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श्रीकांत बोल्ला की इंस्पायरिंग स्टोरी, जिन्होंने कलाम से वादा किया कि देश का पहला नेत्रहीन राष्ट्रपति बनूंगा

तारीख 07 जुलाई, 1992. आंध्रप्रदेश का गांव मचिलीपटणम. गांव में खेती करने वाले दामोदर राव और वेंकटम्मा के घर बेटा पैदा हुआ. जिसके बाद आसपास के लोगों ने सलाह दी कि इसे मार डालो, वरना ज़िंदगी भर का दर्द झेलोगे. ये किसी काम का नहीं. जन्म से ‘अंधा’ होना तो पाप है. उस बच्चे के मां-बाप ने किसी भी कथित शुभचिंतक की नहीं सुनी. उस दृष्टिबाधित बच्चे को बड़ा करने का फैसला लिया. उन्हें भरोसा था कि वो बच्चा उनके लिए एक तोहफा है, जो करिश्मे दिखाएगा.

ऐसा हुआ भी. उस बच्चे को आज हम सब श्रीकांत बोल्ला के नाम से जानते हैं. वो श्रीकांत, जिन्होंने भेदभाव महसूस करने पर अपनी सरकार को कोर्ट में खड़ा कर दिया. वो श्रीकांत, जिन्होंने दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे कलाम से वादा किया कि देश का पहला विज़ुअली इम्पेयर्ड प्रेसीडेंट बनूंगा. बड़ी कंपनियों के जॉब ऑफर ठुकराकर खुद की कंपनी खोली और बदलाव लाए. अब जल्द ही श्रीकांत बोल्ला की इंस्पायरिंग स्टोरी हम स्क्रीन्स पर देखने वाले हैं. टी-सीरीज़ के भूषण कुमार और ‘सांड की आंख’ की प्रड्यूसर रही निधि परमार हीरानंदानी मिलकर श्रीकांत की बायोपिक प्रड्यूस करने वाले हैं, जिसे टेंटेटिव तौर पर ‘श्रीकांत बोल्ला’ के टाइटल से बनाया जाएगा.

‘सांड की आंख’ के डायरेक्टर तुषार हिरानंदानी इस बायोपिक को डायरेक्ट करेंगे. ‘स्कैम 1992’ और ‘Inside Edge’ की राइटिंग टीम का हिस्सा रहे सुमित पुरोहित और पॉपुलर पंजाबी फिल्म ‘किस्मत’ के राइटर-डायरेक्टर जगदीप सिद्धू श्रीकांत की कहानी को स्क्रीन के लिए लिखेंगे. श्रीकांत के रोल में हमें दिखेंगे राजकुमार राव. राजकुमार ने मीडिया स्टेटमेंट में कहा था कि श्रीकांत की जर्नी वाकई इंस्पिरेशनल है, और ऐसे किसी शख्स से जुड़ना मेरा प्रिविलेज है.

राजकुमार फिल्म में श्रीकांत का रोल निभाएंगे.
राजकुमार फिल्म में श्रीकांत का रोल निभाएंगे.

तुषार हिरानंदानी और राजकुमार राव मिलकर श्रीकांत की कहानी कैसे सुनाते हैं, उसका इंतज़ार हमें रहेगा. लेकिन उससे पहले आज आपको बताएंगे रियल वाले श्रीकांत की लाइफ जर्नी.


# “घर पर तुम्हें किस तरह की ज़िंदगी मिलेगी?”

श्रीकांत के माता-पिता चावल की खेती करते, इसलिए बेटे को भी खेतों में ले जाना शुरू कर दिया ताकि कुछ मदद कर सके. लेकिन श्रीकांत चाहकर भी हाथ नहीं बंटा पाते. फैसला लिया कि बेटा खेत के काम तो नहीं कर पाएगा, इसे पढ़ाई में लगाना ही बेहतर है. सबसे करीबी स्कूल था करीब 4-5 मील दूर. ऊपर से वहां तक जाने का कोई साधन नहीं. किसी भी तरह श्रीकांत को ये सफर पैदल ही तय करना होता. लेकिन असली समस्या इस सफर के बाद आती.

जब श्रीकांत स्कूल पहुंचते, और उन्हें अपने आप लास्ट बेंच पर पहुंचा दिया जाता. गेम्स पीरियड की घंटी बजती और सारी क्लास ग्राउंड में मिलती. श्रीकांत भी इस उम्मीद से बाहर जाते कि उनके साथ कोई खेलेगा, पर हर बार हताश होना पड़ता. उन्हें कोई अपने साथ नहीं खिलाता. श्रीकांत अपने इंटरव्यूज़ में बताते हैं कि कच्ची उम्र में ही अकेलापन उन्हें खाने लगा था, और चाहकर भी इस बारे में कुछ नहीं कर पा रहे थे. घर पर मां-बाप को बेटे के हाल का पता चला. ऐसे में एक रिश्तेदार ने सुझाव दिया कि श्रीकांत का स्पेशल स्कूल में दाखिला करवा देना चाहिए. रिश्तेदार की बात मानकर श्रीकांत को हैदराबाद के देवनार स्कूल फॉर ब्लाइंड में भेजा गया.

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श्रीकांत अपने इंटरव्यूज़ में बताते हैं कि खोट उनकी नज़र में नहीं था, दुनिया की नज़र में था.

हमेशा घरवालों के साथ रहे श्रीकांत अब महज सात साल की उम्र में घरवालों से करीब 250 किलोमीटर दूर आ चुके थे. घर और घरवालों को मिस करने लगे. किसी भी चीज़ में मन नहीं लगता. एक दिन स्कूल से भागने की कोशिश भी की, लेकिन पकड़े गए. श्रीकांत का ये कारनामा जानकर एडमिशन करवाने वाले रिश्तेदार उनके पास पहुंचे, प्यार से समझाया और कहा,

घर पर जाकर तुम्हें कैसी ज़िंदगी मिलेगी?

उस दिन के बाद श्रीकांत ने कभी घर जाने की ज़िद नहीं की.


# पढ़ने नहीं दिया तो सरकार पर केस ठोक दिया

श्रीकांत में सीखने की एक नई चाह का उदय हुआ. सबसे पहले शुरुआत हुई ब्रेल से. ब्रेल सीखने के बाद वो मुड़े इंग्लिश की ओर. क्रिएटिव राइटिंग और डिबेट्स में हिस्सा लेने लगे, और सिर्फ हिस्सा ही नहीं, जीतते भी थे. पढ़ाई से इतर उनकी रुचि चेस और क्रिकेट में भी थी. अपनी रुचि को सिर्फ शौकिया तौर पर ही नहीं रखा. चेस और ब्लाइंड क्रिकेट, दोनों में नैशनल लेवल तक खेले. एक समय स्कूल से भागने वाले श्रीकांत अब क्लास के टॉपर थे.

साल 2006 में तब के राष्ट्रपति रहे एपीजे अब्दुल कलाम ने ‘लीड इंडिया 2020’ शुरू किया. जहां यंगस्टर्स को मेंटर किया जाता, ताकि वो मिलकर देश के उज्ज्वल भविष्य के लिए काम कर सकें. श्रीकांत भी उन सिलेक्ट किये यंगस्टर्स में से थे. अब्दुल कलाम सभी बच्चों से बातचीत कर रहे थे. उनसे सवाल किया कि आप आगे चलकर क्या करना चाहते हैं. उन बच्चों ने जो भी जवाब दिए, उन सभी में से नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले श्रीकांत का जवाब राष्ट्रपति को याद रहा. श्रीकांत ने कहा कि वो देश के पहले नेत्रहीन राष्ट्रपति बनना चाहते है. श्रीकांत का जवाब और जिस कॉन्फिडेंस से उन्होंने जवाब दिया, उसकी कलाम ने तारीफ की.

Srikanth Bolla Apj Abdul Kalam
लीड इंडिया 2020 के एक प्रोग्राम के दौरान दिवंगत राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और श्रीकांत बोल्ला.

अपने स्कूली दिनों में श्रीकांत ने कंप्युटर सीखना भी शुरू कर दिया था. इसलिए जब दसवीं क्लास खत्म होने वाली थी, तो वो क्या सब्जेक्ट चुनोगे जैसे सवाल के लिए तैयार थे. श्रीकांत ने अपने दसवीं के एग्ज़ाम में 90 पर्सेंट स्कोर किया. जिसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए साइंस लेना चाहते थे. स्कूल नहीं माना, स्टेट बोर्ड का हवाला दिया. कहा कि चाहो तो आर्ट्स ले सकते हो, पर साइंस नहीं. श्रीकांत कॉम्प्रोमाइज़ करने के लिए नहीं पढ़ना चाहते थे. ठान लिया था कि पढ़ना तो साइंस ही है. जब सारे ऑप्शन आजमाकर भी बोर्ड नहीं माना तो वो उसे लेकर कोर्ट पहुंच गए. अपनी ही सरकार पर केस कर दिया. उनकी ये लीगल बैटल छह महीनों तक चली. जिसके बाद एक दिन उनके घर एक गवर्नमेंट ऑर्डर आया. लिखा था,

तुम साइंस सब्जेक्ट्स ले सकते हो लेकिन अपने रिस्क पर.

रिस्क से इस्क करने वाले श्रीकांत ने मेहनत डबल कर दी. स्टेट बोर्ड में विज़ुअली चैलेंज्ड स्टूडेंट्स के लिए साइंस पढ़ने की कोई सुविधा नहीं थी. ऐसे में श्रीकांत ने अपनी तमाम किताबों को ऑडियो बुक्स में कंवर्ट करवा लिया. पढ़ाई में कोई कसर नहीं छोड़ी, जिसका नतीजा ये हुआ कि जब बाहरवीं बोर्ड के रिज़ल्ट आए, तो श्रीकांत बोल्ला के कार्ड पर ‘Passed with 98%’ लिखा था.


# इसमें तेरा घाटा, मेरा कुछ नहीं जाता

श्रीकांत ‘साइंस ले लो, फिर तो ऐश है’ वाले सिद्धांत को पार कर चुके थे. बोर्ड में अच्छा स्कोर करने के बाद लगा कि यहां से तो सब आसान हो जाएगा, पर उनकी कहानी में बड़े वाला लेकिन उनका इंतज़ार कर रहा था. देश के तमाम बड़े इंजीनियरिंग कॉलेजों के फॉर्म भरे, क्या IIT और क्या BITS. जवाब में कहीं से भी हॉल टिकट नहीं आया. बस आई तो चिट्ठी, जिसमें लिखा था कि चूंकि आप देख नहीं सकते, इसलिए आपको कम्पेटिटिव एग्ज़ाम में बैठने नहीं दिया जा सकता. श्रीकांत को बुरा लगा, पर हताश नहीं हुए. सोचा कि आईआईटी मुझे नहीं चाहती, तो मुझे भी आईआईटी नहीं चाहिए.

Srikanth Mit
MIT दिनों में श्रीकांत. फोटो – फेसबुक/श्रीकांत बोल्ला

इंटरनेट पर ऑप्शंस खोजना शुरू कर दिया, जहां उनके जैसे बच्चों के पढ़ने की सुविधा हो. अमेरिका के कॉलेजों का पता चला. जिसके बाद वहां के टॉप चार कॉलेज – MIT, बर्कली, स्टैनफोर्ड और कार्नेजी मेलन में अप्लाइ कर दिया. इंडिया में एक भी कॉलेज से जवाब नहीं आया था, या अमेरिका के चारों कॉलेजों ने उन्हें सिलेक्ट कर लिया. श्रीकांत ने MIT के साथ जाने का डिसीजन लिया. उन्हें वहां स्कॉलरशिप ऑफर की गई और वो MIT के इतिहास के पहले इंटरनेशनल ब्लाइंड स्टूडेंट भी बने.


# पढ़ाई अमेरिका से की, बदला इंडिया को

MIT से बिज़नेस मैनेजमेंट की पढ़ाई पूरी करने के बाद श्रीकांत को अनेकों जॉब ऑफर आने लगे. विदेश में बेहतर ज़िंदगी बनाने का मौका था. लेकिन इन सभी फैंसी जॉब ऑफर्स में उन्हें कुछ बात खटक रही थी. खूब पैसा होगा, गाड़ी-बंगला सब कुछ, पर क्या वो वाकई सिर्फ यही सब चाहते थे. मन में चलते इन्हीं सवालों को लेकर वो हैदराबाद चले आए.

श्रीकांत अपनी INKTalks में बताते हैं कि कब तक एक डिसेबल्ड बच्चे को क्लास की आखिरी सीट के लायक ही समझा जाएगा. इंडिया की 10 पर्सेंट आबादी जो डिसेबल्ड है, वो क्यों उसकी अर्थव्यवस्था में अपना योगदान नहीं दे सकती. इन सवालों का जवाब उन्होंने खुद ढूंढा. वो जानते थे कि अपने जैसे और बाकी लोगों के बीच का फर्क सिर्फ एजुकेशन और स्किल से ही दूर किया जा सकता है. विज़ुअली चैलेंज्ड बच्चों के लिए कंप्युटर ट्रेनिंग सेंटर खोला.

पैसे जुटाए, एक बिल्डिंग किराये पर ली, पांच कंप्युटर खरीदे, एक फैकल्टी मेम्बर को हायर किया, और कंप्युटर क्लासेज़ स्टार्ट हो गई. बच्चों को स्किल तो दे दी, लेकिन अब रोजगार का क्या होगा. इसका हल भी श्रीकांत ने खुद ही निकाला. अपनी पढ़ाई पूरी कर इंडिया आने के कुछ समय बाद ही वो फंडिंग जुटाने में लग गए थे. कुछ लाख रुपये जमा होने के बाद बोलांट इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड नाम की कंपनी खोली, जो इको फ़्रेंडली डिस्पोज़ेबल प्रोडक्ट बनाती. ये प्रोडक्ट पूरी तरह से पत्तों और रिसाइकल किये कागज़ से बनते. डिस्पोज़ेबल प्लेट, दोने और पेपर कप्स जैसे प्रोडक्ट बोलांट के प्रोडक्ट पोर्टफोलियो का हिस्सा हैं.

श्रीकांत का सपना पूरा करने में उनकी मदद की स्वर्णलता ने, जो स्कूल में उनकी टीचर थीं. बोलांट का 70 पर्सेंट वर्कफोर्स डिसेबल्ड एम्प्लॉईज़ से मिलकर बना है, जिन्हें ट्रेन करने का काम स्वर्णलता करती हैं. श्रीकांत के विजन ने बड़े-बड़े लोगों को प्रभावित किया. जिनमें से एक रतन टाटा भी हैं. जिन्होंने न सिर्फ श्रीकांत को मेंटर किया, बल्कि उनकी कंपनी में इंवेस्ट भी किया. बोलांट ने अपने पांच मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शुरू किये, और 2018 की एन्यूअल रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी का 150 करोड़ रुपये का टर्नओवर था.

श्रीकांत बोल्ला पर रिसर्च के दौरान उनके कई इंटरव्यूज़ देखे, पढे और सुने. सभी में एक कॉमन बात उभरकर आई – उनका कॉम्प्रोमाइज़ न करने वाला स्वभाव, और उनका सेंस ऑफ ह्यूमर जिसके चलते वो खुद को दया का पात्र नहीं बनाते. बल्कि उस पर हंसकर आगे बढ़ते हैं. राजकुमार राव उनके रोल में क्या वैल्यू एडिशन करेंगे, ये देखने लायक होगा. सब कुछ ठीक रहता है तो श्रीकांत बोल्ला पर बनने वाली फिल्म जुलाई 2022 में फ्लोर पर जाएगी.


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