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हिटलर जमीन में दबा एक बम है

विवेक आसरी
विवेक आसरी

यूरोप. दूर. ठंडा. पराया. अतीत को खुरचें, तो हम पर कब्जा करने वाला. और पीछे लौटें, तो हमें मसालों की कीमत चुका अमीर करने वाला. मगर सांस्कृतिक रूप से हमेशा दूर-दूर रहा.

लेकिन, ये सब का सब पास्ट है, जो टेंस रहा. प्रेजेंट मजेदार है. आपको पूरे यूरोप में देसी मिल जाएंगे. हमें भी मिल गए. हमारे देसी. नाम विवेक आसरी. जर्मनी में रहते हैं. और उन्होंने वादा किया है कि यूरोप के किस्से-कहानियां, सियासत और समाज के खूब नजारे दिखाएंगे. हमें. आपको.

वादे के मुताबिक वो लाए हैं ‘डाक यूरोप’ की एक नई किस्त. इस बार विवेक जर्मनी के आउग्सबुर्ग के बहाने हिटलर के बारे में कुछ बेहद रोचक बता रहे हैं. पढ़िए.


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आउग्सबुर्ग में डिफ्यूज किया गया बम (फोटो: रॉयटर्स)

क्रिसमस के रोज जर्मनी के शहर आउग्सबुर्ग को खाली करा लिया गया. 50 हजार लोगों को शहर से बाहर भेज दिया गया. खुदाई में दूसरे विश्व युद्ध के वक्त का एक बम मिला था. उसे डिफ्यूज करना था, तो शहर खाली करा लिया गया. दरअसल, मैं जिस मुल्क में रहता हूं, उसकी नींव में युद्ध है. इस कदर है कि जमीन खोदो, तो बम मिलते हैं. विशाल. टनों वजनी. वे, जो फेंके तो गए पर फटे नहीं. वे, जो कभी नहीं फटे. वे भी डराते हैं, क्योंकि फट सकते हैं. कभी भी फट सकते हैं.

Daak Europe

मुझे ये बम हिटलर जैसे लगते हैं. हिटलर भी वैसा ही है. जमीन में दबे बम जैसा. कभी भी निकल आता है. कहीं भी निकल आता है. उसकी मौत के 70 साल बाद भी सब उससे डरते हैं. उसके नाम से डरते हैं. उसकी आत्मकथा से डरते हैं. इसलिए 70 साल तक उस आत्मकथा को बैन करके रखा. सरकार ने उसका कॉपीराइट ले रखा था. 2015 में जब 70 साल बाद उसका कॉपी राइट खत्म हो गया, तो किताब दोबारा छपी. अंग्रेजी ट्रांसलेशन भी छपा. और उस ट्रांसलेशन की 85 हजार कॉपी बिक चुकी हैं. छठा एडिशन छप रहा है.

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हिटलर की आत्मकथा

लोग परेशान हैं कि ऐसा क्यों हो रहा है. लोग पूछ रहे हैं कि वे कौन हैं, जो इस किताब को पढ़ रहे हैं. क्यों पढ़ रहे हैं, जबकि 70 साल तक प्रचार किया गया कि यह किताब नहीं, नफरत की पोथी है. 70 साल तक प्रचार किया गया कि हिटलर इंसान नहीं था, शैतान था. स्कूलों में बच्चों को उसकी बेरहमी के किस्से सुनाए गए. युवाओं को उसकी दरिंदगी दिखाई गई. बार-बार बताया गया कि उसने जो किया, वह इंसानियत पर जमी ऐसी काई है, जो पूरी झील को बर्बाद कर सकती है.

तो क्या सारा प्रचार बेकार हो गया?

वह कभी मरा ही नहीं था? उसकी किताब आई और वह जिंदा हो गया?

छह एडिशन! डर सिर्फ किताब का नहीं है. हिटलर दिखने भी तो लगा है. घोर दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी की मजबूती के रूप में. पेगीडा जैसे प्रवासी-विरोधी हिंसक आंदोलन के रूप में. रिफ्यूजियों पर हमलों के रूप में. 2016 में ही उनके कैंपों पर 921 हमले हुए. 2014 में बस 199 हुए थे. 921 में से 857 हमले कट्टर दक्षिणपंथियों ने किए. 66 जगह आग लगा दी गई. इन लपटों में लोगों को हिटलर नजर आता है और वे डर जाते हैं. लड़ने लगते हैं इस नफरत के खिलाफ.

इसलिए किताब भी ज्यादा बिकने लगती है, तो आंदोलन होने लगते हैं. पर मुझे डर नहीं लगता, क्योंकि मैं देखता हूं कि एक रिपोर्टर विकलांग लोगों को उपलब्ध सुविधाओं पर स्टोरी कर रही है. वह बता रही है कि विकलांगों को बसों में कितनी असुविधा होती है. मैं हैरान हूं. असुविधा! हर बस में उनके लिए कई सीटें हैं. हर बस में वील चेयर के लिए जगह बनी है. अगर वील चेयर वाली कोई सवारी आती है तो ड्राइवर अपनी सीट से उतरकर आता है और दरवाजे पर लगा एक स्टैंड खोल देता है. बस में वील चेयर के लिए स्लोप बन जाता है. सवारी अंदर जाती है. ड्राइवर स्टैंड बंद करता है और तब अपनी सीट पर जाकर बस चलाता है. अगर इतनी सुविधाओं के बीच यह स्टोरी हो सकती है कि विकलांग लोगों के लिए सुविधाओं की कमी है, तो फिर दबे बमों से डरने की जरूरत है क्या! वे मिलते रहेंगे, डिफ्यूज किए जाते रहेंगे. भले ही शहरों को खाली करना पड़े.


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