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फोर मोर शॉट्स प्लीज़: वेब सीरीज़ रिव्यू

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महत्वाकांक्षी. कपटी. नारीवादी. फूहड़…

लेबल्स हमें डिफाइन नहीं करते. दरअसल एक ही लड़की ये सब हो सकती है. और वो भी एक दिन में. और हां इनमें से कोई भी शब्द हमें शर्मिंदा नहीं करता.


इस वॉइस ओवर के साथ शुरू होती है वेब सीरीज़ ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज़’. इसका 10 एपिसोड्स का पहला सीज़न हाल ही में अमेज़न प्राइम पर रिलीज़ हुआ है. हर एपिसोड औसतन आधे घंटे के लगभग का है. यूं पहला सीज़न हुआ लगभग 5 घंटे का.

सीरीज़ मुंबई में रहने वाली चार लड़कियों की कहानी है.

पहली है जर्नलिस्ट दामिनी (शायोनी गुप्ता), जो परेशान है क्यूंकि जिस न्यूज़ पोर्टल की वो फाउंडर है, वो न्यूज़ पोर्टल उसके न चाहते हुए भी एक पेपराज़ी वेबसाइट बनता जा रहा है. ये न्यूज़ पोर्टल अन्यथा अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए जाना जाता था और दामिनी को उसके काम के चलते लगातार तीन साल तक बेस्ट जर्नलिस्ट का अवार्ड भी दिला रहा था. लेकिन अब इसी में दामिनी और उसका काम, दोनों ही धीरे-धीरे साइडलाइन होते जा रहे हैं. होने को इस वर्कोहॉलिक किरदार की पर्सनल लाइफ में ओसीडी के अलावा कोई उतनी बड़ी दिक्कत नहीं हैं जितनी बाकी बचे तीन किरदारों में.

दूसरी अंजना (कीर्ति कुल्हारी). एक वकील है. डाइवॉर्सी है. उसकी एक तीन-चार साल की लड़की है. एक सिंगल वर्किंग पैरेंट के साथ जितनी भी दिक्कतें हो सकती हैं, वो सब उसके साथ हैं. जहां उसका पति वरुण (नील भूपलम) अब काव्या (अमृता पुरी) नाम की लड़की के साथ मूव ऑन हो चुका है वहीं अंजना अब भी बस ‘मूव ऑन’ की असफल कोशिशों भर में ही लगी हुई है. लेकिन इसकी बेटी, इसका खुद का गिल्ट, काव्या और इसका पति इसे इन कोशिशों में कामयाब नहीं होने दे रहे.

तीसरी है उमंग (गुरबानी). लुधियाना से आई है. ऑलमोस्ट भागकर. बाईसेक्शुअल है. मतलब उसे लड़के या लड़की किसी से भी शारीरिक संबंध बनाने में कोई हिचक नहीं है. उमंग एक जिम इंस्ट्रकटर है, जो बाद में एक एक्ट्रेस समारा कपूर की पर्सनल इंस्ट्रकटर बन जाती है. दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होते हैं जो कि उमंग के लिए कोई नई बात नहीं है लेकिन अबकी बार उमंग समारा के प्रेम में भी पड़ जाती है.

चौथी है सिद्धि पटेल(मानवी गगरू). आम लड़की जिसकी लाइफ में सिर्फ एक विलेन है – मां स्नेहा पटेल (सिमोन सिंह), जिसके लिए सिद्धि,  अपने स्टेट्स सिंबल को बनाने और बढ़ाने का ज़रिया मात्र है. स्नेहा का उद्देश्य है सिद्धि की शादी करवाना. यही मोटो सिद्धि ने भी बना लिया है. इन चारों में यही है जो अब तक वर्जिन है.

इनके अलावा एक पांचवा किरदार भी है जो सीरीज़ में इन चारों के बराबर ही महत्व रखता है. नाम है – जय वाडिया (प्रतीक). एक बार का मालिक और इन लड़कियों का दोस्त.

वेब सीरीज़ का ऑफिशियल बैनर
वेब सीरीज़ का ऑफिशियल बैनर

इन चार लड़कियों की दोस्ती भी कोई बहुत पुरानी या बचपन की नहीं है. जुम्मा जुम्मा चार-पांच साल हुए हैं इनकी दोस्ती को, और इस दोस्ती की नींव जय के ‘ट्रक बार’ में ही पड़ी. तब जब एक शाम चारों ही अपने निजी कारणों के चलते इस बार में ड्रिंक के लिए आईं. यूं जय और उसका बार इस वेब सीरीज़ के पात्र और वेन्यूज़ की लिस्ट में टॉप पर आते हैं और इसी के चलते इस सीरीज़ का नाम भी ‘फोर मोर शॉट्स प्लीज़ है.’

ये हो सकता है कि ऐसे करैक्टर्स आपको रियल ज़िंदगी में देखने को न मिलें. लेकिन ये भी सच है कि जिन परिस्थितियों ये महिलाएं गुज़रती हैं वो कहीं से भी अविश्वसनीय नहीं लगतीं. सीरीज़ की सबसे अच्छी बात ये है कि ये पुरुषों को विलेन दिखाकर नारीवादी बनने की कोशिश नहीं करती. और न ही ये दिखाती है कि स्त्री ही स्त्री की दुश्मन होती है.

भले ही लीड करैक्टर्स के बचपन के फ्लैशबैक दिखाकर उन्हें डेवेलप करने की कोशिश की गई है, लेकिन ये नाकाफी ही लगता है. करैक्टर्स अधूरे से लगते हैं. पूरे पांच घंटे में हमें जितना उनके जीवन के, उनकी सोच के बारे में बताकर और दिखाकर इन करैक्टर्स को लेयर्ड बनाया जा सकता था, सीरीज़ उतना नहीं कर पाती.

इसी तरह सीरीज़ कुछ मुद्दों को भी सिर्फ छू भर के निकल जाती है फिर चाहे वो ‘पीत पत्रकारिता’ हो ‘एलजीबीटीक्यू’ या ‘वर्जिनिटी’. लेकिन इनको ज़्यादा एक्सप्लोर नहीं करने के दो कारण है. एक तो सीरीज़ जिस आयाम में रहकर बनाई गई है वहां ये सब कुछ टैबू या फिर अपवाद नहीं नॉर्म है. साथ ही एंटरटेनमेंट के लिए इश्यूज़ को भारी बनाने से बचा गया है. यूं ये सीरीज़ अपने मूल में एक एंटरटेनर ही है.इसलिए सीरीज़ की सबसे बड़ी खामी इसमें बहुत ज़्यादा ‘संभावनाओं’ का होना, लेकिन उनको कैश न करा पाना रहा है.

चार लड़कियां अलग-अलग बैकग्राउंड से. अलग अलग वैल्यूज़ वालीं.
चार लड़कियां अलग-अलग बैकग्राउंड से. अलग अलग वैल्यूज़ वालीं.

वैसे जिस तरह से सीरीज़ एपिसोड-दर-एपिसोड इंटेंस होती चली जाती है उससे सीज़न टू को लेकर एक उम्मीद बंधती है.

अगले सीज़न की बात इसलिए क्यूंकि सीरीज़ का एंड ऐसे होता है कि आप श्योर होते हैं कि इसका दूसरा सीज़न आएगा ही आएगा. ये भी इस सीरीज़ के पहले सीज़न की सबसे बड़ी कमज़ोरियों में से एक है. बेशक आप अगले सीज़न की जगह रखते लेकिन इस सीरीज़ का भी एक कंप्लीट सर्कल पूरा करते तो सीरीज़ और ज़्यादा संतुष्ट करती. इस सीरीज़ के साथ ये दिक्कत हमेशा से ही बनी रही. पहले इसका टीजर बड़ा प्रॉमिसिंग लगा. फिर इसका ट्रेलर. फिर इसका पहला सीज़न. गोया हर शै यही वादा कर रही हो – अच्छे दिन आने वाले हैं.

सीरीज़ में बैकग्राउंड स्कोर की जगह कई जगहों पर अंग्रेज़ी गीतों का इस्तेमाल किया गया है, जो प्यारा लगता है. सीरीज़ का टाइटल सॉन्ग भी बढ़िया है और सीरीज़ की ओवरऑल फील को भी अच्छे से अभिव्यक्त करता है. इन गीतों का ज्यूक बॉक्स या कोई एल्बम निकले तो मैं उसे ज़रूर सुनना चाहूंगा. हां मगर इसका एक प्रमोशनल गीत ‘यारा तेरी यारी’ उतना प्रभावित नहीं करता.

देविका की स्टोरी और इशिता के डायलॉग आपको कई जगहों पर इमोशनल करने का माद्दा रखते हैं. लेकिन ये सब ‘टू लिटिल टू लेट’ की कैटगरी में आता है. टू लिटिल इसलिए क्यूंकि ये चीज़ें लगातार आने के बदले टुकड़ों में आती हैं. टू लेट इसलिए क्यूंकि जब तक सीरीज़ की स्टोरी डेवलप होना शुरू होती है तब तक आपका इसमें इंटरेस्ट नहीं बना रह पाता. इसलिए वे लोग, जो इसके तीन चार एपिसोड देखकर क्विट कर चुके हैं उनके लिए हमें यही कहना है कि आगे देखिए, सीरीज़ इंट्रेस्टिंग होती चली जाएगी.

इन चार लड़कियों के अलावा लेफ्ट में दिखाई दे रहा करैक्टर भी स्टोरीलाइन के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है. नाम है जय वाडिया (प्रतीक).
इन चार लड़कियों के अलावा लेफ्ट में दिखाई दे रहा करैक्टर भी स्टोरीलाइन के हिसाब से बहुत महत्वपूर्ण है. नाम है जय वाडिया (प्रतीक).

सीरीज़ में दिखाए गए मुंबई के कई सीन बड़े प्यारे लगते हैं. जैसे चारों लड़कियों का एक समंदर किनारे ड्रिंक करने वाला सीन या मरीन ड्राइव का छोटा सा दीवाली वाला सीन. गोवा में वीकेंड वाली पार्टी की एनर्जी स्क्रीन से आपके भीतर तक पहुंचने का माद्दा रखती है. उस एनर्जी में एक फ्रेशनेस भी है. यूं रागिता प्रीतिश नंदी और अनु मेनन का निर्देशन कुछ अभिनव प्रयोग के बिना भी रिफ्रेशिंग लगता है.

सीरीज़ पहली नज़र में आपको ‘वीरे दी वेडिंग’ नाम की मूवी का एक्स्टेंशन भी लग सकती है. क्यूंकि दोनों ही विमेन ओरिएंटेड कंटेंट हैं, दोनों ही चार दोस्तों की कहानी हैं और दोनों में ही कॉस्मोपॉलिटन कल्चर दिखाया गया है. लेकिन जैसे-जैसे सीरीज़ आगे बढ़ती है दोनों के ट्रैक एक दूसरे से दूर होते चले जाते हैं.

कई लोगों को लगेगा कि इसमें ज़रूरत से अधिक सेक्स और अश्लीलता है. लेकिन मेरा मानना अलहदा है. सेक्स तो बेशक इसमें सामान्य से अधिक है लेकिन ये आवश्यकता से अधिक हो ऐसा नहीं लगता. अश्लीलता की परिभाषा में भी ये फिट नहीं बैठता. क्यूंकि जब-जब स्त्री विमर्श होगा, तब-तब यौन स्वच्छंदता की बात ज़रूर होगी. यूं चाहे ऐसा करने में ईमानदारी बरती गई हो या बड़ी चालाकी से ऐसा किया गया हो लेकिन सभी सीन स्क्रिप्ट की मांग लगते हैं और उसे आगे बढ़ाते हैं.

इस वीकेंड अगर फ्री समय हो तो बिंज वॉचिंग कर सकते हैं.


वीडियो देखें:

फिल्म रिव्यू: ठाकरे –

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