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मूवी रिव्यू: साइलेंस.... कैन यू हियर इट?

मनोज बाजपेयी की एक नई फिल्म आई है. थ्रिलर फिल्म. नाम है ‘साइलेंस, कैन यू हियर इट’. ज़ी5 पर देखी जा सकती है. थ्रिलर फिल्मों की लंबी कतार में आ जुड़ी है ये फिल्म. आपके लिए हमनें भी फिल्म देखी. यही पता करने के लिए कि अनगिनत थ्रिलर फिल्मों के बीच ये अपनी अलग जगह बना पाने में कामयाब हो पाई या नहीं. आइए फिल्म के तमाम पहलुओं पर बात करते हैं.

# Silence की कहानी क्या है?  

कहानी खुलती है एक मर्डर से. फिल्म के शुरू में ही एक लड़की की लाश बरामद होती है. नाम है पूजा. बाद में पता चलता है कि पूजा कोई आम लड़की नहीं थी. शहर के जस्टिस चौधरी की बेटी थी. पूजा के पिता भी बेटी की डेथ पर बौखला जाते हैं. चाहते हैं कि जल्द से जल्द गुनाहगार को पकड़ा जाए. इसी को लेकर पुलिस कमिशनर से मिलते हैं. रिक्वेस्ट करते हैं कि पूजा के मर्डर की जांच का केस एसीपी अविनाश वर्मा को सौंपा जाए. अविनाश अलग मिज़ाज का आदमी है. नियम कायदों में बंधकर नहीं रहता. लेकिन न्याय में यकीन रखता है. ये बात अलग है कि न्याय तक पहुंचने के उसके तरीके पुलिस से ज़रा हटकर हैं.

Dead Body
कुछ लड़कों को पहाड़ पर एक लड़की की लाश मिलती है. यहीं से शुरू होती है कहानी.

अविनाश को इस केस पर लगा दिया जाता है. साथ में दी जाती है एक टीम. अविनाश और उसकी टीम के पास वक्त के अलावा सब कुछ है. उन्हें जल्द-से-जल्द केस सॉल्व करना है. केस सॉल्व कर पाते हैं या नहीं और उनके अपने शक, अपनी खोज उन्हें कहां ले जाती है, यही फिल्म की कहानी है. केस सॉल्व कर पाते हैं या नहीं, ये अलग बात है. लेकिन क्या उस केस को सॉल्व करते वक्त ऑडियंस को मज़ा आता है? क्या अपनी स्क्रीन पर देख रही जनता जानने को उत्सुक होगी कि अगले पल क्या घटने वाला है? तो इसका जवाब है एक बहुत बड़ी ना. और ऐसा क्यूं हुआ है, उन्हीं कारणों पर बात करते हैं.

# आपको पहले भी कहीं देखा है

फिल्म ने अपने सबसे अच्छे पत्ते लास्ट के लिए बचाए. और इसी में गलती कर बैठे. फर्स्ट हाफ को स्लो रखा गया. शायद कहानी जमाने की कोशिश कर रहे थे. लेकिन फिल्म का ये हिस्सा इतना स्लो था कि आसानी से इंटरेस्ट खत्म हो जाए. कहानी को ऐसा करने से कुछ खास मदद नहीं मिली. मर्डर मिस्ट्री और थ्रिलर फिल्मों के लिए अपना सस्पेंस एंड तक बचाने में कुछ गलत नहीं. लेकिन गलत तब हो जाता है जब आपकी फिल्म के लास्ट के वो दो मिनट ही पूरी हाइलाइट बन जाएं.

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मनोज जी, वी लव यू लेकिन यहां कहानी को ज़बरदस्ती खींचा गया है.

फिल्म का एक और नेगेटिव पॉइंट था. कि यहां जांच का ज़्यादातर हिस्सा सिर्फ बातों में निकला. यानी पुलिस को क्या मिला, क्या नहीं मिला, ये डायलॉग्स के ज़रिए ही दर्शाया गया है. एक पॉइंट तक ये ठीक लगता है. लेकिन आगे रिपिटेटिव होने लगता है. कुल मिला के फिल्म को बस दो-चार सेटिंग में सिकुड़ कर रख दिया गया. इसके लिए ज़िम्मेदार हैं फिल्म के राइटर और डायरेक्टर अबान भरूचा देवहंस. ये बहुत अच्छा किया गया कि फिल्म को कुछ किरदारों तक ही सीमित रखा. कहानी फैलाने के चक्कर में उसका रायता नहीं होने दिया. लेकिन इन गिने चुने किरदारों के बीच घूमती शक की सुई से भी कहानी का कुछ खास भला नहीं हो पाया.

Prachi Desai 2
देखकर यही लगेगा कि ऐसी फिल्म पहले भी देखी है.

फिल्म ने अपने पत्ते खोलने के लिए बेवजह 2 घंटे 16 मिनट का समय लिया. ये काफी पहले किया जा सकता था. ऐसा नहीं है कि फिल्म की राइटिंग हर मायने में कमजोर है. हां, बस यहां देखने को कुछ नया नहीं है. मर्डर मिस्ट्री के तौर पर इसे देख सकते हैं. हालांकि, देखते समय एक ही बात बार-बार दिमाग में आएगी. कि ऐसी फिल्म पहले भी कई बार देखी है. नयेपन के लिहाज़ से यहां कुछ भी नहीं है. यही देखकर निराशा हुई.

# अकेले मनोज बाजपेयी क्या ही कर लेते

कहना गलत नहीं होगा कि मनोज बाजपेयी इस फिल्म के दिल और दिमाग हैं. एसीपी अविनाश वर्मा का किरदार उन्होंने ही निभाया है. उन्हीं के नज़रिए से हम केस और उसके इर्द-गिर्द घूमती दुनिया देखते हैं. अविनाश अक्सर चीज़ों पर अपना आपा खो देता है. सामने वाले पर बरस पड़ता है. स्वाभाविक तौर पर यहां मनोज बाजपेयी की ‘एंग्री कॉप’ वाली इमेज को भुनाने की कोशिश की गई. वो इमेज जहां उनका किरदार अचानक से फट पड़ता है. किरदार के लिहाज से ये सही था. उसे एक और शेड देने के लिए अविनाश की पुरानी ज़िंदगी का भी ज़िक्र मिलता है. लेकिन बस ज़िक्र. उस जानकारी को लेकर कहानी में क्या करना था, ये मेकर्स डिसाइड नहीं कर पाए.

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अविनाश की टीम के ज़रिए फिल्म के कुछ हिस्सों को लाइट रखा गया है.

अविनाश की टीम में तीन और पुलिसवाले थे. संजना, अमित और राज. अमित का किरदार निभाया है मॉडर्न बॉलीवुड फिल्मों में हीरो के दोस्त यानी साहिल वैद ने. ‘हंप्टी शर्मा की दुल्हनियां’ और ‘दिल बेचारा’ में हीरो के दोस्त का किरदार निभा चुके हैं. वहीं, संजना के रोल से कमबैक किया है प्राची देसाई ने. संजना अपनी टीम में बैलेंस लेकर आती है. अविनाश के गुस्से और अमित की लापरवाही के बीच का बैलेंस. पुलिस टीम के अलावा एक और जाना-पहचाना चेहरा आपको देखने को मिलेगा. जो है अर्जुन माथुर का. ‘मेड इन हेवन’ में काम कर चुके अर्जुन यहां एक नेता के किरदार में दिखाई दिए हैं. कहानी के लिहाज़ से इनका किरदार अहम था.

फिल्म को एक मज़बूत कास्ट का सहारा था. दुर्भाग्यवश, इस कास्ट को कहानी का सहारा नहीं मिल पाया.

# दी लल्लनटॉप टेक

चाय के प्यालों के सहारे फिल्म का फर्स्ट हाफ पार किया. सोचा कि सेकेंड हाफ इस निष्ठुरता की भरपाई कर देगा. लेकिन ये उम्मीद करना भी गलत ही साबित हुआ. फिर लगा कि थ्रिलर-व्रिलर छोड़ो, इसे मनोज बाजपेयी फिल्म समझकर ही देखा जाए. उस फ्रन्ट पर भी निराश होना पड़ा. क्यूंकि यहां मनोज बाजपेयी के लिए भी करने के लिए कुछ ज़्यादा नहीं था.

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योर टाइम इज़ योर टाइम, नन ऑफ माइ टाइम.

इस वीकेंड पर और भी शोज़ या फिल्में आई होंगी. उन्हें मौका दे सकते हैं. वरना लेट वर्किंग आवर्स की वजह से अगर नींद नहीं पूरी हो पा रही, तो उसे पूरा कर सकते हैं. कुल मिलाकर ये फिल्म देखने के अलावा और भी बहुत कुछ कर सकते हैं. बाकी, अगर मूड बना ही लिया है कि ‘साइलेंस’ ही देखेंगे. तो आपकी मर्ज़ी. होनी को कौन ही टाल पाया है.


वीडियो: जॉन अब्राहम और इमरान हाशमी स्टारर फिल्म ‘मुंबई सागा’ की कहानी क्या है?

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