैक’ जैसी ऑफबीट फिल्म क्यों बना रहा है. लोगों ने चेताया पैसे डूबेंगे. बर्बाद हो जाओगे. पब्लिक नहीं देखेगी. भंसाली ने अपनी फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार की और नासिक चले गए. वहां अमिताभ बच्चन ‘खाकी’ फिल्म की शूटिंग कर रहे थे. भंसाली यहां पहुंचे थे बच्चन को नैरेशन देने यानी अपनी फिल्म की कहानी सुनाने. नैरेशन शुरू हुआ. भंसाली कुछ वाक्य पढ़ने के बाद चुप हो गए. स्क्रिप्ट रखा और अमिताभ से कहा कि वो ये स्क्रिप्ट खुद पढ़ लें. क्योंकि भंसाली को ये लगता था कि वो बहुत बुरे नैरेटर हैं.

फिल्म 'ब्लैक' की शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली, आयशा कपूर और अमिताभ बच्चन.
फिल्म ‘ब्लैक’ की शूटिंग के दौरान संजय लीला भंसाली, आयशा कपूर और अमिताभ बच्चन.

बदले में अमिताभ बच्चन ने क्या किया?

‘देवदास’, संजय लीला भंसाली की ‘बॉम्बे वेल्वेट’ थी. उस फिल्म के साथ बहुत कुछ दांव पर लगा हुआ था. बहुत सारे पैसे. अथाह मेहनत. और भंसाली का करियर. रिलीज़ से पहले प्रोड्यूर्स टेंशन में गोलियां फांकना शुरू कर चुके थे. लेकिन ‘देवदास’ बहुत बड़ी हिट रही. अब भंसाली डायरेक्टर्स की टॉप लीग में आ गए थे. हर बड़ा स्टार उनके साथ काम करना चाहता था. लेकिन भंसाली सबसे बड़ा स्टार चाहते थे. वो अमिताभ बच्चन के साथ काम करना चाहते थे. उन्होंने अमिताभ को ये फिल्म ऑफर की. अमिताभ न सिर्फ माने, बल्कि बिना किसी फीस के उनकी फिल्म की. बाद में बच्चन ने इस बारे में बताया कि वो भंसाली की सभी फिल्में देख चुकने के बाद, बस उनके साथ काम करना चाहते थे. उन्हें ये मौका मिला, यही उनकी फीस थी.

फिल्म ब्लैक एक सीन में बच्चन और रानी मुखर्जी. अमिताभ का रोल रानी के टीचर का था.
फिल्म ब्लैक एक सीन में बच्चन और रानी मुखर्जी. अमिताभ का रोल रानी के टीचर का था.

कास्टिंग की बात हो ही रही है, तो एकाध ट्रिविया और जान लीजिए. जब भंसाली ने रानी मुखर्जी को ये फिल्म ऑफर की, तो उन्होंने मना कर दिया. क्योंकि उन्हें लग रहा था कि ये काफी मुश्किल रोल है, जिसे वो नहीं कर पाएंगी. लेकिन फाइनली वो मान गईं. फिल्म में रानी के किरदार मिशेल के कई फेज़ देखने को मिलते हैं. बचपन वाले हिस्से में मिशेल का रोल किया था आयशा कपूर ने. पहले ये रोल आलिया भट्ट करने वाली थीं. 9 साल की आलिया, मां सोनी राजदान के साथ ऑडिशन के लिए आईं. भंसाली ने उनका ऑडिशन लेने से मना कर दिया. उन्हें लगता था कि आलिया में बॉलीवुड हीरोइन बनने के सारे गुण मौजूद हैं. उन्हें ये छोटे-मोटे किरदार नहीं करने चाहिए. फिल्म के एक सीन में रणबीर कपूर भी दिखाई देते हैं. अमिताभ बच्चन उन दिनों बहुत व्यस्त रहते थे, इसलिए जिन सीन्स में बच्चन की पीठ दिखनी होती थी, उसमें रणबीर कपूर को खड़ा कर दिया जाता था. हालांकि ऐसा इक्के-दुक्के सीन्स में ही हुआ था.

जब अमिताभ और रानी फिल्म को दोबारा शूट करने की बात करने भंसाली के घर गए

मुंबई फिल्मसिटी में एक नया फ्लोर बना था. फ्लोर का मतलब माला नहीं, वो स्पेस जहां अब सेट बनाया जा सकता था. इस फ्लोर पर बनने वाला पहला सेट संजय लीला भंसाली का था. ‘ब्लैक’ के लिए. उस घर में फिल्म के 70 फीसदी हिस्सों की शूटिंग होनी थी. फिल्मसिटी के दूसरे हिस्से में अमिताभ बच्चन ‘कौन बनेगा करोड़पति’ की शूटिंग कर रहे थे. सेट तैयार होते ही भंसाली ने बच्चन को बुलावा भेजा. बच्चन अपने ब्लॉग में बताते हैं कि उनके सेट पर पहुंचने से पहले भंसाली ने उसे मोमबत्तियों से सजा दिया था. बकौल अमिताभ वो सेट शानदार लग रहा था. फिल्म की शूटिंग शुरू हुई. लेकिन एक दिन शॉर्ट सर्किट से वहां आग लग गई. सेट से लेकर कॉस्ट्यूम और प्रोडक्शन से जुड़े कई सामान जल गए. भंसाली इस फिल्म को छोटे बजट और कम समय में बनाना चाहते थे. लेकिन हालात उनका साथ नहीं दे रहे थे.

ये वही सेट है, जो जल गया था. इस सीन में अमिताभ और आयशा के साथ शरनाज पटेल नज़र आ रही हैं.
ये वही सेट है, जो जल गया था. इस सीन में अमिताभ और आयशा के साथ शरनाज पटेल नज़र आ रही हैं.

भंसाली किसी फिल्म को बनाने के दौरान पूरी तरह उस फिल्म में ही होते हैं. सेट जलने की खबर सुनकर वो हताश हो गए. परेशान से चुपचाप अपने घर में बैठे थे. जैसे ही ये बात फिल्म की स्टारकास्ट को पता चली, वो सेट की फिक्र किए बिना सीधा भंसाली के घर पहुंचे. अमिताभ और रानी ने उन्हें दिलासा दिया. और वादा किया, जो सीन इस आग लगने की वजह से खराब हो गए, उन्हें वो दोबारा शूट करेंगे. संजय लीला भंसाली तो वापस ट्रैक पर आ गए. लेकिन उनकी समय और बजट वाली परेशानी जस की तस बनी हुई थी. जिस फिल्म को बनाने के लिए 13.5 करोड़ रुपए का बजट अलॉट हुआ था, उसे बनाने में 21.5 करोड़ रुपए लग गए.

भंसाली और उनकी कलात्मकता

‘ब्लैक’ की कहानी एक देख-सुन न सकने वाली लड़की मिशेल और उसके शराबी टीचर देबराज सहाय की है. इस फिल्म की शुरुआत उस सीन से होती है, जहां मिशेल अपनी कहानी लिख रही होती है. आम तौर दो सीन्स के बीच की विज़ुअल खाई को एडिटिंग के दौरान फेड या जंप की मदद से पाटा जाता है. लेकिन यहां मामला अलग था. फिल्म की शुरुआत में स्क्रीन को कुछ देर के लिए ब्लैक कर दिया जाता है. नेपथ्य से रानी की आवाज़ आती है लेकिन दिखता सिर्फ अंधेरा है. शुरुआत के 45 सेकंड फिल्म ऐसे ही चलती है. उस पल में आपको जो अंधेरा दिखता है, वही मिशेल की दुनिया है. उसके अंदर एक विकार है. लेकिन स्क्रीन जब ब्लैक होती है, तब वही दिक्कत आपके साथ होती है. आपकी दुनिया भी ब्लैक हो जाती है.

ये वो तस्वीर है, जिसे आप पूरी फिल्म का सार कह सकते हैं. दो अलग लोग, जो अपने जीवन के अलग-अलग फेज़ में तकरीबन एक जैसी सिचुएशन से गुज़रते हैं. और वहां से निकलने में एक-दूसरे की मदद करते हैं.
ये वो तस्वीर है, जिसे आप पूरी फिल्म का सार कह सकते हैं. दो अलग लोग, जो अपने जीवन के अलग-अलग फेज़ में तकरीबन एक जैसी सिचुएशन से गुज़रते हैं. और वहां से निकलने में एक-दूसरे की मदद करते हैं.

जो बात हम यहां कर रहे हैं, वही बात फिल्म का एक सीन मेटाफर में करता है. देबराज, मिशेल को समझा-पढ़ा रहा होता है. इतने में बत्ती चली जाती है. मिशेल मौका पाते ही केक खाने भाग जाती है. लेकिन देबराज जैसे ही चलने को होता है, गिर पड़ता है. उस समय बच्चन का किरदार कहता है- ‘अंधेरे में आंखें भी किसी काम की नहीं होती’. और आगे से मिशेल को पढ़ाने वाले सिलेबस में वो इस चैप्टर को भी मार्क करके रख लेता है. यहां देबराज और मिशेल के किरदार एक्सचेंज हो जाते हैं. ये फिल्म इतने कॉम्प्लेक्स तरीके से सोची, शूट और एडिट की गई थी. कोई फिल्ममेकर सभी टेक्निकल डिपार्टमेंट को अपनी फिल्म की कहानी में कैसे शामिल और इस्तेमाल करता है, किसी फिल्म या उसे बनाने वाले की इस खूबी को सिनेमैटिक ग्रैमर कहते हैं. ये चीज़ आयशा इक़बाल और विमल मोहन जॉन की किताब ‘बीहाइंड द सीन्स- कंटेम्पररी बॉलीवुड डायरेक्टर्स एंड देयर सिनेमा’ में बड़ी विस्तार से बताई गई है. भंसाली ‘ब्लैक’ को कलात्मक रूप से अपनी सबसे कंप्लीट फिल्म मानते हैं. वहीं उनका मानना है कि ‘देवदास’ में उनसे एक गलती हो गई थी. हालांकि उसे किसी ने पॉइंट आउट नहीं किया, इसलिए वो खुद भी नहीं बताते.

अगर आपको ऊपर बताई गई चीज़ क्लीयर नहीं हुई, तो आप फिल्म के ट्रेलर में स्क्रीन को ब्लैक होते देख सकते हैं. हालांकि यहां सबकुछ फास्ट फॉरवर्ड मोड में है:

इस फिल्म ने अमिताभ बच्चन के बचपन का सपना पूरा कर दिया

‘ब्लैक’ जब बनकर तैयार हुई, तो इंडस्ट्री वाले दोस्तों-साथियों के लिए इसका प्रीमियर किया गया. यानी रिलीज़ से पहले ‘ब्लैक’ इंडस्ट्री के लोग-बाग को दिखाई गई. फिल्म के खत्म होते-होते ऑडिटोरियम में बैठी सारी जनता रो रही थी. उसी ऑडियंस का हिस्सा दिलीप कुमार भी थे. दिलीप कुमार को अमिताभ बच्चन अपना आइडल मानते हैं. उनका सपना था कि दिलीप साहब उनकी कोई फिल्म थिएटर में बाकी लोगों के साथ बैठकर देखें. ‘ब्लैक’ ने उनकी वो ख्वाहिश पूरी कर दी. लेकिन सपने पूरे होने वाली कहानी का क्लाइमैक्स अभी बाकी था. जैसे ही फिल्म खत्म हुई. बधाइयों का दौर शुरू हो गया. लोग ऑडिटोरियम से निकलने लगे. लेकिन दिलीप साहब थिएटर से बाहर निकलकर खड़े हो गए. उन्होंने अमिताभ का हाथ अपने हाथों में लिया और उनकी आंखों में देखने लगे. दिलीप कुमार वो स्टार थे, जिनके काम ने अमिताभ बच्चन जैसे नए लोगों को फिल्मों में आने के लिए प्रेरित किया था. उस पल के बारे में अमिताभ कहते हैं- ”काश मैं उस लम्हे को उम्र भर रोक पाता”. क्योंकि ये उनकी लाइफ का सबसे स्पेशल मोमेंट था.

फिल्म 'ब्लैक' के प्रीमियर के मौके पर अमिताभ और रानी के साथ संजय लीला भंसाली. और दूसरी तस्वीर में प्रीमियर अटेंड करने पहुंचे दिलीप कुमार को रिसीव करती रानी मुखर्जी.
फिल्म ‘ब्लैक’ के प्रीमियर के मौके पर अमिताभ और रानी के साथ संजय लीला भंसाली. और दूसरी तस्वीर में प्रीमियर अटेंड करने पहुंचे दिलीप कुमार को रिसीव करती रानी मुखर्जी.

‘ब्लैक’ थिएटर्स में 4 फरवरी, 2005 को रिलीज़ हुई. फिल्म एक्सपर्ट लोगों की भविष्यवाणी को साइड पर रखकर खूब देखी गई. फिल्म ने पैसे और इज़्जत दोनों कमाए. इसके लिए अमिताभ बच्चन को चौथी बार बेस्ट एक्टर का नेशनल अवॉर्ड मिला. फिल्म भी नेशनल अवॉर्ड जीती. ‘ब्लैक’ ने 2005 फिल्मफेयर अवॉर्ड्स में रिकॉर्ड 11 अवॉर्ड्स अपने नाम किए. भंसाली अपनी काबिलियत तो ‘खामोशी’ में ही साबित कर चुके थे. लेकिन इस फिल्म ने उन्हें रिस्क लेना सीखा दिया. रिलीज़ के 15 साल बाद भी ‘ब्लैक’ लोगों की फेवरेट फिल्म वाली लिस्ट में अपनी जगह बचाए हुए है. इस फिल्म में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम करने वाले रणबीर कपूर और सोनम कपूर को भंसाली ने ‘सांवरिया’ (2007) से लॉन्च किया. खबर ये थी कि वो सलमान और आलिया को लेकर ‘इंशाअल्लाह’ नाम की फिल्म बना रहे हैं. वो फिल्म फिलहाल नहीं बन रही. लेकिन भंसाली आलिया के साथ ‘गंगूबाई काठियावाड़ी’ नाम की फिल्म बना रहे हैं.


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