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क्या आप भी 40 हज़ार किसानों वाले लॉन्ग मार्च के स्पॉन्सर को जानना चाहते हैं?

महाराष्ट्र की सरकार किसान और आदिवासियों की सुन नहीं रही थी. तो वो अपनी बात कहने सरकार के घर यानी मुंबई गए. 180 किलोमीटर पैदल चलकर. अब उनकी मांगें मान ली गई हैं. लेकिन इस मार्च को कई लोग लेफ्ट की राजनीति बताकर खारिज कर रहे हैं तो कुछ लोग पूछ रहे हैं कि इस मार्च के लिए पैसा कहां से आया. इन लोगों की मानसिकता पर कुछ बातें.

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40 हज़ार लोग छह दिन तक पैदल चले. नासिक से मुंबई. करीब 180 किलोमीटर. रास्ते में खाना-पीना सब अपने पैसे से. कहीं कोई हिंसा, तोड़-फोड़ नहीं हुई. कहीं से अव्यवस्था की कोई खबर नहीं आई. लॉन्ग मार्च मुंबई पहुंचा, तब भी कहीं से भी मार्च के चलते जाम की खबर नहीं आई. गज़ब का अनुशासन. किसी ‘आम आदमी’ को कोई तकलीफ नहीं हुई. क्योंकि सारी तकलीफों का ठेका मार्च में चल रहे लोगों ने ले रखा था. रात को सड़क किनारे सोते थे, खुले आसमान के नीचे. लंबे रास्ते के लिए इनके पास कोई ‘ट्रेकिंग गेयर’ नहीं था. जिसके पास चप्पल थी, वो चप्पल डालकर मोर्चे में आ गया था. जिसके पास नहीं थी, वो बिना चप्पल आ गया.

रास्ता लंबा था, तो चप्पल टूट गई. नंगे पांव जो चले, उनका तलवा घिस गया. जुमले में नहीं, सच में घिस गया. लेकिन आपको तो हर चीज़ का प्रूफ मांगता न, तो हमने फोटू लगा दी है.

कई किसानों के तलवे खुल गए थे. घाव हो गया था. (फोटोःफेसबुक)
कई किसानों के तलवे खुल गए थे. घाव हो गया था. (फोटोःफेसबुक)

इन छालों के बाद भी इनमें इतना धीरज बाकी था कि इन्होंने देवेंद्र फडणवीस की अपील सुनी (जो किसानों की नहीं सुन रहे थे) और मार्च की आखिरी रात पड़ाव नहीं डाला. चलते रहे कि बोर्ड के पेपर देने जा रहे बच्चे जाम में न फंसें. जब ये मुंबई पहुंचे, तो लोगों ने इनका स्वागत किया. किसी ने पानी की बोतल बांटी, किसी ने खाना, तो किसी ने नंगे पांव चल रहे किसानों में चप्पलें बंटवाईं. लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो आराम से बैठकर स्मार्टफोन पर उंगलियां फिरा रहे थे और मार्च पर सवाल उठा रहे थे. इनमें से किसी ने ये गणित लगाया था –

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इस गणित के हिसाब से मार्च में चल रहे लोगों की टोपियों, झंडों और खाने का हिसाब लगाकर 1.26 करोड़ की रकम निकाली गई. पूछा जा रहा है कि इस रकम को किसने चुकाया, लॉन्ग मार्च का स्पॉन्सर कौन है?

ये सवाल यूं तो पूरे सोशल मीडिया पर चटखारे लेकर पूछा गया, लेकिन इसकी शुरुआत संभवतः एक ट्वीट से हुई. संभाजी भिड़े नाम का ये ट्विटर अकाउंट असल संभाजी भिड़े का नहीं है. संभाजी कौन हैं, ये जानने के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. तो ये ट्विटर अकाउंट संभाजी के नाम से चल रहा एक फैन अकाउंट है. लेकिन इस ट्वीट को खूब रिट्वीट और लाइक किया गया. इससे ये मालूम चलता है कि काफी सारे लोग इस तरह से सोच रहे थे या सोचने लगे.

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देने को इस बात का सविस्तार जवाब दिया जा सकता है. लेफ्ट के और आंदोलनों की तरह ही इस आंदोलन में भी लोगों से अपनी ज़रूरत का अनाज घर से लाने को कहा गया था. कुछ पैसे भी रखने को कहा था कि रास्ते में किसी इमरजेंसी में काम आ सके. और टोपी-झंडे थे, लेकिन हर किसी के पास नहीं थे. ये लोग झंडा उठाने या ‘क्रांति’ करने मुंबई नहीं गए थे. ये मुंबई इसलिए गए थे कि सरकार को बता सकें कि वो मर रहे हैं.

किसी भी आंदोलन में सबसे प्रमुख मांगें होती हैं. तो बहस उसी के इर्द गिर्द रहने की अपेक्षा की जाती है. स्पॉन्सर का सवाल तब खड़ा होता है जब आंदोलन की मांगें स्पष्ट तौर पर किसी को फायदा पहुंचाती हैं. या उस आंदोलन के कृतिम होने का आभास होता है. लॉन्ग मार्च की मांगें किसानों और आदिवासियों के अलावा किसी को फायदा नहीं पहुंचातीं. उसका नेतृत्व कर रही सीपीएम को भी नहीं.

स्पॉन्सर वाला सवाल जिस तरह पूछा गया है, वो तरीका अपने आप में एक एलीटिस्ट सोच का नतीजा है. चार किताब और थोड़ी सी अंग्रेज़ी पढ़ लिए ये लोग ‘रीडिंग बिटवीन द लाइन्स’ नाम की बीमारी के शिकार हैं. और ज़्यादातर ये लोग गलत ही पढ़ लेते हैं. पूछने को तो ये भी पूछा जा सकता है कि स्पॉन्सर होने में बुराई ही क्या है? क्या स्पॉन्सर होने से तलवा फटने पर होने वाली तकलीफ कम हो जाती? या खून कम निकलता? या ये मांग छोटी हो जाती कि पिचकी छाती वाले किसान का कर्जा माफ हो जाए वर्ना वो मर जाएगा?

सच पूछिएगा तो इस लॉन्ग मार्च का स्पॉन्सर डर था. अपने और अपने परिवार के फांसी लगके मर जाने का डर. या फंदा न मिले तो भूखे मर जाने का डर. या भूख न मारे तो सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाते हुए बेदम होकर मर जाने का डर. ये स्पॉन्सर न होता तो चालीस हज़ार लोग कभी न जुटते. पैसे देने वाले स्पॉन्सर तलवा फटने के बाद नहीं चलवा पाते. डर चलवा लेता है.

आलोचना से परे कुछ भी नहीं है. लॉन्ग मार्च भी नहीं. लेकिन जब समझदारी झाड़ने के चक्कर में ज़मीन से जुड़े किसी आंदोलन को इतने हल्के अंदाज़ में खारिज किया जाता है तो सामने वाले की मंशा पर सवाल खड़े होते हैं.

खैर, जिन्होंने ये सवाल पूछा है, उनके दिमाग समझने वाले होते तो ये सवाल उनके दिमाग में आता नहीं. लेकिन फिर भी हमने अपना काम कर दिया है. आगे अल्लाह मालिक.

जाते-जाते ये देख लीजिए और जवाब सोचिए-

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Asking who sponsored the Kisan Long March in Maharshtra is a sign of crass elitism

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