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आम्रपाली ग्रुप मामला: हमारे जैसा कोई आम आदमी सड़क से कोर्ट तक के हज़ारों चक्कर क्यूं लगा रहा है?

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तोता उड़, नीरव उड़, माल्या उड़, अनिल शर्मा […],शिवप्रिय […], अजय कुमार […]

ये तीनों नहीं उड़ पाएंगे. क्यूं नहीं उड़ पाएंगे? क्यूंकि इनको कोर्ट ने पिंजरे में बंद कर दिया है. और वो भी बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में.


# क्या हुआ?

(अब तो जेल में जाना पड़ेगा)

आम्रपाली ग्रुप के ये तीन निदेशक 09 अक्तूबर, 2018 को ‘एक मामले’ में सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश हुए थे. कोर्ट ने पहले तो इन्हें खूब डांट लगाई और उसके बाद पुलिस बुलवाकर इन्हें कस्टडी में भेज दिया. मने कोर्ट से सीधे जेल. ये ‘एक मामला’ क्या है?


# शुरू से शुरू करते हैं

(इन भूल-भुलैया गलियों में अपना भी कोई तो घर होगा)

अप्रैल, 2016 में एक हैशटैग वायरल हुआ – #AmrapaliMisuseDhoni. मने – आम्रपाली धोनी का दुरूपयोग कर रहा है. दरअसल तब धोनी आम्रपाली के ब्रांड एंबेसेडर थे. हैशटैग वायरल करने वालों में सफायर अपार्टमेंट में रह रहे लोग सबसे आगे, सबसे मुखर थे.

धोखे की ऊंची इमारतें...
धोखे की ऊंची इमारतें…

सफायर. आम्रपाली का प्रोजेक्ट. जिसका काम 2009 में शुरू हुआ और 2016 आते आते हज़ार के लगभग परिवार इसमें रहने भी लगे. लेकिन सबको ठगा सा लगा क्यूंकि अपार्टमेंट में अभी तक बेसिक एमिनीटीज़, जैसे बिजली पानी का काम ही पूरा नहीं हो पाया था.

गुस्से की आग भड़कती देख तब आईपीएल पुणे के कैप्टन धोनी ने आम्रपाली के ब्रांड एंबेसेडर के पद से इस्तीफा दे दिया. तब कंपनी के चेयरमैन और प्रबंध निदेशक अनिल शर्मा ने कहा था –

धोनी से हमारे साथ मिलकर ये फैसला लिया है और कंपनी प्रोजेक्ट का बचा हुआ काम अगले तीन महीने में पूरा कर लेगी.

ये पूरा प्रकरण आने वाले बड़े खतरे की आहट भर था.


# फिर शुरू हुआ बड़ा इश्यू 

(ये खबर छपवा दो, अखबार में)

तीन महीन नहीं, अब एक साल तीन महीना फ़ास्ट फॉरवर्ड करते हैं – जुलाई, 2017. ग्रेटर नोएडा में बिल्डरों के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन. हर अख़बार की हैडलाइन ‘आम्रपाली’. लोगों ने आम्रपाली के दफ़्तर के सामने भी प्रदर्शन किया. लोग 8 साल से घर मिलने का इंतज़ार कर रहे थे. अनिल शर्मा बोले –

मुझे मार कर फ़्लैट मिल जाएं तो ले लो भई!

तब यूपी सरकार रेसक्यू में आई थी और उसने कहा कि ‘रेरा’ सख्ती से लागू किया जाएगा. रेरा के बारे में लास्ट में बताएंगे. योगी आदित्यनाथ ने ये भी कहा कि आधे-अधूरे प्रोजेक्ट्स को लेकर बातचीत से रास्ता न निकलने पर सरकार को सख्त कदम उठाना पड़ेगा.

आम्रपाली FMCG (फ़ास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) में भी हाथ आजमा चुकी है.
आम्रपाली FMCG (फ़ास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) में भी हाथ आजमा चुकी है.

जुलाई, 2017 के अंतिम सप्ताह में आम्रपाली ग्रुप डायरेक्टर निशांत मुकुल और सीईओ ऋतिक गिरफ्तार कर लिए गए. कारण – कंपनी लेबर वेलफेयर सेस का करीब 4 करोड़ 29 लाख रुपया जमा नहीं कर रही थी. एक तय लिमिट से बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए डेवलपर्स को प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत की एक प्रतिशत रकम लेबर वेलफेयर सेस के रूप में जमा करनी होती है. लेबर सेस देने के बाद इनको छोड़ा गया.

अगस्त, 2017 तक बैंक ऑफ बड़ौदा और क्वांटम प्रोजेक्ट्स इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड एनसीएलटी पहुंच चुके थे. आम्रपाली सिलिकॉन सिटी प्राइवेट लिमिटेड को दिवालिया कर अपने पैसे वसूलने के वास्ते.

एनसीएलटी और एक और बड़े घपले IL&FS के बारे में और पढ़े: क्या है IL&FS संकट जिससे शेयर मार्केट ही नहीं, भात की पूरी अर्थव्यवस्था चरमरा सकती है?

अब फ्लैट के खरीददारों के हाथ पांव फूल गए. क्यूंकि दिवालिया कानून ऐसे थे कि अगर आम्रपाली दिवालिया हो जाती तो इन बेचारों को कुछ नहीं मिलना था. जबकि ये लोग ही सबसे बड़े विक्टिम थे. इसलिए सितंबर, 2017 में फ्लैट के खरीददारों/नेफोमा (नॉएडा एक्सटेंशन फ्लैट ऑनर्स एंड मेंबर्स एसोसिएशन) ने एनसीएलटी में डाली गई इस अर्जी के विरोध में कोर्ट में अर्जी डाली.

उधर सेक्टर-39 पुलिस ने कोर्ट के आदेश पर बिल्डर अनिल शर्मा और सुवेश चंद्र कुमार के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया. सेक्टर-45 आम्रपाली सफायर फेज टू प्रॉजेक्ट के एक बायर ने बिल्डर के खिलाफ केस दर्ज करवाने के लिए कोर्ट में शिकायत दी थी.

गांधी टू हिटलर का निर्माण इसी कंपनी ने किया. (क्या इस फ़िल्म का नाम एक आयरनी सरीखा लग रहा है?)
गांधी टू हिटलर का निर्माण इसी कंपनी ने किया. (क्या इस फ़िल्म का नाम एक आयरनी सरीखा लग रहा है?)

22 फरवरी, 2018 को केस की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली को कहा कि अगर वक्त पर काम पूरा नहीं हुआ तो जेल की हवा खानी होगी. सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली से कहा कि 1665 फ्लैट जल्द से जल्द तैयार करे. आम्रपाली ने रिक्वेस्ट की थी कि हमें साझेदारी से प्रोजेक्ट पूरे करने की इजाज़त दी जाए. कोर्ट ने 3 डेवलपर्स से साझेदारी की इजाज़त दे दी – गैलेक्सी, कन्नौजिया ग्रुप और आईआईएफएल.

कोर्ट ने आम्रपाली को फटकारते हुए कहा कि वो अपने 47 आवासीय टावरों का, फ्लैट खरीदारों से ली गई राशि का और कुल इन्वेस्टमेंट का पूरा ब्यौरा दे. सुप्रीम कोर्ट ने खरीदारों को उनके फ्लैट दिलवाना अपनी सबसे बड़ी चिंता बताई. कोर्ट ने 7 मार्च, 2018 तक अंडरटेकिंग दाखिल करने को कहा और अगली सुनवाई की तारीख़ 27 मार्च, 2018 रखी.

आम्रपाली ने कहा कि उसके कुल 10647 फ्लैटों में से –

# 980 फ्लैट 3 से 6 महीने के बीच

# 2085 फ्लैट 6 से 9 महीने के बीच

# 3130 फ्लैट 9 से 12 महीने के बीच और

# 4452 फ्लैट 12 से 15 महीने के बीच तैयार होंगे


# सबसे बड़ा घाटा किसी और का नहीं, ग्राहकों का हुआ

(खोसला का घोंसला)

उधर खरीदारों ने कहा कि उन्होंने 2010 में फ्लैट बुक किए थे और तीन साल में इसे पूरा किया जाना था. 90% पैसा पहले ही दिया जा चुका है. सुप्रीम कोर्ट ने इसके जवाब में कहा कि वो प्रोजेक्ट के आधार पर ही सुनवाई करेगा क्यूंकि आम्रपाली के 9 प्रोजेक्ट्स को 3 दर्जों में बांटा गया है. इनमें एक वो थे जिसमें अभी भी कुछ लोग रह रहे हैं लेकिन उनमें लिफ्ट, फायर सेफ्टी, पावर बैकअप जैसी सुविधाएं नहीं थीं. इसके अलावा दूसरे में 6 से 9 महीनों में पूरे होने वाले प्रोजेक्ट, और तीसरे वो जिनमें अभी काम तक शुरू नहीं हुआ था. ये कैटगरी क्रमशः ए, बी और सी कहलाई गईं.

सुप्रीम कोर्ट ने 17 मार्च, 2018 को बिल्डर और बायर्स की संयुक्त टीम का गठन किया. इसका काम आम्रपाली के सभी प्रोजेक्ट्स का वेरिफिकेशन करके उसकी रिपोर्ट 27 मार्च, 2018 तक सुप्रीम कोर्ट में पेश करना था.

इधर कोर्ट की सुनवाई चल रही थी उधर दूसरी तरफ 21 मार्च, 2018 को बिजली विभाग ने आम्रपाली बिल्डर्स की नोएडा सेक्टर 74 और 76 स्थित सोसायटी के कनेक्शन काट दिए. आम्रपाली पर बिजली विभाग का पांच करोड़ रुपए का बकाया था. विभाग ने ढेरों नोटिस दिए थे मगर बिल्डर्स के कानों में जूं न रेंगी. अंततः कनेक्शन काटना पड़ा.

आम्रपाली ग्रुप का 'होम' पेज.
आम्रपाली ग्रुप का ‘होम’ पेज.

जेपी ग्रुप के खरीददार भी आम्रपाली के कस्टमर्स की तरह खून के आंसू रो रहे थे और उनकी भी ऐसी ही लंबी कहानी है. हम यहां पर उसकी बात केवल इसलिए कर रहे हैं क्यूंकि मार्च में दोनों के खरीददार (या दोनों से धोखा खाए हुए) ने आपस में हाथ मिला लिया. उन्होंने आगे की लड़ाई के लिए कोर कमिटी भी बनाई.

27 मार्च, 2018 को फिर सुनवाई हुई. इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि फ्लैट खरीदारों का पैसा उनसे कोई नहीं लूट सकता. इस बार बैंक ऑफ़ बड़ोदा भी इन्वॉल्व हो गई. वही पहली कुछ आर्गेनाइजेशन्स में से एक थी जिसने आम्रपाली को एनसीएलटी में घसीटा था. कोर्ट ने बैंक ऑफ़ बड़ोदा से दो टूक कह दिया कि बैंक ये न समझे कि उसने खरीददारों को लोन दिया है, बल्कि उसने तो बिल्डर्स को लोन दिया है और यूं वो खरीददारों से अपना पैसा वसूलने के बारे में न सोचे.

उधर अप्रैल आते-आते धोनी ने भी दिल्ली हाईकोर्ट में रिकवरी के लिए आम्रपाली के खिलाफ़ केस दर्ज कर दिया. 150 करोड़ रुपये की रिकवरी के लिए.

10 अप्रैल, 2018 को आम्रपाली मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डर ग्रुप से पूछा कि नौ प्रोजेक्ट कब तक पूरे होंगे और कितनी लागत आएगी?

फिर 17 अप्रैल, 2018 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली बिल्डर से कहा कि वो उन 6 प्रोजेक्ट्स के बारे में बताएं कि इन्हें पूरा करने में कितना वक्त लगेगा और कितना खर्च आएगा.

आम्रपाली बायर्स का 20 अगस्त, 2017 को 'भैंस के आगे बीन बजाना' नाम से किया धरना प्रदर्शन.
आम्रपाली बायर्स का 20 अगस्त, 2017 को ‘भैंस के आगे बीन बजाना’ नाम से किया धरना प्रदर्शन. (तस्वीर: ट्विटर)

25 अप्रैल, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि को-डेवलपर के आने के बाद नई कंपनी के बारे में जानना और ज़रूरी हो जाता है, ताकि ऐसा न हो कि आम्रपाली के कस्टमर्स की स्थिति आसमान से गिरे खजूर पे अटके वाली न हो जाए.

फिर अगली सुनवाई 2 मई, 2018 को हुई जिसमें कोर्ट ने बिल्डर ग्रुप की किसी भी संपत्ति की बिक्री या ट्रांसफर पर रोक लगा दी और नोएडा-ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी से एक हफ्ते की अंदर रिपोर्ट देने को कहा.

10 मई, 2018 को फिर से कोर्ट ने आम्रपाली को आड़े हाथों लिया. इस बार गुस्सा गफलत को लेकर नहीं अपराध को लेकर था. गबन को लेकर था. आम्रपाली से करोड़ों रुपये साइफन (गलत तरीके से दूसरे खातों में ट्रांसफर करना) करने को लेकर सवाल पूछे. सुप्रीम कोर्ट ने ग्रुप से पूछा कि उसके पास इतने पैसे कहां से आए और किन नियमों के तहत किस काम के लिए ये पैसे किन कंपनियों को ट्रांसफर किए गए? कोर्ट को पता चला कि आम्रपाली ने अपने पेंडिंग प्रोजेक्ट्स पूरे करने के बजाय उनमें से 2700 करोड़ से अधिक रुपए किसी दूसरी कंपनी के खाते में ट्रांसफर कर दिए थे.

खरीदारों ने सुप्रीम कोर्ट से रिक्वेस्ट की कि आम्रपाली और इसके निदेशकों की निजी संपत्ति को भी प्रोजेक्ट्स में अटैच कर दिया. इससे 500 करोड़ रुपए जमा हो सकते हैं साथ ही जब इनके खुद के पैसे लगेंगे तब ये लोग तेज़ी से काम करेंगे. इस बार की सुनवाई में कोर्ट द्वारा आम्रपाली से ऑडिट रिपोर्ट भी मांगी गई. न्यायमूर्ति अरूण मिश्रा और न्यायमूर्ति यू यू ललित की पीठ ने इस बात पर भी आश्चर्य जताया कि एक तरफ कंपनी कर्ज का भुगतान नहीं करने के कारण दिवालिया कार्यवाही का सामना कर रही है, दूसरी तरफ पैसे ट्रांसफर कर रही है.

धोनी को भी धोखा मिला.
धोनी को भी धोखा मिला. (आम्रपाली का विज्ञापन)

17 मई, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली को 250 करोड़ रुपए फौरन सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री में जमा कराने का आदेश दिया. इसके लिए उसे 15 जून, 2018 तक का समय दिया गया. कंपनी ने ये पैसा कभी जमा नहीं किया.

साथ ही ए और बी कैटेगरी के प्रोजेक्ट के सभी प्रोजेक्ट में काम शुरू करने का आदेश दिया गया. कैटेगरी सी के ग्राहकों को या तो किसी और प्रोजेक्ट में शिफ्ट कराने या फिर पैसे रिफंड करने का आदेश दिया गया. कोर्ट ने 6 महीने में काम शुरू करने और 48 महीने में काम पूरा करके फ्लैट देने का आदेश दिया. आम्रपाली के 16 प्रोजेक्ट्स में से 8 प्रोजेक्ट्स गैलेक्सी ग्रुप को पूरा करने के लिए कहा गया. इस फैसले का सभी बायर्स ने स्वागत किया उनको लगा कि अब सारी दिक्कतें खत्म.

बायर्स के लिए दूसरी अच्छी खबर मोदी सरकार लेकर आई. 23 मई, 2018 को केंद्र सरकार ने इनसॉल्वेंसी को लेकर बहुत बड़ा बदलाव किया. जिसके चलते होम बायर्स की स्थिति बैंकों की तरह हो गई. मतलब ये कि अगर कोई रियल एस्टेट कंपनी दिवालिया होती है तो जैसे उन बैंकों को पैसे मिलते हैं जिनने प्रोजेक्ट्स में इन्वेस्ट किया था वैसे ही ग्राहकों को भी पैसे मिलेंगे. ये लगभग वैसा ही था जैसा कोर्ट ने भी अपनी सुनवाई के दौरान बैंक ऑफ़ बड़ौदा को बताया था. इससे बैंकों का किसी रियल एस्टेट कंपनी को एनसीएलटी में घसीटना कम हो जाना निश्चित था.

आम्रपाली, आॅथोरीटी एवं प्रशासन का बायर्स द्वारा किया गया बुद्धि शुद्धि हवन (18 अगस्त, 2017)
आम्रपाली, आॅथोरीटी एवं प्रशासन का बायर्स द्वारा किया गया बुद्धि शुद्धि हवन (तस्वीर: ट्विटर/18 अगस्त, 2017)

उधर ये सब चल रहा था इधर 25 मई, 2018 को ग्रेटर नोएडा की आम्रपाली लेजर वेली की बिजली एनपीसीएल ने काट दी. बिल नहीं चुकाया गया था. 22 लाख रुपए का.

इसके बाद होता क्या है कि ग्रेनो (ग्रेटर नॉएडा) अथॉरिटी आम्रपाली के उसके 6 प्रोजेक्ट्स डेंजर कैटेगरी में डाल देती है. इस कैटेगरी में वो कंपनियां और प्रोजेक्ट्स डाले गए थे जिनका काम होना मुश्किल लग रहा था.


# हर सुनवाई में कोर्ट का शिकंजा कसता चला गया

(बोलो इतने दिन क्या किया?) 

जुलाई 18, 2018. सुप्रीमकोर्ट और आम्रपाली हैशटैग फिर से वायरल होने लगे. सुप्रीमकोर्ट ने आम्रपाली के कर्ताधर्ताओं (अनिल शर्मा, अजय कुमार और शिवप्रिय) पर देश से बाहर जाने पर रोक लगा दी. होने को वे लोग अब तक देश छोड़कर इसलिए नहीं भागे थे क्यूंकि उनका पासपोर्ट 2017 में हगी डीएम ऑफिस में जमा हो गया था. ग्रेनो अथॉरिटी की रिपोर्ट के बाद आम्रपाली ने कोर्ट को बताया कि उसने अपने अधूरे प्रोजेक्ट पूरे करने के लिए केंद्र सरकार से बात की है और सब कुछ सही रहा तो एनबीसीसी (नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) अधूरे प्रोजेक्ट टेकओवर कर सकती है.

दस दिन बीतते-बीतते यानी 28 जुलाई, 2018 तक खबर फैलने लगी कि आम्रपाली के अधूरे प्रोजेक्ट्स पूरा करने का जिम्मा सरकारी कंपनी नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉरपोरेशन (एनबीसीसी) उठाने जा रही है और इसके लिए न केवल वो एक ब्लू प्रिंट तैयार कर रही है बल्कि फाईनेंस के लिए बैंकों से भी बात चालू हो गई है.

बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने ही आम्रपाली को दिवालिया की प्रोसेस में खींचा (रायटर्स)
बैंक ऑफ़ बड़ौदा ने ही आम्रपाली को दिवालिया की प्रोसेस में खींचा (रायटर्स)

1 अगस्त, 2018 को सुप्रीमकोर्ट ने आम्रपाली को फिर आड़े हाथों लिया. कहा आम्रपाली ‘डर्टी गेम’ में लगा हुआ है. उसकी सभी 40 कंपनियों के निदेशकों के खाते सील करने के आदेश दिए गए. और इन निदेशकों की निजी संपत्ति भी जब्त करने के आदेश हुए. ये पूरे प्रकरण में पहली बार था जब आंच किसी कंपनी से बढ़कर कंपनी के लोगों तक जा पहुंची थी.

इस सुनवाई में कोर्ट ने साथ में एनबीसीसी के चेयरमैन और शहरी विकास एवं आवास मंत्रालय के सचिव को भी फटकार लगाई और उन्हें अगली सुनवाई में कोर्ट में पेश होने का आदेश भी जारी किया. एनबीसीसी का जुर्म ये था जिस दौरान अदालत में आम्रपाली मामले की सुनवाई चल रही थी उस दौरान उसने एक विज्ञापन जारी किया था जिसमें अधूरे प्रोजेक्ट्स के लिए को-डेवपलपर्स से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट मांगा था.

2 अगस्त, 2018 की अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने की जिम्मेदारी एनबीसीसी (नेशनल बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कॉर्पोरेशन) को दे दी. सुप्रीम कोर्ट एनबीसीसी से 30 दिन के भीतर पूरा ब्लू प्रिंट सौंपने को कहा.

कोर्ट ने फिर आम्रपाली ग्रुप को गरियाया और कहा कि आपकी कारस्तानी पूरी तरह से गलत अनुचित थी. जिन 40 कंपनियों और उनके निदेशकों खाते फ्रीज किए गए थे उनकी जानकारी भी मांगी. इस सुनवाई के दौरान पता लगा कि कंपनी का पिछले लगभग 3 सालों से ऑडिट नहीं हुआ है. कोर्ट ने कहा कि आम्रपाली ग्रुप ने जो पैसा कस्टमर्स से लिया है वो सब एनबीसीसी को दिया जाएगा. आम्रपाली ग्रुप ने 42,000 फ्लैट्स बेचे जिनमें 25,000 को पूरा करना बाकी है, जो इस आदेश के बाद एनबीसीसी की ज़िम्मेवारी हो गई है.

तारणहार एनबीसीसी
तारणहार एनबीसीसी

कोर्ट के 1 अगस्त, 2018 के आदेश का पालन करते हुए एनबीसीसी के चेयरमैन अनूप कुमार मित्तल और शहरी एवं आवास मंत्रालय के सेक्रेटरी दुर्गा शंकर मिश्रा भी कोर्ट में पेश हुए थे. उन्होंने बताया कि विज्ञापन जेनेरिक था, केवल आम्रपाली ग्रुप के अधूरे प्रोजेक्ट्स का नहीं.

तीन अगस्त को आम्रपाली जोडिएक सोसाइटी की बिजली भी काट दी गई. सोसाइटी पर ढाई करोड़ के लगभग का बिल बकाया था. रहने वालों ने बिल्डर को विजली का बिल दे दिया था लेकिन बिल्डर से वो रुपया बिजली विभाग तक कभी नहीं पहुंचा.

6 अगस्त, 2018 को एनबीसीसी ने बताया कि आम्रपाली के अधूरे प्रॉजेक्ट्स पूरा करने में चार साल तक का समय लग सकता है, लेकिन उसने ये भी कहा कि पूरी स्थिति तभी साफ़ होगी जब 4 सितंबर तक पूरा ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया जाएगा.

8 अगस्त, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली समूह के कर्ताधर्ताओं को लताड़ की ‘रेगुलर डोज़’ देते हुए कहा कि वो खरीदारों को घर या फ्लैट उपलब्ध करवाएं, नहीं तो उनके पर्सनल फ्लैट्स बेच दिए जाएंगे और उन पैसों से अधूरे प्रोजेक्ट्स का काम पूरा किया जाएगा. कोर्ट ने बिजली कंपनियों को भी कहा कि वे आम्रपाली ग्रुप के अपार्टमेंट्स में काटी गई बिजली फिर से बहाल करें. कोर्ट ने 15 दिन के भीतर आम्रपाली ग्रुप के मैनेजिंग डायरेक्टर और डायरेक्टर्स की चल- अचल संपत्तियों का ब्यौरा देने को भी कहा.

4 सिंतबर, 2018. सुप्रीम कोर्ट ने तय किया एनबीसीसी ही आम्रपाली के सारे प्रोजेक्ट पूरा करेगी. एनबीसीसी ने अधूरे प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए 8500 करोड़ रुपए की जरूरत बताई और कहा कि प्रोजेक्ट पूरा करने में उसे दिक्कत नहीं है लेकिन रकम वो नहीं जुटा पाएगी. NBCC ने कहा कि वो आम्रपाली के 15 हाउसिंग प्रोजेक्ट 36 महीनों में पूरा कर लेगी. कोर्ट ने कहा कि वो पैसे जुटाकर एनबीसीसी को देगी.

6 सिंतबर, 2018. कोर्ट ने कहा कि अधूरे प्रोजेक्ट्स को पूरा करने के लिए आम्रपाली की उन 16 प्रॉपर्टीज को बेचा जाएगा जो अब तक गिरवी नहीं हैं. इससे 2,100 करोड़ रुपए इकट्ठा होंगे. कोर्ट ने आम्रपाली के वकील गौरव भाटिया से पूछा कि 2,100 में से 1,000 करोड़ रुपए तुंरत जुटाने होंगे, इसके लिए वो राय दें की कौन-कौन सी प्रोपेर्टी बेची जा सकती है? कोर्ट ने कहा है कि या तो आप फिगर आउट करें वरना हम आपकी प्रोपेर्टी आपका घर भी बेच सकते हैं.

प्रदर्शन, धरने, मांगें... मगर न्याय कब?
प्रदर्शन, धरने, मांगें… मगर न्याय कब?

जब आम्रपाली के सीएमडी अनिल शर्मा ने 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ा था तो अपनी संपत्ति की वैल्यू 850 करोड़ दिखाई थी. चार साल बाद उन्होंने सिर्फ 67 करोड़ रुपये की संपत्ति कोर्ट में दर्शाई. कोर्ट ने इसपर भी चुटकी लेते हुए पूछा कि क्या पूरा पैसा इलेक्शन कैंपेन में खर्च हो गया?

12 सितंबर, 2018 को फिर वही. कोर्ट ने आम्रपाली बिल्डर से कहा कि आपकी नियत और आपके हलफनामा को देखकर नहीं लगता कि आप समाधान नहीं करना चाहते. कोर्ट ने आम्रपाली से सात दिनों के भीतर संपत्ति का नया और करेक्ट आंकड़ा देने को कहा. गौरव भाटिया ने बताया कि लेजर वैली, सेंचुरियन पार्क और ड्रीम वैली नाम के तीन प्रोजेक्ट ऐसे हैं जिनमें कोई लोन नहीं हैं. इससे 3000 करोड़ रुपये जुटाए जा सकते हैं. आम्रपाली की संपत्तियों को बेचने का इंतजाम करने के लिए डीआरटी (डेप्ट रिकवरी ट्रिब्यूनल) के अधिकारी की नियुक्ति भी कर दी गई.

04 अक्टूबर, 2018. सुप्रीम कोर्ट ने एनबीसीसी को टेंडर निकालने को कहा ताकि आम्रपाली के अधूरे काम को समय से पूरा करने के लिए बिल्डरों का चयन हो सके. सुप्रीम कोर्ट ने NBCC से 60 दिन के अंदर लंबित पड़ी परियोजनाओं की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने को कहा है उधर डीआरटी में चल रही सुनवाई में आम्रपाली समूह की संपत्तियों को बेचने का काम भी शुरू हो गया.

4 अक्तूबर, 2018. को एनबीसीसी के सीएमडी डॉ. अनूप कुमार मित्तल ने एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि एनबीसीसी दिसंबर से आम्रपाली के अधूरे प्रोजेक्ट्स पर काम करना शुरू कर देगी. मित्तल ने बताया कि 15 दिन में एनबीसीसी टेंडर जारी कर देगा.

09 अक्तूबर, 2018. आप स्क्रॉल करके ऊपर पढ़ सकते हैं कि इस दिन क्या हुआ और अब रिलेट कर सकते हैं कि इसके पीछे की पूरी कहानी क्या थी.

बायर्स की आखिरी और अब एकमात्र उम्मीद सुप्रीमकोर्ट (एक लाइक तो बनता है.)
बायर्स की आखिरी और अब एकमात्र उम्मीद सुप्रीमकोर्ट (एक लाइक तो बनता है.)

सुप्रीम कोर्ट ने इस दिन ये भी कहा कि आरोपी लुका-छिपी का खेल न खेलें. जब तक दस्तावेज़ नहीं मिल जाते तब तक आपको हिरासत में लिया जाता है.


# अपडेट –

(पिच्चर अभी बाकी है)

# 1 – 10 अक्तूबर, 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने आम्रपाली की 9 प्रॉपर्टीज़ को सील करने का आदेश दिया.  10 की ही रात को कैद में रखे गए निदेशकों को पुलिस आम्रपाली के ऑफिस लेकर गई और वहां से कुछ पेपर्स इकट्ठा किए. इसी दिन एनबीसीसी ने अटके हुए 5 प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर निकाला. ये सारे वे प्रोजेक्ट्स हैं जिनमें फ्लैट्स बायर्स को दे दिए गए हैं लेकिन अभी इन फ्लैट्स का काम पूरा नहीं हुआ है. अभी उन प्रोजेक्ट्स के टेंडर नहीं निकले हैं जिनका काम बाकी है.

[ज़ारी…..]


# आम्रपाली और अनिल शर्मा –

(जैसे पेड़ खजूर)

बिहार के पंडारक गांव के अनिल शर्मा ने इंजीरियरिंग की है. उसकी एमटेक की डिग्री आईआईटी खड़गपुर की है.

ढेरो जॉब करने और छोड़ने के बाद 2002 में अनिल शर्मा ने अपना पहला प्रोजेक्ट आम्रपाली एक्जॉटिका शुरू किया. ये प्रोजेक्ट ऑन टाइम रहा था जिसके चलते आम्रपाली और अनिल का सिक्का एनसीआर में चल पड़ा. ये सब भरोसे की मज़बूत नींव के ऊपर बिल्ड हो रहा था. पहले तो आम्रपाली ने एक प्रोजेक्ट से दसियों विशालकाय प्रोजेक्ट तक अपने पांव पसारे – आम्रपाली सैफायर, आम्रपाली प्लेटिनम जैसे. फिर एक शहर से कई बड़े शहरों में – जयपुर, गाज़ियाबाद जैसे दो दर्जन शहर. फिर रियल स्टेट्स से कई अन्य सेक्टर्स में – एफएमसीजी, सर्विसेज़, फ़िल्म मेकिंग.

अनिल शर्मा - सपरिवार
अनिल शर्मा – सपरिवार

जहां हाथ लगाओ वो सोना. मिडास टच. बरेली में होटल खोला. ‘गांधी टू हिटलर’ जैसी फिल्मों का निर्माण किया. अपने को डोनाल्ड ट्रंप का फैन बताने वाला अनिल देर से ही सही मगर खुद भी ट्रंप के रस्ते चल पड़ा. मने रियल एस्टेट से पॉलिटिक्स. 2012 में राज्यसभा का चुनाव लड़ा. हारा. 2014 में नितीश की पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ा. हारा.

इस दौरान उसपर बालिका विद्यापीठ लखीसराय के सचिव की हत्या का आरोप भी लगा. जिसके चलते वहां पर आम्रपाली इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी वाले प्रोजेक्ट को बीच में ही बंद करना पड़ा. इसी आरोप के चलते वो अंडरग्राउंड हो गया और इन कांडो के चलते भरोसे और स्टेबिलिटी की नींव भी भरभरा कर गिर पड़ी. साथ ही गिर पड़ा उसके ऊपर खड़ा किया गया आम्रपाली नाम का एंपायर भी. अनिल का लंबे समय तक धंधे में ध्यान न देना भी आम्रपाली की असफलता का कारण बना.


# RERA क्या है?

(ये ‘रेरा’ घर, ये मेरा घर)

अब बात करते हैं हमारे-आपके यानी आम आदमी के फायदे की एक बात की.

1 मई, 2017 को ‘रियल एस्टेट’ में डेमोक्रेसी आई थी. इसका नाम है रेरा. फुल फॉर्म रियल एस्टेट रेगुलेटरी एक्ट. 15 मार्च, 2016 को लोकसभा और राज्यसभा से पास होने के बाद 1 मई, 2017 को ये लागू भी हो गया. यूपी में 26 जुलाई, 2017 को लॉन्च की गई थी। और इसे हम डेमोक्रेसी क्यूं कह रहे हैं? क्यूंकि इसने रियल एस्टेट में बिल्डर्स की मोनोपॉली या राजशाही ख़त्म करके ये स्थापित किया कि ग्राहक ही सर्व-शक्तिमान है. कैसे? हम तुलना करके बताते कि रेरा से पहले क्या नियम थे और उसके बाद क्या लेकिन पहले वाला कॉलम खाली है, यानी इससे पहले बिल्डर्स की लगभग मनमानी चलती थी. और रेरा के बाद क्या हुआ. कुछ बड़े नियम छोटे में बताते हैं. –

हमाम में सभी वस्त्रहीन हैं - एक और बड़ी कंपनी 'जेपी ग्रीन्स' का भी कमोबेश यही हाल है.
हमाम में सभी वस्त्रहीन हैं – एक और बड़ी कंपनी ‘जेपी ग्रीन्स’ का भी कमोबेश यही हाल है.

# सभी ऐसे रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स जिनका एरिया 500 स्क्वेयर मीटर से ज्यादा है या उस प्रोजेक्ट में 8 से ज्यादा अपार्टमेंट्स बनने हैं तो उनके लिए रेरा में रजिस्टर करवाना मस्ट है.

# बिल्डर को अगर कोटेशन और नक्शा वगैरह दे चुकने और बयाना ले चुकने के बाद अपने मकानों में कोई परिवर्तन करना है तो ऐसा करने से पहले उसे कम से कम दो तिहाई ग्राहकों से अप्रूवल लेना होगा.
ट्रांसपरेंसी किसी भी रिश्ते का सबसे बड़ा बांड है. फिर चाहे वो बिल्डर-ग्राहक का ही रिश्ता क्यूं न हो. किसी भी प्रोजेक्ट का पूरा प्लान, उसका लेआउट, प्रोजेक्ट से संबंधित सरकारी मंजूरियां (जैसे: फ़ायर सेफ्टी, पानी, बिजली) और लैंड टाइटल स्टेटस (मने वो ज़मीन जिसमें प्रोजेक्ट बन रहा है वो किसके नाम पर है, लीज पर है, या खरीदी हुई है, दो भाइयों की है या अकेले बंदे की है, गांव में आती है या नगरपालिका के अंतर्गत आती है) की जानकारी अपने ग्राहकों से शेयर करनी होगी. कॉन्ट्रैक्टर्स, डेवलपर्स, बिल्डर्स कौन हैं और उनके बारे में पूरी जानकारी भी इसी ‘ट्रांसपरेंसी’ का हिस्सा होंगे.

# ग्राहकों को टाइमलाइन की जानकारी देनी होगी मने कितना काम हो गया, कितना बाकी है, और फ्लैट की चाबी सही समय पर एलोटी को न सौंपने पर ज़ुर्माने के रूप में मंथली इन्ट्रेस्ट देना होगा.

# अगर कोई प्रोजेक्ट रेरा में रजिस्टर्ड नहीं है तो उसे प्रोजेक्ट माना ही नहीं जाएगा और उसके एडवरटीज़मेंट, पेम्फलेट सब ग़ैर कानूनी होंगे. जब रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी हो जाएगी और सभी मंजूरियां मिल जाएंगी, तब प्रोजेक्ट की मार्केटिंग की जा सकती है.

# आम्रपाली के फ्रॉड में सबसे बड़ा हाथ साइफन का था. साइफन मने एक खाते के पैसे को दूसरे खाते में ट्रांसफर करना. एक प्रोजेक्ट के लिए इकट्ठा किए गए पैसे को दूसरे प्रोजेक्ट में लगा देना. रेरा के आ जाने के बाद बिल्डर्स को किसी प्रोजेक्ट का 70% पैसा रिज़र्व एकाउंट में रखना होगा. मतलब ये नहीं कि सोनू से साइकिल की प्रॉमिस करके पैसे लिए और मोनू के लिए बैट बॉल खरीद लिया. अब अंकिल सोनू को साइकिल तब देंगे जब राजू से कैरम के वास्ते पैसे मिलेंगे. न!

# और अंततः प्रॉपर्टी कीमत का 10 प्रतिशत हिस्सा ही एडवांस पेमेंट के रूप में लिया जा सकता है.

# लब्बोलुआब ये कि कुछ लोगों को अपने नॉस्टेल्जिया और कुछ लोगों को फिल्मों से पता होगा कि पहले के ज़माने में ग्राहकों को पैसा पूरा न देने पर या ऐसी किसी भी फ़ाइनेन्शियल दिक्कतों की स्थिति में भारी पेनल्टी देनी पड़ती थी. ऐसा नहीं है कि अब नहीं देनी पड़ेगी, लेकिन अब ‘केवल’ ग्राहकों को नहीं देनी पड़ेगी और पेनल्टी के नियम भी मनमाने नहीं होंगे. क्यूंकि नियम सरकारी होंगे, बिल्डर्स के मनमाने नहीं.


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