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क्या राज्य सरकार, संसद से पास किसी कानून को मानने से इनकार कर सकती है?

सिटिजनशिप अमेंडमेंड एक्ट (CAA) का विरोध सड़कों पर तो हो ही रहा है, कई राज्य भी इसका विरोध कर रहे हैं. केरल विधानसभा में तो इसके ख़िलाफ प्रस्ताव पास कर दिया गया. सीएम पिनराई विजयन और केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद आमने-सामने आ गए. उन्होंने कहा कि राज्य सरकारों का संवैधानिक कर्तव्य है कि वो संसद द्वारा पारित कानूनों को लागू करें. पश्चिम बंगाल, पंजाब, मध्‍य प्रदेश, छत्‍तीसगढ़ भी बोल चुके हैं कि वो अपने यहां CAA को लागू नहीं करेंगे.

विजयन ने कहा,

‘ऐसा पहले नहीं हुआ है लेकिन आस-पास ऐसी चीज़ें हो रही हैं, जो पहले कभी नहीं हुई हैं. CAA सेक्युलर नज़रिए और देश के ताने-बाने के ख़िलाफ है और इसके तहत नागरिकता देने में धर्म के आधार पर भेदभाव होगा. ये कानून संविधान के मूल्यों और सिद्धांतों के विरोधाभास में है.’

विजयन ने कहा कि राज्य विधानसभाओं के अपने विशेषाधिकार हैं. इस पर रविशंकर प्रसाद ने कहा कि विजयन ‘बेहतर कानूनी सलाह’ ले लें.

लेकिन सवाल ये है कि क्या राज्यों के पास ये ताकत है कि वो संसद से पास किसी कानून को मना कर दें?

#संविधान क्या कहता है?

संविधान के हिसाब से देखें तो केरल विधानसभा के पास ऐसी कोई पावर नहीं है कि वो संसद से पास कानून के ख़िलाफ जाए. सिर्फ केरल ही नहीं, किसी भी राज्य के पास ये पावर नहीं है.

हमारे यहां फेडरल स्ट्रक्चर है. संघीय ढांचा. कनाडा के मॉडल पर आधारित. भारत का संविधान देश को ‘राज्यों का संघ’ कहता है. संविधान के पार्ट 11 में केंद्र और राज्य की विधायी, प्रशासनिक और कार्यपालिका की शक्तियों का ज़िक्र है. संविधान के आर्टिकल 245 से लेकर 263 तक केंद्र-राज्य संबंधों के बारे में बताया गया है.

केंद्र और राज्य के पास कौन सी शक्तियां होंगी और किन विषयों पर उन्हें कानून बनाने का अधिकार होगा. इस बारे में तीन लिस्ट्स हैं.

  1. यूनियन लिस्ट, यानी जिन विषयों पर केंद्र कानून बनाएगा.
  2. स्टेट लिस्ट, इसमें शामिल विषयों पर राज्य कानून बना सकते हैं.
  3. कॉनकरंट (समवर्ती) लिस्ट, इसके अंतर्गत केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं.

# यूनियन लिस्ट

इसमें 100 विषय (पहले 97 थे) हैं. इसमें रक्षा, आर्म्ड फोर्सेज, एटॉमिक एनर्जी और युद्ध-शांति, नागरिकता, प्रत्यर्पण, रेलवे, शिपिंग और नेविगेशन जैसी चीज़ें हैं.

यानी नागरिकता पर कानून बनाने का अधिकार केंद्र के ही पास है. इसी पर सारा विवाद है.

# स्टेट लिस्ट

इसमें 61 विषय (पहले 66 थे) होते हैं. इसमें लॉ एंड ऑर्डर, पुलिस फोर्स, हेल्थकेयर, ट्रांसपोर्ट, पुलिस, बिजली, ग्राम पंचायत जैसे विषय होते हैं.

# कॉनकरंट (समवर्ती) लिस्ट

इसमें शामिल विषयों में केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं. इसमें 52 विषय हैं. इसमें शादी, तलाक, संपत्ति का ट्रांसफर, शिक्षा, ट्रस्टी और ट्रस्ट, सिविल मामले, ड्रग्स और पॉइजन, लेबर वेलफेयर, बिजली, अखबार, किताबें, स्टांप जैसे विषय हैं.

अगर कोई विषय इन तीनों लिस्ट से बाहर का है तो उस पर संसद से बनाया गया कानून ही माना जाएगा.

केंद्र और राज्य की लिस्ट के विषयों में दोनों एक दूसरे में हस्तक्षेप नहीं कर सकते. अगर कोई राज्य, केंद्र की शक्तियों का उल्लंघन करता है तो राज्य में आर्टिकल 356 के तहत राष्ट्रपति शासन भी लगाया जा सकता है. इसके अलावा केंद्र-राज्य या राज्य-राज्य के बीच विवाद होने की स्थिति आर्टिकल 131 के तहत सुप्रीम कोर्ट के पास अधिकार क्षेत्र होगा.

# केंद्र-राज्य संबंध को लेकर ये तीन आर्टिकल अहम हैं

आर्टिकल 245

संसद भारत के पूरे राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकेगी और किसी राज्य का विधानमंडल राज्य या उसके किसी भाग के लिए कानून बना सकेगा.

संसद ने कोई कानून बनाया है तो वो इसलिए अमान्य नहीं होगा कि वो टेरिटरी से बाहर लागू होगा.

आर्टिकल 246

सातवीं अनुसूची की केंद्रीय सूची यानी लिस्ट वन में दिए गए विषयों पर संसद कानून बना सकती है.

आर्टिकल 248

राज्य या कॉनकरंट सूची के विषय को छोड़कर आर्टिकल 248 के तहत संसद के पास कानून बनाने की एक्सक्लूसिव पावर है.


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