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गुजरात विधानसभा चुनाव के चार निष्कर्ष

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गुजरात चुनाव की बानगी से पहले ही यह तय हो चुका था कि इस चुनाव के नतीजों का असर 2019 के लोकसभा चुनाव पर पड़ेगा. आज शाम ढले गुजरात के अंतिम आंकड़े हमारे सामने आ चुके हैं. कुल 182 में से 99 सीट बीजेपी के खाते में गई. वहीं कांग्रेस के 80 सीटों पर कामयाबी मिली. अन्य के खाते में तीन सीटें गई हैं. इस नतीजे को कैसे देखा जाए. आंकड़ों की गवाही के बावजूद क्या इन नतीजों को बीजेपी के पक्ष में माना जाए? आखिर इन नतीजों के सियासी मायने क्या हैं?

मोदी मैजिक और विकास मॉडल

बहुमत मिलने के बावजूद इस जीत ने बीजेपी को ख़ुशी देने के बजाय सकते में डाल दिया है. पार्टी कारकून चाहें तो दिल पर पत्थर रखकर चिंचियाती ज़बान में “नरेंद्र मोदी का जादू बरकरार है.” कह सकते हैं लेकिन असल में ये नतीजे ‘अविजित नरेंद्र मोदी ‘ की छवि को तार-तार कर रहे हैं. कांग्रेस सूबे में पिछले 22 साल से सत्ता से बाहर है. संगठन के नाम पर कांग्रेस के पास 50 साल पुराने पार्टी दफ्तर बचे हैं जोकि जमींदोज़ होने की कगार पर खड़े हैं. उस पार्टी ने मजबूत संगठन वाली बीजेपी को बीच चुनाव में पसीना-पसीना कर दिया. हालांकि कांग्रेस की हार की बड़ी वजह भी संगठन का न होना है लेकिन छिन्न-भिन्न संगठन के साथ भी वो बीजेपी को कड़ी टक्कर देने में कामयाब रही.

नतीजे आने के बाद जब अमित शाह प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे तब उन्होंने एक तथ्य पर खासा जोर डाला था. यह तथ्य था कि इस समय कुल 19 राज्यों में बीजेपी की सरकार चल रही है. इसमें से 14 राज्यों में सीधे तौर पर बीजेपी सत्ता में है जबकि पांच राज्यों में वो गठबंधन के चलते सरकार में है. 2014, अगर बिहार को छोड़ दें तो बीजेपी उत्तर भारत के सभी राज्यों में चुनाव जीतने में कामयाब रही. इन तमाम राज्यों में बीजेपी के प्रचार अभियान में ‘गुजरात मॉडल ‘ सबसे बड़ा हथियार था. बीजेपी इस कीमती हथियार को हाथ से जाने नहीं देना चाहती.

नरेंद्र मोदी और बीजेपी एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं
नरेंद्र मोदी और बीजेपी एक-दूसरे का पर्याय बन चुके हैं.

2012 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के खाते में 116 सीट आई थीं. इस बार बीजेपी गुजरात में दो आंकड़े में सिमट गई है. चुनाव से पहले बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह 150 से ज्यादा सीटें लाने की बात कह रहे थे. इस लिहाज से देखें तो बीजेपी का प्रदर्शन निराशाजनक रहा है. हालांकि बीजेपी प्रवक्ता अपने बचाव में कह सकते हैं कि पिछले विधानसभा चुनाव के मुकाबले उनके वोट प्रतिशत में कुल जमा 1.25 फीसदी की बढ़त दर्ज की गई है. हालांकि इस बीच यह तथ्य छिपा लिया जाएगा कि 2012 और 2017 के बीच एक लोकसभा चुनाव भी हुआ था. 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने 59.1 फीसदी वोट के साथ सूबे की सभी 26 सीट पर कामयाबी हासिल की थी. अगर इस संदर्भ से देखा जाए तो इस विधानसभा चुनाव में बीजेपी के वोट शेयर में 10 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. ऐसे में सवाल यह उठता है कि इन नतीजों को बीजेपी के विकास के मॉडल से मोहभंग के तौर पर क्यों न देखा जाए.

नए तरीके का विपक्ष

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन के समय कांग्रेस और सपा दोनों की तरफ से एक बात का खूब प्रचार किया गया, “दो युवाओं का साथ’. यह प्रयोग बुरी तरह फेल रहा था. गुजरात में एक बार फिर से नए किस्म का विपक्ष देखने को मिल रहा है, जिसमें युवाओं की बड़ी भूमिका रही. जिग्नेश, कल्पेश और हार्दिक पटेल की तिकड़ी ने बीजेपी को मुख्य विपक्षी दल से ज्यादा परेशानी में डाला. इस चुनाव में और कुछ किया हो या न किया हो लेकिन आने वाले लोकसभा चुनाव में बीजेपी के खिलाफ एकजुट विपक्ष की जमीन तैयार कर दी है.

पाटीदार नेता हार्दिक पटेल.
पाटीदार नेता हार्दिक पटेल.

इस चुनाव से ठीक पहले राहुल गांधी की बतौर कांग्रेस अध्यक्ष ताजपोशी हुई. इस तरह सोनिया गांधी के बाद एक तरीके से कमान अगली पीढ़ी के हाथों में पहुंच चुकी है. गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी सड़क नापते दिखाई दिए थे. उनके भाषणों में भी नए तेवर दिखाई दिए. कांग्रेस के लिए एक अच्छा संकेत है. सत्ता में कांग्रेसी की वापसी इस बात पर निर्भर करती है कि राहुल गांधी अपने को कितना बेहतर लीडर साबित कर पाते हैं. जिस स्तर पर कांग्रेस का संगठन है उससे वो अकेले अपने दम पर देश भर में बहुमत हासिल नहीं कर सकती है. ऐसे में उसे अगले चुनाव में गठबंधन के लिए साथियों की जरूरत होगी. कोई भी पार्टी कांग्रेस के पाले में तब ही आकर खड़ी होगी जब उन्हें बतौर नेता राहुल गांधी में कुछ संभावनाएं दिखाई देगी. गुजरात चुनाव के दौरान जो मैच्योरिटी राहुल गांधी में दिखी वो कांग्रेस के लिए शुभ संकेत है.

कांग्रेस के लिए सबक

इस चुनाव में जीतने की स्थिति होने के बावजूद कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा. इसकी वजह थी जमीन पर कांग्रेस में संगठन का न होना. किसी दौर में कांग्रेस के कई सारे अनुषांगिक संगठन हुआ करते थे. ये संगठन कांग्रेस की जमीन को मजबूत बनाए रखते थे. इंदिरा गांधी के समय से ही कांग्रेस ने हर इलाके में इलाकाई क्षत्रप गढ़ने शुरू किए. ऐसे में धीरे-धीरे करके संगठन अप्रासंगिक होता चला गया. चुनाव कवरेज के दौरान राजकोट में मिले जयंती भाई ने बताया कि 1952 से देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी फिलहाल अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रही है. ऐसे में उसे फिर से बुनियाद की तरफ लौटना होगा.

गुजरात चुनाव के नतीजों में छिपा कांग्रेस के लिए यह सबसे महत्वपूर्ण सबक है. 2014 के चुनाव और उसके बाद से वर्चुअल स्पेस पर बीजेपी का एकछत्र वर्चस्व रहा है. इस चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने में ‘विकास पागल हो गया है ‘ कैम्पेन की काफी महत्वपूर्ण भूमिका रही. सोशल मीडिया पर कांग्रेस अबतक नदारद थी. इस चुनाव में कांग्रेस की कुछ उपस्थिति दिखी है. सोशल मीडिया पर कांग्रेस को अभी और मजबूत बनाना होगा.

कांग्रेस के नए अध्यक्ष के तौर राहुल को कांटों का ताज मिला है
कांग्रेस के नए अध्यक्ष के तौर राहुल को कांटों का ताज मिला है.

बीजेपी के लिए सबक

अपने पूरे प्रचार अभियान में नरेंद्र मोदी राज्य सरकार के काम पर बात करने से बचते रहे. राज्य सरकार के कामों का जिक्र उनके भाषणों में बहुत ही संक्षिप्त होता. वो या तो केंद्र सरकार में किए गए अपने काम की चर्चा करते या फिर मुख्यमंत्री रहने के दौरान गुजरात में किए गए कामों पर. इस दौरान विजय रूपानी और आनंदीबेन पटेल का जिक्र बहुत ही कम मौकों पर होता.

बीजेपी के साथ दिक्कत यह हो गई है कि वो एक आदमी के इर्द-गिर्द घूम कर रह गई है. नरेंद्र मोदी पार्टी का एक मात्र चेहरा हैं. 2013 में मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में हुए विधानसभा चुनाव के बाद से पिछले चार साल में हुए हर चुनाव में बीजेपी मोदी के नाम पर वोट मांग रही है. एक सत्ता केंद्र होना किसी भी राजनीतिक संगठन की सेहत के लिए अच्छा साबित नहीं हुआ है. रूस की कम्युनिस्ट पार्टी से लेकर तमिलनाडु की अन्ना द्रमुक तक को इसके उदाहरण के तौर पर पेश किया जा सकता है.

किसी दौर में कांग्रेस में नारा चला करता था, इंदिरा इज इंडिया. बीजेपी भी उसी दौर की गवाह बन रही है
किसी दौर में कांग्रेस में नारा चला करता था, इंदिरा इज इंडिया. बीजेपी भी उसी दौर की गवाह बन रही है

बीजेपी संगठन पर खड़ी हुई पार्टी है. जनसंघ से लेकर अबतक बीजेपी कभी भी एक आदमी पर केन्द्रित पार्टी नहीं रही है. अटल बिहारी वाजपेयी के समय में भी बीजेपी के पास मजबूत बेंच हुआ करती थी. प्रमोद महाजन, नरेंद्र मोदी, वैंकय्या नायडू, सुषमा स्वराज, अरुण जेटली जैसे नेता उसी बेंच से निकले नेता हैं. बीजेपी जिस तेजी से ‘ब्रांड मोदी’ के चारों तरफ लामबंद हो रही है, उससे साफ़ है कि अगला लोकसभा चुनाव भी नरेंद्र मोदी के नाम पर लड़ा जाएगा. इंदिरा गांधी के समय जिस तरह से पार्टी के संगठन को किनारे लगाया गया था, बीजेपी भी कुछ-कुछ उसी किस्म की प्रक्रिया से गुज़र रही है. हालांकि संघ के हस्तक्षेप के चलते बीजेपी के संगठन की कांग्रेस संगठन जैसी दुर्गति होने की आशंका बहुत कम है.

गुजरात में बीजेपी 2014 से ही नेतृत्व के संकट से गुजर रही है. आनंदीबेन और विजय रूपानी के पांव कहीं से भी नरेंद्र मोदी के छोड़े जूतों में फिट नहीं बैठते हैं. कमज़ोर नेतृत्व की वजह से इस चुनाव में बीजेपी को काफी दिक्कत का सामना करना पड़ा है. गुजरात में दूसरी पीढ़ी का कोई प्रभावी नेता फिलहाल उभरता नहीं दिख रहा है. यह बीजेपी के लिए चिंता का सबब होना चाहिए.


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