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खत्म नहीं हुआ राजद्रोह कानून? BNS की धारा 152 पर हाई कोर्ट की टिप्पणी से उठा सवाल

इसी फैसले में कोर्ट ने आगे ये भी कहा कि तार्किक असहमति या आलोचना को राजद्रोह या देश-विरोधी गतिविधि नहीं कहा जा सकता है.

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23 दिसंबर 2024 (अपडेटेड: 23 दिसंबर 2024, 08:02 PM IST)
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सांकेतिक तस्वीर. (क्रेडिट - AP)
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राजस्थान हाई कोर्ट ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा-152 की आलोचना करते हुए कहा है कि असल में ये पुराने राजद्रोह कानून को ही दूसरे नाम के साथ लाया गया है. पिछले हफ्ते एक फैसले में कोर्ट ने कहा कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा-124(A) के तहत राजद्रोह के अपराध को BNS के जरिये खत्म कर दिया गया, लेकिन इसकी धारा-152 के नए प्रावधान में उसी तरह की शब्दावलियों का इस्तेमाल किया गया है. कोर्ट ने ये भी कह दिया कि तार्किक असहमतियों को दबाने के लिए इस कानून का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए.

IPC-1860 में बदलाव के लिए मोदी सरकार भारतीय न्याय संहिता लेकर आई थी. ये संहिता इस साल 1 जुलाई 2024 से लागू हो गई. इसी की धारा-152 में लिखा है कि भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले किसी भी काम को अपराध माना जाएगा और इसके लिए आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है. सरकार ने दावा किया था कि अब राजद्रोह कानून खत्म कर दिया गया है.

कोर्ट ने और क्या कहा?

16 दिसंबर को राजस्थान हाई कोर्ट एक सिख उपदेशक की याचिका पर फैसला सुना रहा था. खालिस्तान समर्थक सांसद अमृतपाल सिंह के प्रति सहानुभूति जताते हुए उन्होंने फेसबुक पर एक वीडियो पोस्ट किया था. इसी वजह से उनके खिलाफ BNS की धारा-152 और धारा-197 के तहत केस दर्ज हुआ था.

इसी मामले पर जस्टिस अरुण मोंगा की सिंगल जज बेंच ने सख्त टिप्पणी की है. बेंच ने कहा,

"ये धारा (BNS-152) उन गतिविधियों को आपराधिक मानती है, जो अलगाव, सशस्त्र विद्रोह, विध्वंसकारी गतिविधियों या अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देकर देश की स्थिरता के लिए खतरा पैदा करती है. प्रथम दृष्टया, ऐसा लगता है कि धारा 124-A (राजद्रोह) को ही दूसरे नाम से लाया गया हो. ये बहस का मुद्दा हो सकता है कि दोनों प्रावधानों (नए और पुराने कानूनों) में कौन सा ज्यादा कठोर है."

इसी फैसले में बेंच ने आगे कहा कि तार्किक असहमति या आलोचना को राजद्रोह या देश-विरोधी गतिविधि नहीं कहा जा सकता है. कोर्ट ने आगे कहा, 

“किसी के भाषण और बगावत या अलगाव की संभावित गतिविधियों के बीच डायरेक्ट लिंक होने पर ही इस तरह के प्रावधानों का इस्तेमाल करना चाहिए… इस प्रावधान को असहमति के खिलाफ हथियार के तौर पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक कवच के तौर पर देखा गया था.”

BNS की धारा-152 कहती है कि अगर कोई जानबूझकर या सुनियोजित तरीके से, बोलकर, लिखकर, संकेत, ऑनलाइन, वित्तीय साधन के जरिये, अलगाव या सशस्त्र विद्रोह में शामिल होता है या इसे बढ़ावा देता है और भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालता है या ऐसे अपराध में शामिल होता है, तो उसे आजीवन कारावास तक की सजा होगी.

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इसके अलावा, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ धारा-197 के तहत दर्ज आरोपों को भी खारिज कर दिया. और कहा कि अगर कोई अभिव्यक्ति अगर आलोचनात्मक है लेकिन उससे हिंसा या घृणा नहीं भड़कती है तो इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए.

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