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आज क्रिकेट के बाहुबली ऑस्ट्रेलिया ने पूरे भारत का सबसे बड़ा सपना तोड़ा था

केसू फिरंगी. बाहुबली बना दिया गया. ओमकारा के कहने पर भाईसाब ने केसू फ़िरंगी को जनेऊ पहनाने की परमीशन दे दी. पंद्रह साल से डेढ़ टांग पे घिसट-घिसट के घिस चुका लंगड़ा त्यागी नदी के पुल पे बैठा प्लास्टिक की बोतल से शराब पी रहा था. वो हैरान था. उसकी गणित के मुताबिक़ अगला बाहुबली उसे ही बनना था. साथ बैठा था रज्जो तिवारी. रज्जो कहता है, “वो साला कल का फिरंगी लौंडा, आया और सबके सामने से तुम्हारे मुंह से मालपुआ खींच के भकोस गया.”

ये डायलाग जब सुना था तो सीधे क्रिकेट के मैदान में पहुंच गया था. मुंह से मालपुआ एक बार और किसी ने भकोसा था.


उस दिन फ़िल्म नहीं मैच चल रहा था. स्क्रिप्ट 22 लोग लिख रहे थे. पसीने से. घास की पट्टी पर. जोहान्सबर्ग में. साल 2003. वर्ल्ड कप. इंडिया वर्सेज़ ऑस्ट्रेलिया.


ऑस्ट्रेलिया सारे मैच जीतती आई थी इस वर्ल्ड कप में. इंडिया ने एक हारा था. ऑस्ट्रेलिया से. सौरव गांगुली की कप्तानी और जॉन राइट की कोचिंग में टीम बहुत ही सधी हुई लग रही थी. जीतने की आदत लग चुकी थी. इंग्लैण्ड के खिलाफ़ नेहरा की बॉलिंग ने हमें एनर्जी से भर दिया था. सचिन रन बनाये पड़े थे. मैच के कुछ ही दिन पहले अख़बार में पढ़ा था – “वर्ल्ड कप और ऑस्ट्रेलिया के बीच में खड़े हैं सचिन.” हर्षा भोगले ने लिखा था. भोगले वो, कि अगर कभी क्रिकेट की रामायण लिखी जाए तो मैं चाहूंगा कि वाल्मीकि की बजाय हर्षा भोगले ही उसे लिखें.

मैच का दिन आया, टॉस हुआ. और टीवी के सामने बैठे हम सभी ने अपनी अपनी खोपड़ी पकड़ ली. यहां तक कि क्रिकेट के जानकारों ने भी. गांगुली ने पहले बॉलिंग चुनी. ये या तो पिच पढ़ने में हुई ग़लती थी  या इंडिया का ऑस्ट्रेलिया से मिली पिछली हार का हैंगओवर. लोग अपने अपने रीज़न देने लगे, कि गांगुली ने ऐसा आखिर क्यूं किया. मैंने भी मन ही में सोचा, “धूप है, बैट्समेन थक जायेंगे. शाम को आराम से सचिन बैटिंग कर लेगा.” ये केवल एक दिलासा था.

ज़हीर खान गेंदबाजी की शुरुआत नो बॉल से करते हैं. अगले दिन किसी अंग्रेजी अख़बार की पहली लाइन यही थी – “It all started with a no ball.” और सच,

Extra conceded by Zak

शुरुआत वहीं से हुई थी. एक नो बॉल से. इंडिया के वर्ल्ड कप से दूर जाने की शुरुआत. वो शुरुआत जिसे सिर्फ़ सचिन रोक सकते थे. ये सच है कि उस वक़्त सचिन वो सब कुछ अपने कंधे पर लाद के चलते थे जो इंसानी सोच किसी क्रिकेट के मैदान पर होता हुआ सोच सकती थी. 14वें ओवर में गिलक्रिस्ट को सहवाग के हाथों कैच करवाया गया. भज्जी की बॉल पर. लेकिन तब तक हवा का रुख मालूम चल चुका था. 105 रन बोर्ड पे थे. उस वक़्त भी एक टी-20 खेला जा रहा था. हेडेन और गिलक्रिस्ट ने जो शुरुआत दी थी, उसने काफी कुछ बदल कर रख दिया था. जो उकड़ू बैठे टीवी के सामने नाखून चबाया करते थे, अब फैल चुके थे. मैंने ये मैच अपने गांव में देखा था लिहाज़ा वहां एक ब्लैक एंड व्हाइट, 12 चैनल वाली टीवी थी जिस पर सिर्फ दो चैनल आते थे. हां, शहरों में ज़रूर लोगों ने बीच बीच में चैनल भी बदलने शुरू कर दिए होंगे.

लोग अक्सर मैचों के दौरान टोने-टोटके करते हैं. जैसे एक ही कुर्सी पर बैठे रहना, या हिलना डुलना नहीं, या किसी से बात न करना. मेरे एक भइय्या हैं जो इंडिया के हर इम्पोर्टेन्ट मैच के दौरान बियर पीते हैं. इंडिया हार जाती है तो अगले दिन कहते हैं कि अगर एक बोतल और होती तो मैच अपना था. ये उनका टोटका था जो आज भी है.


टोटके अक्सर उलटे भी पड़ जाया करते हैं. मुझे यकीन है गिलक्रिस्ट किसी टोटके की वजह से आउट हुआ था. और यही टोटका उल्टा पड़ गया.


क्यूंकि अब आ गया ऑस्ट्रेलिया का कप्तान. रिकी पोंटिंग. कॉलर खड़ा करके खेलने वाला राइट हैण्ड बैट्समैन. उस दिन न जाने क्या खा के आया था. 140 रन बनाये. बिना आउट हुए. हिंदी में बोले तो नाबाद!

Ponting

उस समय जब 140 रन बनाना हल्का काम नहीं था. सेन्चुरियां ऐसे नहीं लगती थीं जैसे आज थोक में लगती हैं. रन ऐसे नहीं बनते थे जैसे भंडारे में पूड़ियां बनती हैं. लेकिन उस रोज़ ये सब कुछ हुआ. वो सब कुछ जो अब तक नहीं होता था. मुझे यकीन है, कोई टोटका था जो उल्टा पड़ गया था.

नेहरा की छोटी गिरती हुई गेंदें, ज़हीर की ओवर पिच डिलीवरी, सभी वहां जा रही थीं जहाँ से आगे जाना एक क्रिकेट बॉल के लिए मानी नहीं है.

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हालांकि हल्का फुल्का मार के हेडेन भी 37 रन पर निपटा दिए गए लेकिन उनकी जगह आये डेमियन मार्टिन ने पोंटिंग के साथ ऐसा खेलना शुरू किया कि वो परेशान करते रहे, हम काम करते रहे वाला नारा चरितार्थ हो उठा. हमारा काम था गेंद फेंकना और उनका काम था हमें बाउंड्री मार-मार के परेशान करना. 8 छक्के मारे थे पोंटिंग ने. चौव्वे मात्र चार. 14 बार दो रन दौड़ के भागे. जो ये समझाता है कि पोंटिंग किस कदर फिट और दुरुस्त थे और साथ ही फ़ील्ड की कितनी गहरी समझ थी उन्हें. मानो खेलने नहीं मैच ही जीतने उतरे हों.

इंडिया का हर दांव उल्टा पड़ रहा था. बॉलिंग से शुरुआत करने से लेकर दो-दो लेफ़्ट आर्म पेसर को खिलाना. स्लिप्स खाली छोड़ देना. ऑन साइड में डीप में कम फील्डर लगाना. हर दांव उल्टा ही पड़ रहा था. साथ ही वो टोटका भी जो उल्टा पड़ गया था.


पोंटिंग उस दिन कुछ अलग ही खेल रहे थे. वो क्रिकेट नहीं था. वो क्रिकेट हो ही नहीं सकता.


359. ये थी ऑस्ट्रेलिया के रनों की गिनती. मैच में कुल गेंदें फेंकी जानी थीं 300. मतलब गेंदों से ज़्यादा रन. ये टी-20 ही तो था. एक इनिंग्स में ढाई टी-20 इनिंग्स. पाकिस्तान के खिलाफ़ 274 चेज़ करना एक उपलब्धि मानी जा रही थी. यहां तो उस पर भी 85 रन एक्स्ट्रा थे.

मैं बचपन से ही काफ़ी पॉज़िटिव था. लिहाज़ा जानता था इंडिया ही जीतेगा. पूरा विश्वास था. हमारी टीम में सचिन था. साथ ही सहवाग.

इंडिया की बैटिंग शुरू होते वक़्त मुझे किसी काम के लिए कहीं भेज दिया गया था. वापस आया तो 9 गेंदें फेंकी जा चुकी थीं. कमरे में सिवाय टीवी की आवाज़ के कोई आवाज़ नहीं थी. कोई एक दूसरे को नहीं देख रहा था. सब टीवी में ही घुसे हुए थे. सचिन आउट हो चुका था. इनिंग्स की पांचवीं गेंद पे. इंडिया तीन तिहाई मैच हार चुका था. एक तिहाई अभी भी क्रीज़ पे था. सहवाग.

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मैंने सचिन को आउट होते नहीं देखा. देखा, लेकिन बाद में. टीवी पर रीप्ले में और बाद में यूट्यूब पर. अक्सर देखता हूं. और सोचता हूं कि कैसे वो शॉट मारा होता तो वो कैच न हुए होते. हर ऑस्ट्रलियन प्लेयर का चेहरा बताता था कि उन्हें विकेट नहीं वर्ल्ड कप मिला था. हर्षा की कही बात पर ऑस्ट्रेलियन प्लेयर्स की खुशी ने मोहर लगा दी थी. सच, वर्ल्ड कप और ऑस्ट्रेलिया के बीच सचिन ही खड़े थे. और वो जा चुके थे. ऑन साइड में एक बाउंड्री मारी थी. मैक्ग्रा को. उसी की अगली गेंद पर गेंद हवा में टंग गयी. मैक्ग्रा ने खुद कैच लिया. 673 रन बनाने वाली मशीन के तार अब काट दिए जा चुके थे.

गांगुली ने हर एक कोशिश की क्रीज़ पर टिके रहने की. 9 ओवर रहे भी. लेकिन ब्रेट ली की स्पीड उनके लिए काफ़ी थी. 24 रन पर डैरेन लेहमेन ने उन्हें कैच किया. लेहमेन आगे चलके ऑस्ट्रेलिया के कोच बने. तीन गेंद बाद ही यूपी का झंडा बुलंद करते हुए मुहम्मद कैफ़ बिना खाता खोले वापस आते दिखे. सालों बाद इंजीनियरिंग के दिनों में कॉलेज में ये मैच डिस्कस करते हुए एक दोस्त ने बताया कि उसके यहां सारे लड़के इकठ्ठा होकर मैच देख रहे थे. उसमें जब कैफ बिना रहा बनाये आउट हो गया तो किसी ने चप्पल उठा कर टीवी पर दे मारी. और फिर बाकी के मैच में जब भी विकेट गिरे, कहीं न कहीं से, कोई न कोई चप्पल आकर उस टीवी से गले ज़रूर मिलती थी.

Aussies celebrating another fall.
Aussies celebrating another fall.

इसके बाद हर कोई बस खड़े रहने की कोशिश करता रहा लेकिन कुछ ख़ास फ़ल नहीं मिल रहा था.


सहवाग हालांकि लगे हुए थे लेकिन हमने अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता वाली कहावत पहले ही सुन रक्खी थी.


17 ओवर में 103 रन पर 3 विकेट का स्कोर था और बारिश शुरू हो गयी. ये 103 भी इसलिए बने थे क्यूंकि पार्ट टाइम स्पिनर्स को जल्दी लगा दिया गया था और सहवाग ने लेहमेन और ब्रैड हॉग को सूतना शुरू किया. हॉग हालांकि स्पिनर के तौर पे ही खेल रहे थे. लेकिन सहवाग कब भला स्पिनर्स को इज्ज़त देने वाले थे? बारिश से कहानी में नया मोड़ आ गया था. अचानक हर हिन्दुस्तानी ये मना रहा था कि जोहान्सबर्ग में वो बारिश रुके ही न. अगले दिन का रिज़र्व डे रक्खा गया था.

बारिश रुकते ही पोंटिंग ने वो नहीं किया जो उन्होंने कुछ देर पहले किया था. वो अपने मेन बॉलर्स के पास पहुंचे. और उन्हें इसका फ़ल मिला. सहवाग एक तरफ सबको झाड़ रहे थे लेकिन दूसरे बैट्समेन स्पीड के सामने झुकते जा रहे थे. जीतने के लिए ज़रूरी रन रेट बढ़ता ही जा रहा था. द्रविड़ ने कुछ कोशिश ज़रूर की. वो टिके रहने के मूड से आये थे. सहवाग को लय में देख वो सिंगल-सिंगल का गेम खेलने लगे. लेकिन पहले से ही 6 के ओवर के रन रेट का प्रेशर सहवाग को खाए जा रहे था. उनके दिमाग में डकवर्थ लुईस भी चल ही रहा था.

81 गेंद में 82 रन बनाने के बाद 24वें ओवर में ऐंडी बिचेल को ड्राइव करके सहवाग सिंगल लेना चाह रहे थे कि लेहमेन उन्हें रन आउट कर दिया. कहीं किसी कोने में फिर एक चप्पल आकर लगी टीवी को लगी. हर कोई समझ गया था कि आज ट्रॉफी कौन उठाएगा. द्रविड़ के 47 और युवराज के मुट्ठी भर रनों ने बस ऑस्ट्रेलिया की जीत को जितना हो सकता था टाले रक्खा. ज़हीर को कैच करवाते ही एक आखिरी बार चप्पल ने टीवी की चुम्मी ली.

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अफ्रीका से लेकर सीतापुर के एक छोटे से गांव में बैट्री से चलती ब्लैक एंड व्हाइट टीवी में चमकते चेहरे असल में लटके हुए थे. पिछले कई सालों में टीम इंडिया पहली बार इतने बड़े किसी टूर्नामेंट को जीतने की कगार पर थी और उसे खाली हाथ लौटना पड़ रहा था. मन सचमुच उदास था. पोंटिंग की वो ज़हर से बुझी मुस्कान को याद कर आज भी सवा सौ ग्राम खून जल उठता है.

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सौरव का पहले बॉलिंग का फ़ैसला आज भी सालता है. वो शायद पहली बार था जब पूरे देश को लगने लगा था कि हम बहुत कुछ कर सकते हैं. और ऐन मौके पर ही हम हार गए थे. ऐसा कभी कभी आत्मघाती भी सिद्ध हो सकता है. जॉन राइट के फॉर्म में हमें एक बेहतरीन गुरु ज़रूर मिल गया था. साथ ही गांगुली की कप्तानी भी काफी मैच्योर हो जाने वाली थी. पहले बॉलिंग करने के इस एक ग़लत डिसीज़न से वो काफ़ी कुछ सीखते हैं. द्रविड़ के फॉर्म में हमें एक अच्छा कीपर भी मिल जाता है. इन सबके बावजूद अगले दिन की खबर शुरू होती है – “It all started with a no ball.”

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रिकी पोंटिंग उस मैच का केसू फिरंगी था. सचिन तेंदुलकर लंगड़ा त्यागी. 2003 में केसू फिरंगी ने लंगड़ा भइय्या के मुंह से मालपुआ भकोस के खा लिया था.


लेकिन 2011 में रज्जो तिवारी वानखेड़े में घूम-घूम के दौड़-दौड़ के चिल्लाता है – “बाहुबली, बाहुबली, लंगड़ा त्यागी बाहुबली…!!!”

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ये आर्टिकल मूलत: 2016 में लिखा गया था.

 

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