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भारत: मूवी रिव्यू

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सन 1983. इंडिया वर्सेज़ वेस्ट इंडीज का फाइनल मैच चल रहा है. दसियों लोग इकलौते ब्लैक एंड वाइट टीवी को घेरकर खड़े हैं. इसी भीड़ में दो लोगों को हम जानते हैं. दोनों हम-उम्र हैं. दोनों की उम्र करीब 42-43 साल. इधर इंडिया के विकेट धड़ाधड़ गिर रहे हैं उधर इन दोनों की ज़िंदगी में अलग ही तूफ़ान आया हुआ है. ये हम लोगों को पता है कि वो मैच और उस साल का वर्ल्ड कप लास्ट में इंडिया जीतती है. इंडिया. यानी भारत. जो हमें नहीं पता है वो है इन दो अधेड़ लोगों का भविष्य, जिन्होंने नया-नया पढ़ना-लिखना सीखा है.

ऊपर जिस सीन की बात हमने की है, वो सलमान खान की (इन एंड एज़) मूवी ‘भारत’ का एक सीन है. और वो दो लोग है- भारत (सलामन खान) और विलायत खान (सुनील ग्रोवर). हमने इस सीन की बात इसलिए की क्यूंकि इस सीन में वो मेहनत, वो डिटेलिंग साफ़ दिखती है, जो किसी भी पीरियड मूवी के लिए ज़रूरी हो. ये एक सीन फिल्म और भारत की कहानी के लगभग बीच का सीन है.

कहानी, जिसमें एक 7 साल का बच्चा है, जिसका नाम उसके पिता (जैकी श्रॉफ) ने भारत रखा है, आज़ादी के वक्त हुए भारत-पाक बंटवारे में अपने पिता और अपनी एक बहन से जुदा हो जाता है. और फिर ‘भारत’ बन जाती है भारत के अपनी बिछड़ गई फैमिली के लिए किए गए लंबे इंतज़ार की कहानी है. 63 साल लंबे इंतज़ार की कहानी. क्या 70 साल बाद उसका इंतज़ार खत्म होता है? ये तो फिल्म के क्लाइमेक्स में ही पता चल पाएगा. क्लाइमेक्स जो न तो पूरी तरह दुखांत न पूरी तरह सुखांत है. वो ठीक एक उम्मीद के बराबर बिटर-स्वीट है. एक नए भारत की उम्मीद के बराबर.

इस फिल्म में पहले कैटरीना नहीं प्रियंका को लिया जाना था, लेकिन फिर उन्होंने शादी के चक्कर में फिल्म से कट्टी कर ली.
इस फिल्म में पहले कैटरीना नहीं प्रियंका को लिया जाना था, लेकिन फिर उन्होंने शादी के चक्कर में फिल्म से कट्टी कर ली.

हां, जहां तक सवाल है कि अपने 70 सालों के इंतज़ार के दौरान, यानी पूरी फिल्म के दौरान, नायक क्या करता है तो इसका उत्तर है – बहुत कुछ. विलायती सरीखा दोस्त बनाता है. राधा (दिशा पाटनी) सरीखी पार्टनर बनाता है. कुमुद (कैटरीना कैफ) सरीखी लाइफ पार्टनर बनाता है. सर्कस से लेकर मालवाहक जहाज और तेल की खदानों तक में काम करता है. आदि-आदि.

एक्टिंग की बात करें तो सलमान खान और कैटरीना कैफ से अगर हम एक्टिंग की उम्मीद कर रहे हैं तो ये तो एक दर्शक के रूप में हमारी ही ओवर एक्सपेक्टेशन है. लेकिन सुखद बात ये है कि दोनों पूरी तरह एक्सप्रेशनलेस नहीं हैं. सलमान खान रोते हुए बहुत बुरे लगते हैं, हंसते वो कहीं पर हैं नहीं. ये अली अब्बास की ‘हम आपके हैं कौन’ टाइप मूवी है, जिसमें सलमान ‘बागबान’ टाइप हैं.

सुनील ग्रोवर ने अपने अभी तक के कैरियर का सबसे अच्छा काम किया है. उनके रोल की लंबाई और गहराई भी अभी तक की अधिकतम है. लेकिन उसमें सुनील ग्रोवर कहीं नहीं हैं. यानी ह्यूमर कहीं नहीं है. फिल्म के स्टार्ट में जैकी श्रॉफ और क्लाइमेक्स में तब्बू प्रभावित करती हैं. जो कि ऑब्वियस है. लेकिन दिशा, पतानि इस फिल्म में क्यूं हैं?

ओवर ऑल मूवी की बात करें तो भारत दरअसल एक इंटेलिजेंट मूवी है, जो दर्शकों को खुश करने के लिए इमोशन का ‘ओल्ड स्कूल’ तड़का तो मारती है, लेकिन ‘क्रिएटिव लिबर्टी’ के नाम पर कुछ ऐसा नहीं दिखा जाती जो गले उतरना असंभव हो. या जो अतार्किक हो.

पहले कुंभ में परिवार बिछड़ते थे. आजकल बंटवारे में बिछड़ रहे हैं. ये नए भारत का नया बॉलीवुड है.
पहले कुंभ में परिवार बिछड़ते थे. आजकल बंटवारे में बिछड़ रहे हैं. ये नए भारत का नया बॉलीवुड है.

ये इसलिए भी एक इंटेलिजेंट मूवी है क्यूंकि ये कुछ नया करने का प्रयास न करते हुए सक्सेस के स्थापित ढर्रों, या आजकल हिट फिल्मों के जो टेम्पलेट हैं उनपर बना ली गई है. और यूं बॉक्स ऑफिस के हिसाब से ये कैलकुलेट रिस्क हो जाती है.

इस तरह की फिल्मों की पहचान होती है इनके उन कुछ ऐसे सिक्वेंसेज़ से जो आपको पहले भी देखे-देखे से लगते हैं. जैसे-

# उदास सीन को लाइट बनाने के लिए उसे ब्लैक-एंड वाइट बना देना आप थ्री-इडियट्स में भी देख चुके हैं.

# टीवी चैनल्स और भीड़ का उपयोग जोश और इमोशन जगाने के लिए भारत से पहले रंग दे बसंती के क्लाइमेक्स में भी हो चुका है.

बाकी भाग मिल्खा भाग से लेकर हॉलीवुड की फ़ॉरेस्ट गंप जैसी कई मूवीज़ इसे देखते हुए ज़हन में आती रहेंगी. कई बार स्क्रिप्ट के चलते तो कई बार कॉन्सेप्ट के चलते.

और हां, शायद इसी कैलकुलेटेड रिस्क के चलते डायरेक्टर ने नई स्क्रिप्ट के बदले रीमेक पर अपना दांव आजमाया है. यूं भारत, एक कोरियन मूवी ‘ओड टू माय फादर’ की ऑफिशियल रीमेक है.

ओड टू माय फादर भी विभाजन और लंबे इंतज़ार की कहानी है. वहां साउथ और नॉर्थ कोरिया था, यहां भारत पाकिस्तान है.
‘ओड टू माय फादर’ भी विभाजन और लंबे इंतज़ार की कहानी है. वहां साउथ और नॉर्थ कोरिया था, यहां भारत पाकिस्तान है.

डायरेक्टर अली अब्बास ज़फर की ‘सुल्तान’ और ‘टाइगर ज़िन्दा है’ के बाद सलमान के साथ ये तीसरी फिल्म है. पिछली दोनों फ़िल्में सुपरहिट रही थीं. और चूंकि विनिंग कॉम्बिनेशन कौन ही बदलता है, इसलिए अगर इस फिल्म में भी आप कहीं-कहीं टाइगर को जिंदा पाएं तो इसे ‘सक्सेस इफेक्ट’ ही जानिए.

फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट इसकी डिटेलिंग है. बाकी पीरियड मूवीज़ में तो फिर भी कोई एक काल और कोई एक देश पर्दे पर दिखाना होता है, लेकिन इस फिल्म में ये टास्क इसलिए और भी बड़ा हो जाता है क्यूंकि इसकी कहानी जहां देश के हिसाब से भारत, पाकिस्तान, मिडिल ईस्ट तक फैली है, वहीं काल के हिसाब से आज़ादी यानी 1947 से लेकर 2010 तक.

2010 में आपको स्नेक के गेम वाले मोबाइल दिखेंगे तो पीछे आपको दूरदर्शन और क्राउन के टीवी. हां कुछेक जगह इन डिटेलिंग के चूक हुई है, लेकिन जब गेम ऑफ़ थ्रोंस के किसी सीन में पानी की बोतल और स्टारबक्स का कप दिख सकता है तो ये चूकें भी पाच्य हैं. उदाहरण स्वरूप –

# 25 जून, 1983 को समाप्त हुए क्रिकेट वर्ल्ड कप के 6 महीने बाद भी आपको बैकग्राउंड में जून 1983 का कैलेंडर दिखता है.

# ज़ी टीवी का लोगो 2010 में भी वो नया वाला है जो दरअसल 15 अक्टूबर, 2017 को अस्तित्व में आया था.

जैकी श्रॉफ वो पिता हैं, जिनसे किए गए एक वादे पर भारत (मूवी और किरदार दोनों) टिके हैं.
जैकी श्रॉफ वो पिता हैं, जिनसे किए गए एक वादे पर भारत (मूवी और किरदार दोनों) टिके हैं.

बात करें इसके सबसे बड़े माइनस पॉइंट की तो वो है इसका ह्यूमर कोशेंट. तब जबकि फिल्म में कई इसे हल्की-फुल्की कॉमेडी मूवी बनाने का प्रयास किया गया है फिर भी वो इतनी बुरी तरह फेल होता है कि आपको सुनील ग्रोवर भी कॉमिक रिलीफ नहीं दे पाते. उनके और बाकी सभी किरदारों के फ्लैट होने के चलते फिल्म भी फ्लैट हो जाती है. और केवल क्लाइमेक्स के लिए बिल्ड अप का काम करती है.

डायलॉग इसका एक और माइनस पॉइंट है. जैसे-

# ह्यूमर के नाम पर– अरब में तेल निकला है, तो क्या सर पे लगाएंगे.

# और इमोशन के नाम पर- मेरे बाबूजी ने देश के नाम पर मेरा भी नाम रखा है.

विशाल शेखर और इरशाद कामिल अपने इस म्यूज़िक एल्बम के वजह से नहीं जाने जाएंगे, ये तो निश्चित है. लेकिन कुछ पंजाबी बीट्स और विशाल ददलानी का गाया ‘ज़िन्दा हूं मैं तुझमें’ प्रभावित करते हैं.

अंत में यही कहना होगा कि 20 प्रतिशत फ़िल्में बेहतरीन होती हैं. 20 प्रतिशत निकृष्ट. भारत बाकी की 60 प्रतिशत फिल्मों में आती है. कुछ लोगों के लिए थोड़ी ऊपर, कुछ लोगों के लिए थोड़ी नीचे.


 

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