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फिल्म रिव्यू: मलंग

‘मलंग’ थिएटर्स में लग चुकी है. देखने वालों ने देख लिया. बाकी थोड़ा देख-पढ़कर जाएंगे. कहानी है अद्वैत और सारा नाम के दो लोगों के बारे में. ये दोनों गोवा में घूमने आए हैं. कुछ दिन साथ में बिताते हैं. प्रेम में पड़ जाते हैं. और फिर ज़िंदगी इनके गले पड़ जाती है. क्रिसमस की रात इस कपल के साथ कुछ ऐसा होता है, जो 6 लोगों की ज़िंदगियां बदलकर रख देता है. उस रात के ठीक पांच साल बाद अद्वैत पुलिसावालों का कत्ल करना शुरू कर देता है. उसकी हिट लिस्ट में अपना नाम देखकर दो पुलिसवाले आगाशे और माइकल उसे पकड़ने में लग जाते हैं. लेकिन इस बीच बहुत सारी चीज़ें घटती हैं. फिल्म में भी और उसके किरदारों की ज़िंदगी में भी. काफी सस्पेंसफुल तरीके से फिल्म आगे बढ़ती है और एक डेंजरस आइडिया के साथ खत्म हो जाती है.

परफॉर्मेंस

फिल्म में आदित्य रॉय कपूर ने अद्वैत ठाकुर नाम के लड़के का रोल किया है. उसके पेरेंट्स अलग हो चुके हैं, इसलिए किसी भी तरह के संबंध बनाने से बचता है. बाद में वही लड़का सीरियल किलर बन जाता हैं. इस कैरेक्टर के दो शेड्स हैं. इन दोनों ही शेड्स में आदित्य रॉय कपूर ठां लगे हैं. खासकर बिल्ट अप फिज़िक वाले ज़ोन में. आदित्य में कोई बड़ी जुनूनी सी चीज़ है, जो डायलॉग बोलते समय उनके चेहरे पर दिखती है. वो अपने करियर में पहली बार कोई एक्शन फिल्म कर रहे हैं. जब वो एक्शन करते हैं, तो लगता है ‘हल्क’ मारकाट मचाए हुए है. भाई, वो आदमी किसी के मारने से हिलता नहीं है और सामने वाले को बिना मेहनत के पीस देता है. फुल कॉन्फिडेंस के साथ. सारा बनी हैं दिशा पाटनी. दिशा को उनके करियर का सबसे लंबा स्क्रीनटाइम इस फिल्म में मिला है. उनकी परफॉर्मेंस के बारे में ये कह सकते है कि उनका जो ऑडिशन टेप लीक हुआ था, वो बस उससे बेटर हो गई हैं. सरप्राइज़ हैं अनिल कपूर और कुणाल खेमू, जिन्होंने (क्रमश:) आंजनेय आगाशे और माइकल रोड्रिगेज़ नाम के दो पुलिस ऑफिसर्स का रोल किया है. आगाशे एक ड्रगी पुलिसवाला है, जिसके ड्रगी बनने की प्रॉपर बैकस्टारी फिल्म बताती है. वो आदमी भयानक तरीके का क्रेज़ी है. दूसरी ओर हैं कुणाल. इन्होंने ‘कलंक’ के बाद यहां भी धांसू काम किया है. बहुत लंबे समय के बाद उन्हें कोई कायदे का रोल ऑफर हुआ और उन्होंने ये मौका दोनों हाथों से लपका है. फिल्म का क्लाइमैक्स उनके किरदार का हाई पॉइंट है.

फिल्म के एक सीन में किलर अद्वैत. ये आदित्य के करियर की पहली एक्शन मूवी है.
फिल्म के एक सीन में किलर अद्वैत. ये आदित्य के करियर की पहली एक्शन मूवी है.

म्यूज़िक और डायलॉग्स

फिल्म का म्यूज़िक और बैकग्राउंड स्कोर शुरुआती आधे घंटे में ऐसा है, जैसे ‘मलंग’ देखने हर आदमी स्टोंड होकर आएगा. भारी बेस वाला. टाइटल ट्रैक थिएटर से निकलने के बाद भी दिमाग में अटक जाता है. ‘हम फिर न मिलें कभी’ भी ठीक है लेकिन उसका प्लेसमेंट बड़ा अटपटा है. बाकी गानों के लिरिक्स आपको कहीं भी नहीं चौंकाते, इसलिए निराशा होती है. फिल्म अपने लिए बढ़िया थ्रिल वगैरह बुन लेती है. आप फिल्म में थोड़ी देर के लिए खो भी जाते हैं. लेकिन किरदारों की बातचीत में कोई लाइन सुनाई नहीं देती, जिसे आप अपने साथ घर लेकर आ सकें. फिल्म के दोनों लीड कैरेक्टर्स ड्रग्स कर रहे हैं. उस दौरान फिल्म उनके दिमाग में घुसने की कोई कोशिश नहीं करती. कि उनके दिमाग में क्या चीज़ें चल रही हैं? उन्होंने क्या सोचा? उनकी पर्सपेक्टिव में कितना बदलाव आया है? कुछ नहीं. फुल फिल्मी माहौल.

अनिल कपूर का किरदार एक भारी नशेड़ी पुलिस ऑफिसर का है. लेकिन वो इस फिल्म का सबसे पॉज़िटिव कैरैक्टर भी है.
अनिल कपूर का किरदार एक भारी नशेड़ी पुलिस ऑफिसर का है. लेकिन वो इस फिल्म का सबसे पॉज़िटिव कैरैक्टर भी है.

अच्छी बातें

फिल्म शुरू होती है एक तगड़े एक्शन सीक्वेंस से, जो पूरा एक कट में शूट किया है. इस शानदार कैमरावर्क के दौरान आपको आदित्य का चेहरा नहीं दिखता है. बस उसके कैरेक्टर के बारे में कुछ चीज़ें पता चलती हैं. यहां से काफी अच्छी शुरुआत होती है. ये फिल्म दो हिस्सों में है. पहला, कहानी का वो पहलू जिसमें आपको एक लड़का सीरियल किलर बना हुआ दिखाई दे रहा है.  पूरी पुलिस डिपार्टमेंट उसे पकड़ने में लगी है. दूसरा वो हिस्सा जहां ये पता चलता है कि वो ये सब कर क्यों रहा है. ये दोनों कहानियां साथ में चलती रहती हैं. पूरी सफाई के साथ. फिल्म की सबसे शानदार बात ये है कि इसके जितने भी मेन किरदार हैं, सबमें पागलपन का पुट है. और इन सबकी अलग-अलग कहानियां हैं, जो फिल्म में सबप्लॉट्स के तौर पर जुड़ती चली जाती हैं, जिनसे ये फिल्म पूरी होती है. अगर फिल्म के पॉज़िटिव पहलू की बात हो रही है, तो ड्रग्स वाले सीन में स्क्रीन पर दिखने वाले संवैधानिक चेतावनियों को जोड़ लीजिए.

दिशा पाटनी अपनी पिछली फिल्मों की तरह इस बार बिलकुल ही दिशाहीन नहीं हैं. लेकिन उनकी परफॉर्मेंस कहीं आपको कुछ फील नहीं करवा पाती.
दिशा पाटनी अपनी पिछली फिल्मों की तरह इस बार बिलकुल ही दिशाहीन नहीं हैं. लेकिन उनकी परफॉर्मेंस कहीं आपको कुछ फील नहीं करवा पाती.

बुरी बातें

अगर आप ढूंढने बैठेंगे, तो किसी चीज़ में दस कमियां निकाल सकते हैं. लेकिन हम यहां सिर्फ उन बुरी चीज़ों के बारे में बात करेंगे, जो नज़र में आ जाती हैं. सबसे पहली चीज़ है गोवा का स्टीरियोटाइप होना. गोवा का नाम सुनते ही हमारे दिमाग में सफेद लाइनें खिंचनी शुरू हो जाती हैं. वहां सिर्फ गांजा, ड्रग्स और सेक्स नहीं होता. आम लोग भी रहते हैं, जो हमें फिल्मों में कभी दिखे ही नहीं. फिल्म पहला हाफ पूरा खर्च करती है, अद्वैत और सारा की कहानी को बिल्ड करने में. इंटरवल तक आप फिल्म की कहानी को ऑलमोस्ट  प्रेडिक्ट कर चुके होते हैं. दूसरे हाफ में चीज़ें काफी तेज़ हो जाती हैं. इस तेजी में दिखाई जा रहीं बहुत सारी चीज़ें अनरियल लगती हैं. कुछ टर्न एंड ट्विस्ट देखने को मिलते हैं, जो उस बिल्ड अप के हिसाब से कम शॉकिंग लगते हैं.

एक साइको पुलिसवाले को रोल में कुणाल की परफॉरमेंस काफी कूल और ट्रिप्पी है.
एक साइको पुलिसवाले को रोल में कुणाल की परफॉरमेंस काफी कूल और ट्रिप्पी है. क्लाइमैक्स में जो भी टर्न एंड ट्विस्ट आता है, वो इनके ही कंधे पर रहता है. 

ओवरऑल एक्सपीरियंस

जब आप ‘मलंग’ देखने बैठते हैं, तब आपकी एक्सपेक्टेशन ‘मरजावां’ जितनी होती है. वहां फिल्म आपको उम्मीद से ज़्यादा देती है. वो निदा फ़ाज़ली वाली लाइन है न- ”हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना”, वैसी ही मलंग के साथ होता है. इसे देखते वक्त आपके दिमाग में ‘एक विलन’ और ‘मर्डर 2’ जैसी फिल्में घूमती रहती हैं. जब हीरोइन अपनी विश पूरी करने वाली बात कहती है, तो ‘रॉकस्टार’ भी दिमाग की खिड़की पर दस्तक दे मारता है. तमाम बातों के बीच हमें ये चीज़ भी स्वीकार करनी चाहिए  कि बहुत अच्छी फिल्म बनने के चक्कर में ‘मलंग’ पूरी तरह खराब भी नहीं हुई है. इस कोशिश के लिए डायरेक्टर मोहित सूरी को नंबर मिलने चाहिए. हालांकि इसे नेल बाइटिंग थ्रिलर भी नहीं कह सकते. अगर अब्बास-मुस्तन स्टाइल थ्रिलर्स के शौकीन हैं, तो देख सकते हैं.

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