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पाकिस्तान ने कश्मीर को 'आजाद' करवाने के लिए ये आदमी भेजा है

सिर्फ तीन दिन में अपना काम कर देगा. पाकिस्तान का हीरो है ये आदमी.

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12 जून 2018 (अपडेटेड: 12 जून 2018, 12:12 PM IST)
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पाकिस्तानी फिल्म 'आज़ादी' के एक दृश्य में भारतीय कश्मीर में पाकिस्तान का झंडा लहराते एक कैरेक्टर में, अभिनेता मोअम्मर राणा और अभिनेत्री सोन्या हुसैन. (All Photos: ARY Films)
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पाकिस्तानी डायरेक्टर इमरान मलिक की एक फिल्म आ रही है - 'आज़ादी.' मसाला फिल्म है. इसमें हीरो पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर में भारतीय हिस्से वाले कश्मीर को मिलाना चाहता है. इसलिए उस कश्मीर को भारत से 'आज़ाद' कराने की लड़ाई लड़ता है. ये रोल किया है मोअम्मर राणा ने. मोअम्मर ने पाकिस्तानी अखबार डॉन को दिए इंटरव्यू में कहा है कि "कश्मीर (भारतीय) में हमारी बहनों को रेप किया जा रहा है, बच्चों के कत्ल हो रहे हैं और ये सब यूनाइटेड नेशंस में क्यों नहीं दिखाया जा रहा? क्यों भारत हर बार ये करके निकल जाता है? मैं ये फिल्म कश्मीर (भारतीय) के बहुत बहादुर लोगों और वहां दमन से उनकी आज़ादी के नाम डेडिकेट करता हूं." करीब 20 साल के करियर में मोअम्मर ने 'बदमाश गुज्जर', 'मुझे चांद चाहिए', 'जंगल क्वीन', 'लव में गम' और 'भाई लोग' जैसी फिल्में की है. उनकी सबसे उल्लेखनीय फिल्मों में 1998 में आई 'चूड़ियां' थीं. ये सबसे ज्यादा कमाई करने वाली पाकिस्तानी पंजाबी फिल्म बनी थी. ये सबसे ज्यादा कमाई थी 20 करोड़. उनकी आने वाली एक फिल्म का नाम है - 'प्यार की एफआईआर'. मोअम्मर के बारे में आखिरी बात ये कि वे दो भारतीय फिल्मों में भी काम कर चुके हैं. महिमा चौधरी स्टारर 'दोबारा' (2004) और मनीषा कोइराला, जैकी श्रॉफ के साथ 'एक पल.. जो ज़िंदगी बदल दे' (2010). 'आज़ादी' में फीमेल लीड हैं सोन्या हुसैन जो एक ब्रिटिश जर्नलिस्ट बनी हैं. फिल्म की शूटिंग पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर, ब्रिटेन और पाकिस्तान में की गई है. ये फिल्म 15 जून को ईद के मौके पर पाकिस्तान में रिलीज हो रही है. आइए सचित्र बताते हैं कि ये हीरो अब से तीन दिन बाद कैसे कश्मीर को भारत से 'आज़ाद' करवा देगा.
1. कहानी शुरू होती है लंदन से. vlcsnap-2018-06-12-14h32m51s732 2. नायिका सो रही है. नर्म बिस्तर पर. ए क्लास लाइफ. नाम है - ज़ारा. vlcsnap-2018-06-12-14h32m57s907 3. फिर उसे शायद एक ख़त मिलता है. अपने लवर का. जो अब किसी ऐसे रास्ते पर निकल चुका है जो न होता अगर वो अलग न हुए होते. सिर्फ अनुमान. ख़ैर, तो लवर की आवाज में मैसेज सुनाई देता है - "तुम मेरी जिंदगी में कुछ पल के लिए उस चांद की तरह शामिल हो, जो ग़ुलामी की रात में निकलता है. कई साल ये जिंदगी, तुम्हारी याद के हवाले किए रखी. अब ये ज़िंदगी जहाद के हवाले कर चुका हूं." vlcsnap-2018-06-12-13h45m11s615 4. ज़ारा सोचती है - "जिन रिश्तों से मेरे बरसों के फासले थे, उन रिश्तों को उन्होंने मेरे, आज से जोड़ दिया. मैं उससे मिलकर उसे सबकुछ बता दूंगी." और उसके पास जाने का फैसला करती है. vlcsnap-2018-06-12-13h45m13s772 5. लंदन से फ्लाइट लेकर पहुंचती है, कहां? भारत के "कब्जे" वाले कश्मीर. vlcsnap-2018-06-12-13h45m19s972 6. अपने लवर के घर पहुंचती है कश्मीर घाटी में. घर उदास है. सूनापन है. पेंटिंग्स से कलर गायब हैं. वो पूछती है - आज़ाद कहा हैं? घर की ये महिला जवाब देती हैं - "कश्मीर की आज़ादी के लिए लड़ रहे हैं." vlcsnap-2018-06-12-13h45m35s522 7. अब होगी हीरो की एंट्री. अपन के नहीं, पाकिस्तानी दर्शकों के. vlcsnap-2018-06-12-13h45m39s314 8. एंट्री 1ः 'घुंघटे में चंदा है, फिर भी है फैला..' vlcsnap-2018-06-12-13h45m38s132 9. एंट्री 2ः 'वो आ गया. देखो, वो आ गया..' vlcsnap-2018-06-12-13h45m51s319 10. एंट्री 3ः बहुत ज्यादा नाटक करने वाली आवाज़ में इन विजुअल्स के साथ उसका डायलॉग आता है - "तुम में आज ना होने का कोई दुख नहीं है मुझे. क्योंके मैं........ अपना फर्ज निभा चुका हूं." vlcsnap-2018-06-12-14h51m26s052 11. एंट्री 4ः एक इंडियन सोल्जर को पकड़ लिया है और पाकिस्तानी हीरो मार रहा है. क्योंकि फिल्म मीडियन एक ऐसी कल्पना है जहां किसी के द्वारा, कुछ भी किया जा सकता है. kljljl 12. एंट्री 5ः घूंघट के पीछे चेहरा ये था. अति नाटकीय भाव-भंगिमा. दांत भींचे हुए. कंधे उचके हुए. गर्दन धंसाई हुई. जैसे 'चाइना गेट' (1998) में जगीरा की थी - "जो मेरे मन को भाया, तो मैं कुत्ता काट के खाया." vlcsnap-2018-06-12-13h46m21s067 13. शायद इस 'हीरो' के पिता हैं. आंखें भरकर कहते हैं - "एक ख़्वाब देखा था मैंने. कश्मीर की आज़ादी का." vlcsnap-2018-06-12-14h56m07s001 14. हीरोइन ज़ारा इन बुज़ुर्गवार को बोलती है - "आपको अपने मिशन को आखिरी हद तक लेकर चलना होगा." और चूंकि वो (पाकिस्तानी मूल की?) ब्रिटिश जर्नलिस्ट है तो पहुंच जाती है भारतीय कश्मीर घाटी के अंदरूनी हिस्से में. आज़ाद का इंटरव्यू करने के बहाने उससे मिलने. vlcsnap-2018-06-12-14h58m23s788 15. आगे कथाकार का दिखाना ये है कि भारतीय सेना 'अत्याचार' कर रही है. vlcsnap-2018-06-12-13h48m21s340 16. पिच्चर का हीरो लोगों को बचा रहा है. vlcsnap-2018-06-12-13h46m53s640 17. 'हो गई तैयार, हमारी आरमी.' (ये सीन देखकर श्रीदेवी-शाहरुख खान की 1996 वाली पिच्चर 'आर्मी' का गाना याद आ गया.) vlcsnap-2018-06-12-13h46m58s923 18. हालांकि पिच्चर का हीरो गन को तीरंदाजी की शैली में पकड़ता है. vlcsnap-2018-06-12-13h50m46s665 19. नायिका पूछती है - 'जहां तक मैं तुम्हे जानती हूं तुम एक पीस लविंग इंसान थे.' vlcsnap-2018-06-12-15h07m22s963 20. नायक कुछ जवाब देता है. लेकिन फिल्म संस्थान में उच्चारण कक्षाएं अटेंड नहीं की थी, तो यहां दर्शक को समझ नहीं आता. vlcsnap-2018-06-12-13h47m02s895 21. बावजूद इसके कि घाटी में आग लगी है और लोग दुखी हैं. अब नाच-गाने की बारी. vlcsnap-2018-06-12-15h07m06s379 22. गाने के बोल हैं - "माइया वे." सेट है ऋतिक रोशन से लेकर टाइगर श्रॉफ जैसे कई हीरोज़ की फिल्मों का. vlcsnap-2018-06-12-13h47m36s625 23. दाढ़ी कटाकर हीरो एकदम वरुण धवन लग रहा है. vlcsnap-2018-06-12-13h47m25s769 24. इस बीच अपने आज़ाद के पिता उर्फ नेताजी सक्रिय हो गए हैं. कह रहे हैं - 'अपना हक न मिले तो छीन लेना चाहिए.' vlcsnap-2018-06-12-13h47m44s265 25. अब फौज और पुलिस पीछे पड़ी है. ब्रिटिश जर्नलिस्ट इंटरव्यू लेते लेते 'मिशन' का हिस्सा बन गई है शायद? vlcsnap-2018-06-12-13h47m50s416 26. एक पाकिस्तानी फिल्म में भारतीय फौजी ऐसे दिखते हैं. vlcsnap-2018-06-12-13h47m58s741 27. एक पाकिस्तानी फिल्म में भारतीय नेता ऐसे दिखते हैं जिनके लंबे-लंबे तिलक लगाए होते हैं और जो जबड़े भींचे ही रहते हैं. जो over-dramatic होते हैं. vlcsnap-2018-06-12-13h48m02s565 28. मीटिंग्स में भी. vlcsnap-2018-06-12-13h51m14s285 29. लेकिन उधर पाकिस्तानी नायक के हौसले बुलंद है. वो पाकिस्तान का झंडा लिए-लिए भारतीय कश्मीर के जंगलों में घूम रहा है. vlcsnap-2018-06-12-13h51m02s842 30. सिर पर स्टाइलिश पट्टी बांधी हुई है. बोल रहा है - "अब हम जागेंगे. आज़ादी की सुबह तक जागेंगे. अगर सोये भी, तो शहादत की बाहों में सोएंगे." vlcsnap-2018-06-12-13h50m13s671 31. इसके साथ ये चार बहादुर और हैं. बस ये पांच लोग कश्मीर को आज़ाद करवाएंगे. vlcsnap-2018-06-12-13h50m58s818 32. इस बीच फिर से नाच गाने का समय हो चुका है. vlcsnap-2018-06-12-13h50m42s526 33. एक और लोकेशन. नई कॉस्ट्यूम्स में. vlcsnap-2018-06-12-13h50m38s654 34. बाहुबली पिच्चर वाला झरना. vlcsnap-2018-06-12-13h47m06s291 35. अब अपने साथियों के साथ जंग की ऐलान का वक्त. आखिरी जंग. बहुत सारा गुस्सा चेहरे पर. vlcsnap-2018-06-12-13h48m11s613 36. एक सेल्फी ले ली जाए जाते-जाते. vlcsnap-2018-06-12-13h49m27s882 37. धर्म की शरण में. vlcsnap-2018-06-12-13h49m23s050 38. गिटार ले लिया है हाथ में. सुर निकलने का इंतजार. vlcsnap-2018-06-12-13h52m00s841 39. लड़ते-लड़ते घायल. नर्स पहुंच चुकी हैं. मरहम पट्टी है नहीं, सिर्फ मनोबल बढ़ा सकती हैं. vlcsnap-2018-06-12-13h51m22s221 40. बम फूट गया है. vlcsnap-2018-06-12-13h51m52s922 41. कश्मीर आजाद हो गया है. vlcsnap-2018-06-12-13h52m15s958 ये स्टोरी उन प्रोड्यूसर्स और डायरेक्टर्स पर लानत भेजती है जो फिल्ममेकिंग विधा का इस्तेमाल ऐसी मूवीज़ बनाने में करते हैं जिसमें धर्म और राष्ट्र जैसे भावों का पैसे कमाने के लिए यूज़ किया जाता है. ताकि दर्शकों के इमोशंस का दुरुपयोग सिनेमाघर में किया जा सके. वो फिल्ममेकर चाहे किसी भी देश का हो. भारत का या पाकिस्तान का. अगर 'बाग़ी-2' में टाइगर श्रॉफ के फौजी कैरेक्टर के जरिए एक व्यक्ति को गाड़ी के बोनट पर बांधकर थियेटर में सीटियां बजवाना डायरेक्टर अहमद खान का घटिया काम था, तो 'आज़ादी' जैसी पूरी फिल्म के जरिए पाकिस्तानी डायेरक्टर इमरान मलिक ने भी यही किया है. 'गदर' जैसी फिल्म में भी भारत का नायक पाकिस्तान जाता है अपनी महबूबा को लेते हुए तो वो उस मुल्क की बेइज्जती नहीं करता. वो पाकिस्तान जिंदाबाद तक बोलता है. बस वो हिंदुस्तान मुर्दाबाद नहीं बोलना चाहता. लेकिन फिर भी हम उस फिल्म की आलोचना करते हैं क्योंकि वो देश के लिए लोगों के प्रेम का व्यावसायिक दुरुपयोग करती है. बावजूद इसके कि वो 'आज़ादी' जैसी फिल्मों से कम harmless है. लेकिन फिर भी आलोचना इसलिए ताकि एक मुल्क के तौर पर हमारा intellect और human growth कभी न रुके. वो विकसित होती रहे. परिष्कृत होती रहे. लेकिन दुनिया का कोई फिल्ममेकर जब अधकचरे ज्ञान और व्यावसायिक मुनाफे के लिए ऐसा प्रोपोगैंडा फैलाता है तो वो निंदनीय है. फिल्में एक बेहतर दुनिया के निर्माण के लिए होती हैं. हमें सकारात्मक कहानियां सुनाने और समाज के तौर पर हमें बेहतरी की तरफ ले जाने के लिए होती हैं. ये सब करने के लिए नहीं. जैसे डायरेक्टर शोएब मंसूर की दो पाकिस्तानी फिल्में जो भारत में भी दर्शकों ने बहुत चाव लेकर, बहुत आदर के साथ देखी  - 'ख़ुदा के लिए' (2007) और 'बोल' (2010). 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