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आज़ादी के बाद भारत को ब्रिटेन से ‘दिल्ली’ को क्यों ख़रीदना पड़ा?

आज 15 सितंबर है और आज की तारीख़ का संबंध है एक नेवल शिप से. फ़िल्म ‘पायरेट्स ऑफ़ द कैरीबियन’ में जैक स्पैरो ‘ब्लैक पर्ल’ जहाज़ के लिए कहता है,

“Wherever we want to go, we go. That’s what a ship is, you know. It’s not just a keel and a hull and sails – that’s what a ship needs. Not what a ship is. What a ship really is, is freedom.”

यानी

तुम्हें पता है, एक जहाज़ क्या होता है? हम जहां जाना चाहें, जा सकते हैं. ये जज़्बात एक जहाज़ की असलियत है. पतवार, पाल या कील. ये सिर्फ़ वो चीज़ें हैं जिनकी जहाज़ को ज़रूरत होती है. लेकिन जहाज़ असल में जिस चीज़ का नाम है, वो है ‘आज़ादी’.

आज़ादी और रॉयल इंडियन नेवी

‘आज़ादी’, चलिए इसी एक शब्द से शुरुआत करते हैं. 15 अगस्त 1947 को दिल्ली में जब नेहरू ‘Tryst with Destiny’ स्पीच दे रहे थे, तो उनके और बाकी नीति निर्माताओं के मन में सुरक्षा का मुद्दा सबसे बढ़ा सवाल था. द्वितीय विश्व युद्ध के बाद भारत जियोग्राफी के हिसाब से सबसे कठिन स्थिति में था. पाकिस्तान के पैदा होने से ही तय हो गया था कि भारत से उसका रिश्ता क्या होगा. पूर्व और पश्चिम दोनों तरफ़ उसकी मौजूदगी थी. और सिर पर चीन खड़ा था, जो उस दौर में भी भारत को इम्पीरियलिज़म के अवशेष के तौर पर देखता था.

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15 अगस्त 1947 को आज़ादी का ऐलान करते हुए प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू (तस्वीर: भारत सरकार)

ब्रिटिश इंडियन आर्मी दो विश्व युद्ध लड़ चुकी थी. रॉयल इंडियन एयरफोर्स की ताक़त भी ठीकठाक थी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल भारत की विशाल तटीय बाउंड्री की रक्षा का था. ब्रिटेन ने इंडियन नेवी को सिर्फ़ एक कोस्टल डिफ़ेंस फ़ोर्स के रूप में तैयार किया था. आक्रमण और युद्ध की स्थिति में ब्रिटेन की रॉयल नेवी ही मोर्चा सम्भालती थी. 1945 में जब WW2 युद्ध खत्म हुआ, तब भारतीय नेवी की स्थिति बहुत कमजोर थी. इसकी एक बड़ी वजह थी कि बहुत सी नेवल शिप और मैनपावर पाकिस्तान के हिस्से में चली गई थीं. नाम के लिए भारत के पास 4 स्लूप्स (छोटी सेल बोट), दो फ़्रिगेट (एक छोटा जहाज़ जो स्काउटिंग के काम आता है) और कुछ छोटे वेसल बचे थे.

थोड़ा और पीछे जाएं तो ऐतिहासिक रूप से भारत पर हमेशा उत्तर से आक्रमण होता आया था. इसलिए शक्तिशाली मुग़लों ने भी कभी समंदर की तरफ़ ध्यान नहीं दिया. इसी का फ़ायदा उठाकर पहले पुर्तगालियों, फिर फ़्रांसीसियों ने और अंत में अंग्रेजों ने समंदर की तरफ़ से भारत में प्रवेश किया और पूरे भारत पर अपना आधिपत्य जमा लिया था. रक्षा कैपेसिटी बिल्ड करते समय नीति निर्माताओं के दिमाग़ में ये बात बैठी हुई थी. अपने तई प्रधानमंत्री नेहरू ने भी ज़ोर दिया कि भारत को इतिहास से सबक़ लेकर नेवी को भी बराबर रूप से स्ट्रांग बनाना चाहिए.

अकिलीज हील

इसी को देखते हुए आज़ादी के तुरंत बाद पहला नेवल प्लान पेश किया गया. जिसमें निहित था कि भारत की नेवी में दो फ़्लीट होंगी. हर फ़्लीट में एक नेवल एयरक्राफ्ट कैरियर होगा जिसके साथ क्रूज़र, डिस्ट्रॉयर, ऑक्सिलरी क्राफ़्ट, सबमरीन फ़ोर्स और एयर आर्म को जोड़ा जाएगा. इसी कड़ी में भारत ने पहला क्रूज़र शिप ब्रिटेन से ख़रीदा. नाम HMS अकिलीज.

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अकिलीज को नदी में डुबाती हुई उसकी मां थेटिस (पेंटिंग: पीटर पॉल रॉबिन्स)

इसका नाम एक ग्रीक मिथकीय किरदार के नाम पर रखा गया था. जिसकी कहानी भी बड़ी दिलचस्प है.

कहते हैं, जब अकिलीज पैदा हुआ तो पंडितों ने भविष्यवाणी करी कि वो ज़्यादा समय तक ज़िंदा नहीं बचेगा. इसलिए अकिलीज की मां थेटिस उसे स्टाइक्स नदी के पास ले गई. माना जाता था कि नदी के पानी में ऐसी शक्ति थी कि जो उसमें नहा ले, उसे कोई चीज़ क्षति नहीं पहुंचा सकती. थेटिस ने अकिलीज को एड़ी से पकड़कर नदी में डुबाया. अकिलीज का बाकी शरीर तो नदी में डूब गया लेकिन उसकी एड़ी सूखी रह गई. आगे जाकर एक युद्ध के दौरान उसकी एड़ी में तीर लगा, जिससे उसकी मृत्यु हो गई. इसी कहानी से ‘अकिलीज हील’ टर्म का जन्म हुआ. किसी की कमजोर पक्ष को दर्शाते हुए उसे ‘अकिलीज हील’ कहा जाता है.

बैटल ऑफ़ रिवर प्लेट

अकिलीज की ही तरह HMS अकिलीज जहाज़ की कहानी भी बड़ी रोचक है.

HMS अकिलीज ने न्यूज़ीलैण्ड की तरफ़ से द्वितीय विश्व युद्ध में हिस्सा लिया था. द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ सितंबर 1939 में. जब जर्मनी ने पोलैंड पर क़ब्ज़ा कर लिया और ब्रिटेन और फ़्रांस देखते रख गए. ग्लोबल रिसेशन से उबर रहे ब्रिटेन और फ़्रांस के लिए ये अच्छी खबर नहीं थी. वो किसी भी क़ीमत पर युद्ध अवॉइड करना चाह रहे थे. इसी कारण सितंबर 1939 और मई 1940 के बीच छुटपुट झड़पों के अलावा कुछ ख़ास नहीं हुआ. इसीलिए इस टाइम ड्यूरेशन को ‘फोनी वॉर’ या ‘दिखावे का युद्ध’, इस नाम से जाना जाता है. लेकिन ज़मीन पर जहां कमोबेश शांति थी, पानी पर लड़ाई शुरू हो चुकी थी. जर्मन बैटलशिप ‘ग्राफ़ स्पी’ अटलांटिक महासागर में पेट्रोलिंग कर रही थी. मित्र राष्ट्रों, ख़ासकर ब्रिटेन का सारा सामान इसी रास्ते होकर आता था. और ‘ग्राफ़ स्पी’ इस रास्ते पर ख़तरा बना हुआ था. सितंबर 1939 से लेकर नवम्बर 1939 तक ‘ग्राफ़ स्पी’ ब्रिटेन के 8 मालवाहक जहाज़ों को डुबा चुका था.

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बैटल ऑफ़ रिवर प्लेट के दौरान जर्मन जहाज़ ग्राफ़ स्पी (तस्वीर: Imperial War Museums UK)

मजबूरन ब्रिटेन को अपनी रॉयल नेवी फ़्लीट युद्ध में उतारनी पड़ी. 13 दिसम्बर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध की पहली नेवल बैटल लड़ी गई. मित्र राष्ट्रों की नेवल फ़्लीट में 3 जहाज़ थे. HMS अकीलीज, एजैक्स और एक्सेटर. इसे बैटल ऑफ़ रिवर प्लेट के नाम से जाना जाता है. HMS अकीलीज के कमांडिंग ऑफ़िसर थे, विलियम एडवर्ड पैरी‘. जो आगे जाकर रॉयल इंडियन नेवी के दूसरे कमांडर इन चीफ़ बने. कहा जाता है कि जेम्स बॉन्ड मूवी में ‘M’ का कैरेक्टर पैरी से ही इंस्पायर होकर लिखा गया था.

1948 में भारत ने HMS अकीलीज को ब्रिटेन से ख़रीदा. और ये बन गया HMS दिल्ली. आज ही दिन यानी 15 सितंबर 1948 को HMS अकीलीज मुम्बई पोर्ट पर पहुंचा था. जहां प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इसे रिसीव किया. HMS दिल्ली को मुंबई में रिसीव करते वक्त ‘विलियम एडवर्ड पैरी‘ भी मौजूद थे.

1950 में गणतंत्र की स्थापना के बाद इसका नाम INS दिल्ली हो गया. ये आज़ाद भारत का पहला बैटल शिप था. इसमें चार शाफ़्ट थे जिनकी पावर 72 हज़ार BHP (ब्रेक हॉर्स पावर) थी. साथ ही INS दिल्ली में 1800 टन की फ़्यूल कपैसिटी थी. शिप पर एक समय में 700 नौसैनिक तैनात किए जा सकते थे.

भारत के लिए INS दिल्ली का महत्व

भारत नया-नया आज़ाद हुआ एक गरीब देश था. एक थर्ड वर्ल्ड कंट्री, पश्चिमी देशों के लिए जिसकी कुछ ज़्यादा अहमियत नहीं थी. सिवाय उसकी ज्योग्राफिकल लोकेशन के. अमेरिका और रूस भारत को साउथ एशिया और इंडियन ओशन में प्रभुत्व जमाने का ज़रिया भर मानते थे. दुनिया में हर देश अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाने के लिए किसी रूपक को चुनता है. जैसे अमेरिका अपनी मिलिटरी पावर, आर्थिक ताक़त के लिए जाना जाता है. ब्रिटेन अपनी राजशाही के लिए और खाड़ी के देश तेल के लिए.

भारत के पास ना तेल था, ना राजशाही और ना ही आर्थिक ताक़त. ऐसा माना जाता है कि न्यूक्लियर और स्पेस प्रोग्राम्स की बदौलत भारत ने दुनिया को अपनी ताक़त का सबूत दिया था. या कहें कि इन कारणों से भारत दुनिया की नज़रों में आया. लेकिन इस मामले में भारतीय नेवी वो पहला उपक्रम थी, जिसने दूर देशों की यात्रा कर पहली बार भारत की शक्ति का प्रदर्शन किया था.

सर्वतो जयमिच्छमि

INS दिल्ली ने भारत के लिए एक पैराडाइम शिफ़्ट का काम किया. इसके तीन कारण थे.

पहला कि INS दिल्ली से भारत के पास लॉन्ग डिस्टेंस नेवी मिशन करने की क्षमता आ गई थी. इससे पहले भारतीय नौसैनिकों ने WW2 के दौरान सिर्फ़ छोटे शिप्स पे काम किया था, जैसे स्लूप्स, माइन्स्वीपर और corvette. INS दिल्ली जैसे बढ़े जहाज़ पर काम करने के अनुभव ने नौसेना को नए आत्मविश्वास से रूबरू करवाया.

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INS दिल्ली C74 जहाज़ (तस्वीर: भारतीय नौसेना)

दूसरा, कॉम्बैट पावर. INS दिल्ली में 3 turrets थे, इनमें से एक शिप में एंड की तरफ़ लगा था. जिसके कारण शिप का फ़ाइरिंग आर्क बहुत फैला हुआ होता था. इसकी फ़ायर पावर का हिसाब कुछ यूं था,

एक 6 इंची मेन गन
आठ 4 इंची गन
पंद्रह  40 मिलिमीटर गन
एंटी एयरक्राफ्ट डिफ़ेंस के लिए चार एंटी टॉरपीडो 3 पाउंडर्स
और आठ  21 इंच की टॉरपीडो टयूब्स

तीसरा ये कि इस कॉम्बैट पावर के साथ INS दिल्ली ना केवल लॉन्ग नेवी मिशन को अंजाम दे सकता था. बल्कि डिस्टेंट पोर्ट्स पर अपनी ताक़त का प्रदर्शन भी कर सकता था. वैसे तो ये जहाज़ ब्रिटेन में बने थे, लेकिन इनके मेंटिनेंस और ऑपरेशन के अनुभव से भारत चंद सालों में ही एक बड़ी नेवल शक्ति बन गया था. 1960’s में ये एशिया के सबसे बड़े बैटलशिप्स में से एक था और इसे ‘एम्प्रेस ऑफ़ इंडियन ओशियन‘ के नाम से जाना जाता था. INS दिल्ली का मोटो था, ‘सर्वतो जयमिच्छमि’ यानी “जहां जाओ विजय प्राप्त करो”.

ऑपरेशन विजय, 1961

पहली बार INS दिल्ली ने अपने मोटो को सार्थक किया सन 1961 में. ऑपरेशन विजय के दौरान. जब भारत ने गोवा, दमन और दीव को पुर्तगालियों के क़ब्ज़े से मुक्त कराया. इस ऑपरेशन में इंडियन नेवी का बड़ा रोल था, जिसकी सबसे बड़ी ताक़त थी INS दिल्ली. जैसा अमूमन होता है, जैसे-जैसे INS दिल्ली पुराना होता गया, इसको लेकर बहुत सी किवदंतियां भी जुड़ गईं. शिप को लेकर एक किस्सा आज तक मशहूर है कि इस पर एक लाल बालों वाला भूत रहता था, जो शिप और शिप पर काम करने वालों की सेफ़्टी का ध्यान रखता था.

दुनिया की सभी सेनाओं में एक कहावत चलती है,

‘बूढ़े सिपाही मरते नहीं, वो इतिहास में विलीन हो जाते हैं

30 जून 1978 को INS दिल्ली को मुम्बई पोर्ट पर डीकमीशन कर दिया गया. और भारतीय नौसेना का ये वीर रक्षक इतिहास में विलीन हो गया. लेकिन दुनिया की कई और नौसेनाओं की तरह भारतीय नौसेना में भी एक परंपरा है. कि जहाज़ की स्पिरिट ज़िंदा रहती है. सो जब एक जहाज़ डीकमीशन किया जाता है, तब भी नाम ज़िंदा रहता है. एक नए जहाज़ को मिलता है. इसीलिए जब भारत ने अपना पहला स्वदेशी विमानवाहक पोत माने एयरक्राफ्ट कैरियर बनाया, तो तय किया गया कि उसे INS विक्रांत नाम दिया जाएगा. INS विक्रांत भारत का पहला एयरक्राफ्ट कैरियर था. ये HMS Hercules नाम से रॉयल नेवी के लिए बना था. लेकिन द्वितीय विश्वयुद्ध खत्म होने पर इसे पूरा नहीं किया गया. भारत ने इसे खरीदा, पूरा करवाया और भारतीय नौसेना में कमीशन किया आईएनएस विक्रांत नाम से. ये 1961 में कमीशन हुआ. इसने 1971 की लड़ाई में हिस्सा लिया. और 1997 में इसे डीकमीशन कर दिया गया था.

इसी परंपरा को जारी रखते हुए जब 1997 में मुंबई के मज़गांव डेक में अपनी क्लास का पहला गाइडेड मिसाइल डिस्ट्रायर (D61) तैयार हुआ, तो इसे कमीशन करते वक्त नाम दिया गया – INS Delhi. जब ये लिखा जा रहा है, माने 2021 में, तो आईएनएस दिल्ली एक्टिव सर्विस में था. और आने वाले कई सालों तक रहेगा.


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