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जब कलकत्ता में लक्ष्मण और द्रविड़ ने कहा, "शाम तक खेलेंगे..."

यूं तो ये कथन मुखर होकर पहली बार विराट कोहली ने कहा था जिसे स्टंप माइक्स की मदद से हम सबही सुन पाए. लेकिन इस बात यकीन है कि शाम तक खेलने से होने वाली शारीरिक प्रतिक्रिया का पहली दफ़ा ऑस्ट्रेलिया को ही अहसास हुआ होगा. साल 2001. कोलकाता का ईडेन गार्डन्स मैदान. वो दिन जब बल्ले से इतिहास लिखा गया.

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डॉक्टर शांताराम और डॉक्टर सत्यभामा का बेटा. वेंगीपुरप्पू वेंकट साई लक्ष्मण. 17 साल का. जगह हैदराबाद. उसके सामने दो रास्ते हैं. डॉक्टर बनना है या क्रिकेटर. एक 17 साल की उम्र में लड़के के लिए अपनी आगे की ज़िन्दगी का रास्ता चुनना कोई बहुत आसन काम नहीं होता है. ये वो उम्र होती है जहां उसे दूसरों के दर्शन की सबसे ज़्यादा ज़रुरत होती है. यहां उल्टा था. लक्ष्मण अकेला था. उसे नहीं मालूम था कि कौन सा रास्ता चुनना फलेगा. क्यूंकि इसमें किसी भी लॉजिक से कोई भी रिज़ल्ट नहीं पक्का देखा जा सकता था. सब कुछ होनी पर तय होना था.

ऐसे में उसने फ़ैसला किया कि वो क्रिकेट खेलेगा. मां-बाप ने बैक किया. साथ ही मामा जी ने भी सपोर्ट किया. मगर साथ में एक बंदिश भी थी. पांच साल में कुछ करने की बंदिश. पांच साल में कुछ बड़ा नहीं हुआ तो वापस डॉक्टरी की पढ़ाई करनी होगी. लक्ष्मण ने उन दिनों भगवत गीता पढ़नी शुरू की. कहते हैं उन्हें सबसे ज़्यादा उस हिस्से ने इंस्पायर किया जिसमें कृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि कर्म किये जाते रहना चाहिए, बिना फल की चिंता किये. 17 साल के उस लड़के को ये इल्म हो गया था कि उसे लगातार मेहनत करते रहनी होगी. बिना रुके. बिना पीछे मुड़े, आगे की ओर चलते रहने की कोशिश करनी होगी. इसी क्रम में वो चल पड़ा. उसे ये मालूम था कि अपनी मेहनत और अपने काम के सिवा उसके पास तीसरा और कोई हथियार नहीं था जिससे वो अपने रिज़ल्ट को इन्फ्लुएंस कर सकेगा. उसने वही किया. और सालों बाद वो ईडेन गार्डन्स में खेल रहा था.

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कलकत्ता. सामने थी वो टीम जो उस वक़्त दुनिया की महानतम क्रिकेट टीम बन चुकी थी. ऑस्ट्रेलिया. सीरीज़ का दूसरा टेस्ट, चौथा दिन. लक्ष्मण के बल्ले से नाबाद 275 रन. इंडिया पहली इनिंग्स में 171 रन पर आल आउट हो गयी थी. फॉलो ऑन खेल रही थी. 52 रन पर पहला विकेट गिरने के बाद क्रीज़ पर वो आदमी आ रहा था जिसकी कलाइयां 360 डिग्री घूम जाती थीं. वो जो स्ट्रोकप्ले के नाम पर टाइमिंग की पराकाष्ठा के साथ बैटिंग करता था.


एक दफ़ा रिकी पोंटिंग ने कहा था कि लक्ष्मण सिर्फ ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ़ प्रैक्टिस करता है. हालांकि ये कमेन्ट उन्हें उनके करियर में बहुत देर में मिला लेकिन उस रोज़ शुरुआत होने को थी.


14 मार्च 2001. कलकत्ता. ईडेन गार्डन्स मैदान में 50,000 लोगों के सामने लक्ष्मण ने उस दिन 275 रन मारे. उस वक़्त इंडिया के इतिहास में सबसे बड़ा टेस्ट स्कोर. बाद में सहवाग नाम का एक खिलाड़ी भी टीम में आया. मगर उस रोज़ लक्ष्मण ने जब गावस्कर के 236 रन पार किये तो कलकत्ता चीख कर बंगाल की खाड़ी में समा जाना चाहता था. राहुल द्रविड़ ने साथ में 155 रन बनाये. पूरे दिन एक भी विकेट नहीं गिरा. तीसरे दिन के हालात ऐसे थे कि मालूम दे रहा था इंडिया अपनी सबसे बुरी हारों में से एक को देखने वाली है. लेकिन चौथे दिन जैसे जैसे इनिंग्स बढ़ रही थी. मामला बदलता दिखा.

कलकत्ता की उस हल्की लाल होती शाम में, बढ़ती परछाइयों के साथ मैदान में भीड़ बढ़ रही थी. शाम होते-होते मैदान में 50 हज़ार लोग थे. पूरे दिन में 335 रन बने. इतनी महीन बैटिंग कि गेंद एक भी बार हवा में नहीं उठी. उठी भी तो फील्डर्स से मीलों दूर. किसी भी फील्डर के पास कोई भी चांस नहीं. द्रविड़ और लक्ष्मण की ये इनिंग्स असल में आज थीसिस का विषय होना चाहिए. इसपे थीसिस होनी चाहिए. कैसे पूरे दिन दुनिया की सबसे बड़ी बॉलिंग यूनिट को यूं घुमाया गया मानो किसी बैल की नाक में रस्सा डालकर उसे सरे-बाज़ार घुमाया जा रहा हो. कुल नौ गेंदबाज गेंद फेंक कर चूर हो चुके थे. द्रविड़ अपने हेलमेट से लीटरों पसीना गिराकर पिच के आसपास की ज़मीन को झील में बदल चुके थे. उनके हेलमेट में टुल्लू फिट था शायद. और दूसरी तरफ वीवीएस लक्ष्मण. खड़ा कालर और सीधा बल्ला. मजबूत कलाइयां. उस दिन उनका बल्ला गेंदों को ऑफ स्टम्प के बाहर से फ्लिक नहीं कर रहा था बल्कि इतिहास लिख रहा था. उनकी कलाइयां हवा का रुख बदल रही थीं. वो हवा उस रोज़ ऑस्ट्रेलिया को झुलसा रही थी.

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किसी ने कहा था कि “Cricket is a funny game.” स्टीव वॉ से उस रोज़ के बारे में पूछिए. उन्हें उस दिन में कोई भी ह्यूमर नज़र नहीं आएगा. ये वो दिन था जब तेंदुलकर के जाने के बाद किसी ने खूंटा गाड़ा था. उस दिन हर कोई दौड़ना चाहता था. दौड़ते-दौड़ते ईडेन गार्डन्स में मौजूद भीड़ का हिस्सा हो जाना चाहता था. उस दिन कलकत्ता की गलियों में तली जाती मछलियों की नहीं क्रिकेट की महक फ़ैली हुई थी. हर कोई, शाम होते-होते सारे काम छोड़ क्रिकेट में डूब चुका था.

उस दिन को अद्भुत के सिवा किसी और शब्द से परिभाषित करना ग़लत होगा. मैदान में मौजूद भीड़ मैच को एक बड़ी लड़ाई में तब्दील कर चुकी थी. वैसी लड़ाई जो कहानियों में मिलती है. जिसमें दो दैत्य यूं आपस में भिड़ते हैं कि उनके टकराने पर बादल गरजते हों. उनके एक दूसरे पर पड़ते एक-एक थपेड़ों की गूंज दूर कहीं कोई सूनामी ला देती हों. ये मैदान लॉर्ड्स का सा सूफ़ीपन नहीं समेटे हुए था. लेकिन इस मैदान का अपने आप में एक कल्चर था. इस मैदान में इमोशन था. ये वही मैदान था जहां विनोद कांबली रोते हुए मैदान से बाहर निकला था. जहां दर्शकों ने स्टैंड्स में आग लगा के रख दी थी. उस दिन वहां तसले में भर भर के मुहब्बत लुटाई जा रही थी. और लक्ष्मण उन सभी के साथ पूरा न्याय कर रहे थे.

और ये वो एक दिन था जब पहली बार द्रविड़ ने अपने द्रविड़ होने के इतर कुछ काम किया. उस दिन द्रविड़ ने अपनी सेंचुरी के ठीक पहले काफी गेंदें जाने दीं. और सेंचुरी पूरी होने पर सिर्फ पवेलियन की ओर बल्ला दिखाना काफी नहीं समझा. एक इशारा किया प्रेस बॉक्स की ओर भी. उस प्रेस बॉक्स की ओर जहां से कितने ही कीस्ट्रोक्स पिछले कुछ महीनों में द्रविड़ को चुका हुआ बता रहे थे.

इंडिया का दिन खतम हुआ था 589 पर 4 विकेट पर. ऑस्ट्रेलिया से 315 रन आगे. एक दिन का खेल बाकी. और बाकी इतिहास में दर्ज है. हरभजन की हैट्रिक. सचिन का हेडेन और गिलक्रिस्ट का एक के बाद एक लपेटना. गांगुली का एकमात्र ओवर. पेस बॉलर्स की कम से कम उपस्थिति. सब कुछ लक्ष्मण की ज़िद की बदौलत. वेरी वेरी स्पेशल लक्ष्मण.


 वीडियो- वो किस्से जब क्रिकेट मैच अजीबोगरीब वजहों से रुक गए

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