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रिव्यू: कैसी फिल्म है वजीर, देखने जाएं क्या?

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हीरो हीरोइन कौन हैं
अमिताभ बच्चन, फरहान अख्तर, अदिति राव हैदरी, मानव कौल, जॉन अब्राहम, नील नितिन मुकेश, सीमा पाहवा
कितनी लंबी है: 1 घंटा 44 मिनट
कितने स्टार दिए: 2.5

फरहान अख्तर दिल्ली में हैं. पुलिस अफसर हैं. मुसलमान हैं. एक दिन उनका मन करता है चाय पिएं. लड़की चाय लेकर आती है. लड़का कप उठाता है. दोनों मुस्कुराते हैं. और हमेशा की तरह रोमेंटिक गाना बजने लगता है. जब तक खत्म होता है, तब तक निकाह, हनीमून, बेबी होना और उसके साथ फैमिली हॉलीडे पूरा हो जाता है.

अब कुछ ट्विस्ट लाते हैं. क्योंकि सेटअप बोरिंग हो गया है. फरहान फैमिली के साथ कहीं जा रहे हैं. तभी एक गुंडा दिखता है. एकदम कराची लेवल का. मुच्छड़ पीछा करता है. धांय धांय. और हो जाता है कांड. फरहान की बीवी अदिति का रो-रो के बुरा हाल. दोनों में कट्टी. और वर्दी वाले का अब एकै मकसद. इंतकाम.

फिर पर्दे पर आता है बूढ़ा आदमी. बच्चन अमिताभ. ये पंडित जी बच्चों को शतरंज सिखाते हैं. पीछे से उसकी कविता भी बजती है. खेल खेल में. और ऐसे ही एक दिन कुछ संयोग ऐसे कि फरहान भी उसके दरवाजे पर. हादसे के बाद भांय भांय सन्नाटा झेल रहे अख्तर को पंडित जी शतरंज में सुकूं देते हैं. बदले में लेते हैं दोस्ती.

पर पंडित का भी एक अतीत है. उसे भी बदला लेना है. गुंडा एक है. दुश्मन दो. जंजीर वाला बच्चन, जो अब बूढ़ा है. तो बाजू कमजोर, मगर दिमाग महाशातिर. और जंजीर लिखने वाले जावेद अख्तर का लौंडा फरहान. जो अब जवान है. भाग मिल्खा भाग में दौड़ा इत्ता है कि अब तक नसें कड़क.
और उधर के पाले में जो विलेन हैं. वो बॉर्नवीटा का दुद्दू तो पी नहीं रहे. मंत्री हैं. आतंकवादी हैं. गुंडे हैं. कश्मीर कनेक्शन है. तो क्लाशिनकोव भी होंगी. हार-जीत. लस्त-पस्त. आखिर में होता है इंसाफ. पर देवी के दोनों तराजू पर खून तुलता है.

बाकी ऐसा है न सर जी. कि थ्रिलर है, तो ज्यादा खोलेंगे तो खोल दिए जाएंगे. और जो आप भी अगर फिल्म देख आओ तो मुंह न खोलना. इस तरह के खुलासे करने वालों को ऐसा श्राप लगता है कि छिपी खुली जगह पर असर दिखता है. बम भोले.

कहानी को लेकर उम्मीद थी. अभिजात जोशी का नाम आ रहा था ट्रेलर में. वही, जिन्होंने मुन्ना भाई, 3 ईडियट्स और पीके लिखी. पर असल में फिल्म का बेसिक प्लॉट प्रॉड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा का था. इसे वह दसियों साल से हिलगाए घूम रहे थे. अब आप समझ ही गए होंगे. कि इस खिचड़ी में घी-मटर कहां को सरका. और इसीलिए बैलेंस गड़बड़ा गया. फिल्म टुकड़ों टुकड़ों में अच्छी लगती है. सेकंड हाफ के आखिर में फिल्म का सस्पेंस बताने से पहले ही समझ आने लगता है. एक्टिंग. सबने बढ़िया की है. बच्चन अमिताभ, अदिति, फरहान. पर आप बदमाश मंत्री बने मानव कौल पर गौर करिएगा. वो गंगाजल 2 में भी नजर आएंगे. थिएटर वाली तैयारी दिखती है उनमें.

अमिताभ पर क्या कहें. सुसुरा शराब से भरी मर्तबान है. एक जरा ढक्कन खोलो और पूरे कमरे में चीड़ सी खुशबू. काफिर हैं कि इसे स्कॉच कहे जाते हैं. ओंकार धर के रोल में उन्होंने कई रंग दिखाए अपने कभी सुफेद तो कभी जर्द चेहरे पर.

फरहान चुस्त हैं. आखिर में वो जब बच्चन के साथ अतरंगी यारी गाते दिखते हैं रेकॉर्डिंग स्टूडियो में, तब बहुत अच्छे लगते हैं. ऊऊऊ करवाने के लिए गेस्ट रोल में जॉन अब्राहम हैं. और घिसे पिटे ट्विटर जोक्स को और ऑक्सीजन देने के लिए नील नितिन मुकेश भी. लेकिन आज तो गुरु अदिति पर बात होगी. रुहाना बनी हैं वो वजीर में. क्या आंखें हैं. जितना बोलती हैं, उसका दूना छिपा जाती हैं. आवाज. कुछ कहे, कुछ रहे और हलक हट्ट खट्ट छोड़ बाहर आने को उतावला. मगर बिना आवाज के. कि कहीं अदिति रुक न जाए. एक तिलिस्म है ये औरत. जो चले तो हरारत. रुके तो धरती भी घूमना भूल जाए. कहे तो कहकहे सांस पाएं. और सहे, तो बस एक ही दुआ उठे. सब जमींदोज क्यों नहीं हो गया, इस आंसू के जमीं पर गिरने से पहले.

मैं ये फिल्म एक बार और अदिति राव हैदरी के लिए देख सकता हूं. बाप दादा शायद रेखा के लिए यूं ही न्योछावर हुए होंगे. कॉलेज के दिनों में ऐसे ही बांध लिया था चित्रांगदा ने. और अब फिर लौटती बारिशों के इंतजार में कोंपल फूट रही है.

AditiRaoHydari-Wazir

वजीर देखें अगर इसकी एक्टर लाइन में किसी के फैन हैं. आतंकवाद, सियासत और चोर-पुलिस वाली कहानी पसंद है. या फिर शतरंज के मुरीद हैं. पर याद रखें, इन सबके बीच मियां बीवी का प्यार और दोस्ती भी देखनी होगी. जो हौले से होती है. इन सबके बावजूद फिल्म चुस्ती पूरी तरह नहीं खोती. इसके डायलॉग्स उम्दा हैं. और जॉनर नया है. इसलिए एक चांस दे सकते हैं. डायरेक्टर बिजॉय नांबियार ने ‘शैतान’ वाला टच खोया नहीं है पूरी तरह.


और हां, वजीर के गाने ऐसे हैं कि साल भर आपकी मोबाइल प्ले लिस्ट पर रहेंगे. ब्रेकअप के बाद और तनहा रातों में काफी याद आएंगे ये.

बारिशें कितनी दिल से गुजरीं
मेरी आंखें न भीगीं कभी
तू अगर पल भर दूर जाए
बादलों सा मैं रो दूं अभी– मनोज मुंतसिर

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