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फिल्म रिव्यू: साहो

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‘साहो’. ऐसी फिल्म जिसका बहुत ज़्यादा हाइप था. एक्शन थ्रिलर फिल्म. बिग बजट फिल्म. बाहुबली प्रभास की फिल्म. क्या उम्मीदों पर खरी उतरी?

नहीं.

शॉर्ट में कहा जाए तो ‘साहो’ इस साल की शायद सबसे ज़्यादा निराश करने वाली फिल्म है. हमारे साथी सौरभ ने कभी एक बात कही थी. आजकल लोग फ़िल्में बनाते कहां हैं, सिर्फ ट्रेलर बनाते हैं. ‘साहो’ के मामले में ये बात बिल्कुल फिट बैठती है.

नील नितिन मुकेश का रोल बेहद कंफ्यूज़िंग है.
नील नितिन मुकेश का रोल बेहद कंफ्यूज़िंग है.

क्या है कहानी?

दरअसल ये सवाल आप पूरी फिल्म में खुद से पूछते ही रहते हैं. कोई सिर-पैर पकड़ में ही नहीं आता. किस्सा-ए-मुख़्तसर ये कि एक चोर है, एक पुलिस का अंडर कवर एजेंट है, दो-तीन माफिया डॉन हैं और एक ब्लैक बॉक्स के लिए मची हुई छीना-झपटी है. कौन किसकी तरफ है ये प्रेडिक्ट करना मुश्किल है. बीच-बीच में ट्विस्ट का तड़का लगाकर मामले को रोचक करने की कोशिश ज़रूर की गई है लेकिन बात नहीं बनती, तो नहीं ही बनती. कुल मिलाकर आप ये समझ ही नहीं पाते कि ये रिवेंज ड्रामा है, हाई प्रोफाइल चोरी का प्लॉट है या चोर-पुलिस का स्मार्ट खेल. कहानी बेहद कन्फ्यूज़ करने वाली और बेतहाशा बिखरी हुई है.

लेकिन ख़राब राइटिंग को भी कभी-कभार एक्टर्स की अच्छी परफॉर्मेंस संभाल ले जाती है. यहां वो भी नहीं होता. प्रभास समेत सब लोग बुझे-बुझे से हैं. प्रभास का एंट्री सीन बढ़िया है. वो आसमानी उम्मीदें जगाते हैं. लेकिन उसके बाद बिखरी हुई फिल्म उनका भी जलवा ख़राब कर देती है. श्रद्धा तो पूरी फिल्म में खोई-खोई रहती हैं. उनका ओपनिंग सीन भी अच्छा है वैसे. मर्डर इन्वेस्टिगेशन करती एक कॉन्फिडेंट पुलिस अफसर. जिसे बाद में पता नहीं क्या हो जाता है. पूरी फिल्म में वो या तो उल्लू बनती है या हीरो के रहमोकरम पर नज़र आती है.

क्या अच्छा है?

प्रभास का इंट्रोडक्टरी सीन. एकाध ट्विस्ट. थोड़ा सा एक्शन. बस. क्लाइमेक्स से पहले का एक्शन टॉप क्वालिटी का है लेकिन वो ज़्यादा देर का खेल नहीं है. जिस कार चेज़ के सीन का बहुत ज़्यादा हाइप था वो ज़रा भी थ्रिल पैदा नहीं करता.

एक्शन टुकड़ों में अच्छा है.
एक्शन टुकड़ों में अच्छा है.

क्या खटकता है?

बहुत हार्श न भी हुआ जाए तो भी ‘साहो’ एक टिपिकल साउथ इंडियन मूवी से ज़्यादा कुछ नहीं है. वही बेतुकी मारधाड़, ग्रेविटी का मुंह चिढ़ाते स्टंट्स और किरदारों का इललॉजिकल कैरिकेचर. इसे भी चला लिया जाता अगर फिल्म खुद को इंडियाज़ बिगेस्ट एक्शन थ्रिलर न कहती. अच्छी थ्रिलर फिल्म में लॉजिक की भयंकर कमी कैसे चलेगी भैया? इंटरवल से पहले एक बड़ा ट्विस्ट है फिल्म में. वो शॉक के लिहाज़ से थोड़ा सा अच्छा तो है लेकिन लॉजिकल नहीं लगता. उसकी कोई एक्स्प्लेनेशन भी नहीं दी गई. आप अब तक देखी हुई फिल्म को दिमाग में घुमाते हैं तो सवाल ही सवाल खड़े हो जाते हैं.

ऐसा लगता है कि डायरेक्टर को कुछ स्टाइलिश सा बनाना था, जो कि बना भी नहीं है. ऊपर से फिल्म भयानक लंबी है. लगता है एडिटिंग टेबल पर कुछ काम ही नहीं हुआ. और नहीं तो कुछेक गाने ही काट देते. जो बेतुके तो हैं ही, ऐसी-ऐसी अजीब जगह अचानक से आ जाते हैं कि आपका मन करता है उठ के भाग जाएं. डायलॉग्स के डिपार्टमेंट में भी कंगाली ही है. हिंदी का एक फिकरा है, सारी मेहनत पर पानी फेर दिया. फिल्म में एक पुलिस अफसर कहता है, ‘सारी मेहनत पानी में फेर दी तुमने’. और इसी के साथ फिल्म की भैंस पानी में चली जाती है.

लीड पेयर में कोई इमोशनल कनेक्ट महसूस ही नहीं होता.
लीड पेयर में कोई इमोशनल कनेक्ट महसूस ही नहीं होता.

प्रभास और श्रद्धा के बीच कोई केमिस्ट्री नहीं है. जबरन पैदा करने की कोशिश की गई है तो वो ‘धूम-2’ के ऋतिक-ऐश्वर्या की सस्ती कॉपी लगती है. चंकी पांडे, जैकी श्रॉफ, नील नितिन मुकेश, मुरली शर्मा सबका काम एक समान रूप से ख़राब है. यहां तक कि प्रकाश बेलावादी जैसे कमाल के एक्टर भी वेस्ट हुए हैं.

बजट नहीं बचाता फिल्म को

कहते हैं फिल्म में 350 करोड़ रुपए लगे हैं. इसी साल आई ‘गेम ओवर’ महज़ 20 करोड़ में बनी थी और ‘साहो’ से बीस गुना ज़्यादा रोमांचक थ्रिलर थी. एक फिल्म पुराने डायरेक्टर सुजीत को एक बड़ा प्रोजेक्ट सौंपा गया था. उन्होंने मौका गंवाया ही है. ये पैसा, टैलेंट और स्टार पावर सबका वेस्टेज है. ऐसा पहले भी देखा गया है कि छोटे बजट में ठीक-ठाक काम करने वाले डायरेक्टर से बड़ा प्रोजेक्ट संभला नहीं. याद कीजिए ‘तुम बिन’ जैसी स्वीट फिल्म बनाने वाले अनुभव सिन्हा जब शाहरुख के साथ ‘रॉ वन’ लेकर आए तो क्या हश्र हुआ था. कम्प्यूटर ग्राफिक्स कुछ जगह अच्छे हैं. लेकिन इतने बड़े बजट की फिल्म में वो भी न होते तो लानत थी.

दो साल के लंबे गैप के बाद प्रभास को देखना चाहते हैं तो जाइए, वरना और तो कोई वजह है नहीं.

‘साहो’, सह सको तो सहो.


वीडियो:

 

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