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'ज़ी हिंदुस्तान' ने वो कविता क्यों चुरा ली जो आपने लल्लनटॉप पर सुनी थी?

एक होती है, प्रेरणा, इंस्पिरेशन, तर्ज़, पैटर्न, लीक और फिर आता है, ज़ी हिंदुस्तान. जो इन सबके परे चला जाता है.

मामला बड़ा सीधा सा है. एक हैं कुलदीप, लल्लनटॉप वाले कहते हैं कुलदीप सरदार. आज तक रेडियो के लिए एक कविता कही. ऑडियो बनाया और आज तक के पेज पर पहली बार 22 मार्च को नज़र आया.

फिर सीन में एंट्री हुई ज़ी हिंदुस्तान की, न्यूज़ चैनल है. नोएडापुरम के फिल्मसिटीधाम में अगल-बगल ही कहीं दफ्तर होगा. विचार उठते हैं. विचार गर्म होते हैं. गर्म हवा तो ऊपर जाती हैं. इस कविता का विचार भी हवा सरीखे उठकर ज़ी हिंदुस्तान के पांचवे फ्लोर तक जा पहुंचा. थोड़ा देर पहुंचा. 15 दिन बाद पहुंचा, अक्षरश: पहुंचा.

वीडियो डिलीट होने की आशंका के चलते, वीडियो का स्क्रीनशॉट!

Zee Hindustan
ज़ी हिंदुस्तान के वीडियो का स्क्रीनशॉट

होने को तो आपको समस्याएं कई बातों से हो सकती थीं कि ‘उम्मिदों’ ग़लत क्यों लिखा जा रहा है? 6 मिनट कहकर 5:36 का वीडियो क्यों सुनाया जा रहा है. उम्मीदों के रौशनदान ही क्यों? खिड़की ही कर देते. लेकिन हमारी समस्याएं दूसरी हैं, हुआ ये कि अगले ने सीधे-सीधे उठाकर पूरी कविता ही बांच दी. अक्षरश:. माने जहां दादी मुल्क को ‘मुलुक’ कह रही हैं, वो ‘मुलुक’ तक पढ़ दिया गया. बाकायदा पैकेज बनाए गए, यूट्यूब पर चढ़ाए गए.

आपका दोस्त दी लल्लनटॉप आप तक यही कविता ले आया था.

लटक पर भी आपको दिखाने के लिए मेहनत की थी, हमारे साथियों ने.

और कई जगहों पर आप कविता सुन सकते हैं.

आज तक के Instagram पते पर :

आज तक के Facebook पेज पर :

आज तक के Twitter हैंडल पर :

आज तक के यूट्यूब पर :

दी लल्लनटॉप के यूट्यूब पर :

कथक कलाकार, मृणालिनी ने भी आज तक रेडियो की इस कविता में रंग भरे.

ये कविता सोशल मीडिया पर भी खासा पसंद की गई. लोगों ने सुनी, साझा की. तारीफ़ की. कविता का उद्देश्य था कि लोग धीरज और प्रेम से काम लें. समाज पर विश्वास रखें. इंसान, इंसान की कद्र करे. बस यहां वही होते न दिखा.
होने को कई चीजें हो सकती हैं, शायद ज़ी हिंदुस्तान के साथियों ने वास्तव में ये कविता लिखी-पढ़ी हो, लेकिन कुलदीप समय में आगे जाकर, उसे उड़ा लाए हों. पर चूंकि कुलदीप के पास पिम पार्टिकल नहीं है और न टाइम मशीन,इसलिए ये थोड़ा मुश्किल काम लगता है.
इस स्थिति में ज़ी हिंदुस्तान ने जो कुछ भी किया,शास्त्रों न सही, कहीं न कहीं, उसे चोरी कहा ही जाता होगा.

मूल कविता जो थी, वो टेक्स्ट में आप यहां पढ़ सकते हैं.

ये हिंदुस्तान है और ये मार्च का महीना है

और एक फ़ैसला आपको करना है

ठीक है कि फ़िज़ा ठीक नहीं
मालूम है कि माहौल डर का है

बदसूरत सन्नाटे की आहट सुनी हमने
धुकधुकी है छाती के भीतर

फ़िक़्र है, बुज़ुर्गों की, बच्चों की

दुकानें बंद हैं

सड़कें वीरान हैं

दूसरे शहर में पड़ी मांओं की रातें करती हैं सांय सांय

कोई घर नहीं आता

दोस्तों को भींच लेने को तरसती हैं बाज़ुएं

बूढ़ी दादी कहती हैं, मुलुक को किसी की नज़र लग गई है

डर लगता है ना?

पर वो बता रहे हैं कि सफ़ेद कोट पहनने वाले

कुछ पढ़ाकुओं ने, प्रयोगशालाओं में जान दे रक्खी है

वो बता रहे हैं कि महज़ कुछ हफ़्तों की क़ैद के बाद

कई दिशाओं से आ रही हैं राहत की महक

वो बता रहे हैं कि स्पेन में सलाख़ें तोड़कर

बालकनियों से निकला है एक संगीत

उम्मीदों के रौशनदान अब भी खुले हैं

जो क़ैद में हैं वो ये संगीत सुन रहे हैं

कोई मुल्क है दुनिया के किसी कोने में डेनमार्क करके

जहां सरकार ने सेठों से कहा है कि वे नौकरियां न लें, तनख़्वाह हम से ले लें

मेरे पड़ोस की एक बच्ची ने फोन कर दिया है अपने दोस्तों को

कोरोना चला जाएगा तो फिर से खेलेंगे चोर पुलिस का खेल

दिमाग़ का एक डॉक्टर मुफ़्त में दे रहा है मशविरे

कि यहूदियों के तजुर्बे पढ़ो जहां उम्मीद का एक कण न दीखता था

सारी दुनिया सख़्ती और नरमी, दोनों का सही इस्तेमाल सीख रही है

सारी दुनिया में लोग इस बीमारी से सबक ले रहे हैं

सारी दुनिया समझ चुकी है कि ये लड़ाई बंदूक़ों और जहाज़ों की नहीं, धीरज और प्रेम की है

और ये हिंदुस्तान है जिसने सब देखा हुआ है

बंगाल के अकाल से
भुज के भूकंप तक
सुनामी पुनामी सब झेली हुई है

बस जिगरा चाहिए, करुणा चाहिए

और देखना बहुत जल्द होगा

जब हमारी बसों में प्रेमी हाथ पकड़कर बैठेंगे

और धक्का लगने पर चूमेंगे चोरी-चोरी

देखना बहुत जल्द होगा जब दफ्तर की सारी थकानें हारेंगी

जब मिल बैठेंगे कई साल पुराने दोस्त

फिर से आसमां गुलाबी होगा

मंदिरों की घंटियों से, अज़ान के स्वरों से

सड़कों पर लकड़ी की डंडी से टायर दौड़ाते बच्चे लौटेंगे

लौटेगा कीर्तन को जाती औरतों का शोर

और गोलगप्पे वाले को 10 का नोट पकड़ाती लड़कियां

लौटेंगे प्लास्टिक की कुर्सियों से सड़कें घेरे बैठे बुजुर्गों के ठहाके

ये सब विरामचिह्न हैं हमारे भागते हुए शहरों के

ये सब लौटेंगे

बस ये हिंदुस्तान है और ये मार्च का महीना है और आपको एक फ़ैसला करना है

फ़ैसला एकांत के अभ्यास का
और अपने समाज पर विश्वास का

वसंत कोई प्लेन या ट्रेन में बैठकर नहीं आता

वो चला आएगा आपके बंद पड़े घर की खुली हुई खिड़कियों से

कुछ दिन घर में रहिए जहां अपने रहते हैं

इसी बहाने फुरसतों को जी लीजिए

शीशे में देखकर फिर से बनाइए चेहरे

फिर से बचपन वाले क्रिकेट शॉट, हाथ से मारिए हवा में

पुरानी किताबों की धूल झाड़िये ज़रा

अलमारी पर चिपकी बिंदियों का गोंद छुड़ाइए ज़रा

डर है तो हो पर नफ़रत न हो

क़ैद है तो हो, अकेलापन न हो

शक है तो हो, स्वार्थ की जगह न हो

बीमारी है तो होगी अपनी जगह

आत्मा बीमार न हो

तो ये हिंदुस्तान है जनाब और ये मार्च का महीना है

और एक फ़ैसला आपको करना है

तो जाइए पहले हाथ धो आइए और

पड़ोसी को फोन करके वाई-फाई ले लीजिए

और चिल्लाइए खिड़कियों से

या धुन बनाकर गाइए इसे

कि किसी का हाथ छूना नहीं है

पर किसी का साथ छोड़ना नहीं है

और कल जब सब कुछ खुलेगा

तो देखना हमारे इन्हीं आसमानों में उड़ते हुए पंछी कहेंगे

कि कमबख़त इंसानों की इस ज़िद्दी ज़ात ने

एक लड़ाई और जीत ली

बस ये मार्च का महीना है

और आपको एक फ़ैसला करना है.

पुनश्च: – वीडियो हमने डाउनलोड कर लिया है.स्क्रीनशॉट भी रखे हैं, इसलिए वीडियो हटाकर ये न समझें कि चोरी दर्ज़ नहीं हुई है.

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