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मुंबई के चर्चित लीलावती अस्पताल में 1250 करोड़ के गबन का आरोप, 'काला जादू' वाला क्या एंगल है?

मामले से जुड़ी FIR में आरोप लगाया गया कि आरोपियों ने लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट (LKMMT) के कथित सदस्य के रूप में काम करते हुए घोटाले को अंजाम दिया. उन्होंने अन्य आरोपी कंपनियों के साथ-साथ उनके निदेशकों के साथ मिलीभगत करके घोटाला किया.

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Lilavati Hospital files Rs 1,250-crore embezzlement case against 7 ex-trustees and 10 others
परमबीर सिंह ने जानकारी दी कि मौजूदा मामला पूर्व ट्रस्टियों के खिलाफ दर्ज तीसरी FIR है. (फोटो- ANI)
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प्रशांत सिंह
11 मार्च 2025 (अपडेटेड: 12 मार्च 2025, 10:02 PM IST)
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मुंबई के चर्चित लीलावती अस्पताल में 1250 करोड़ रुपये के गबन का मामला सामने आया है. अस्पताल ट्रस्ट ने यहां के पूर्व ट्रस्टियों, उपकरण सप्लायर्स और वेंडरों पर कथित गबन को लेकर FIR दर्ज कराई है. 7 पूर्व ट्रस्टियों सहित कुल 17 लोगों के खिलाफ शिकायत दर्ज हुई है. बताया गया है कि मामले में अब तक तीन FIR दर्ज हो चुकी हैं.

लीलावती अस्पताल के कार्यकारी निदेशक परमबीर सिंह ने 11 मार्च को इसे लेकर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक मुंबई के पूर्व पुलिस कमिश्नर रहे परमबीर सिंह ने कहा,

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प्रशांत किशोर मेहता ने FIR में आरोप लगाया कि आरोपियों ने लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट (LKMMT) के कथित सदस्य के रूप में काम करते हुए घोटाले को अंजाम दिया. उन्होंने अन्य आरोपी कंपनियों के साथ-साथ उनके निदेशकों के साथ मिलीभगत करके घोटाला किया. आरोपियों ने चिकित्सा उपकरण, फर्नीचर, कंप्यूटर, चिकित्सा और कानूनी पुस्तकें, विद्युत उपकरण, वाहन और एंबुलेंस, भूमि और भवन, सर्जिकल सामग्रियों, फार्मेसी, केमिस्ट इत्यादि की खरीद में कथित रूप से विभिन्न तरीके अपनाकर पैसे का गबन किया और धोखाधड़ी की.

पुलिस ने मामले में पूर्व ट्रस्टियों सहित 17 आरोपियों के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 403, 406, 409, 420, 465, 467, 471, 474 और 34 के तहत मामला दर्ज किया है.

मामले में पहली FIR 2024 में दर्ज हुई थी

परमबीर सिंह ने जानकारी दी कि मौजूदा मामला पूर्व ट्रस्टियों के खिलाफ दर्ज तीसरी FIR है. पहली FIR जुलाई 2024 में बांद्रा पुलिस थाने में 12 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के आरोप में दर्ज की गई थी. दूसरी FIR दिसंबर 2024 में बांद्रा कोर्ट के निर्देश पर दर्ज हुई थी. जिसमें पूर्व ट्रस्टियों के खिलाफ वकीलों को दी गई कानूनी फीस के बहाने 44 करोड़ रुपये की रकम हड़पने का आरोप लगाया गया था. मामले की जांच EOW के पास है. रिपोर्ट के मुताबिक पूर्व पुलिस आयुक्त ने बताया,

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सिंह ने कहा कि वो मामले की निष्पक्ष जांच चाहते हैं. आरोपियों पर कानूनी कार्रवाई हो और उन्हें जांच का सामना करना चाहिए.

काले जादू वाला एंगल भी शामिल

परमबीर सिंह ने मामले से जुड़ी एक चौंकाने वाली जानकारी भी साझा की. उन्होंने बताया कि ट्रस्ट के कुछ पूर्व कर्मचारियों ने कुछ महीने पहले सूचना दी थी कि जिस कार्यालय में स्थायी ट्रस्टी प्रशांत मेहता और उनकी मां चारु मेहता बैठते हैं, वहां ‘काले जादू’ से जुड़ी गतिविधियां की गई थीं. उन्होंने कहा,

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जानकारी के लिए बता दें कि साल 2002 में लीलावती कीर्तिलाल मेहता मेडिकल ट्रस्ट के संस्थापक किशोर मेहता अस्वस्थ हुए और उन्हें इलाज के लिए विदेश जाना पड़ा. उनकी अनुपस्थिति में उनके भाई विजय मेहता ने ट्रस्ट का अस्थायी प्रभार संभाला था. आरोप है कि विजय मेहता ने अपने बेटों और भतीजों को ट्रस्टी बनाने के लिए ‘फर्जी हस्ताक्षर और दस्तावेज’ बनाए, जिससे किशोर मेहता को स्थायी ट्रस्टी के पद से हटा दिया गया.

इसी के बाद कानूनी लड़ाई शुरू हुई, जो कि साल 2016 तक चली. किशोर मेहता को अपना पद वापस मिल गया. 2024 में उनके निधन के बाद उनके बेटे प्रशांत मेहता स्थायी ट्रस्टी बन गए. प्रशांत ने ही फर्जी डॉक्यूमेंट्स और रिकॉर्ड्स के जरिए किए गए गबन सहित कई महत्वपूर्ण वित्तीय अनियमितताओं का पता लगाने का दावा किया.

ट्रस्टी चेतन मेहता ने आरोपों को निराधार बताया

लीलावती ट्रस्ट की तरफ से लगाए गए आरोपों पर ट्रस्टी चेतन मेहता की तरफ से जवाब भी आया. उनकी वकील सिमरन सिंह की तरफ से जारी बयान में इन आरोपों को निराधार और दुर्भावनापूर्ण बताया गया है. बयान में आगे कहा गया,

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सिमरन सिंह ने आगे बताया कि चेतन के कार्यकाल के दौरान अस्पताल का टर्नओवर 200 करोड़ रुपये से बढ़कर 500 करोड़ रुपये हुआ. अस्पताल के डिपॉजिट्स 10 करोड़ से बढ़कर 500 करोड़ रुपये हुए. इसके साथ ही अस्पताल के लिए इस दौरान 250 करोड़ रुपये के उपकरण भी खरीदे गए.

काले जादू के आरोपों पर सिमरन की तरफ से बताया गया कि ये प्रतिक्रिया के लायक भी नहीं हैं और केवल सनसनी पैदा करने के लिए हैं. नोटिस में बताया गया कि किशोर मेहता और उनके परिवार को RBI के दिशा-निर्देशों के अनुसार बैंकों द्वारा विलफुल डिफॉल्टर घोषित किया गया है. भारत के एक प्रमुख बैंक HDFC ने उनके खिलाफ दिवालियापन की कार्रवाई दर्ज की है. ARC ने उनके खिलाफ दिवालियापन की कार्रवाई कर रहा है. उन्हें प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से पूछताछ का सामना करना पड़ा है.

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