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रेलवे की ताकत को गांधी से ज्यादा आजतक कोई नहीं समझ पाया

22 जुलाई 1853 के दिन कार्ल मार्क्स का एक आर्टिकल न्यूयॉर्क डेली ट्रिब्यून में छपा. जिसमें वो तब हाल ही में बने भारतीय रेलवे की तरफ़ इशारा कर रहे थे. लिखा था, ‘आप इतने बड़े देश में तब तक रेलवे पूरी तरह से स्थापित नहीं कर सकते जब तक आप इसके लिए उपयोगी सारी ज़रूरी उद्योग न शुरू कर लें.

कार्ल मार्क्स की भविष्यवाणी ये थी कि भारतीय रेलवे उन उद्योगों में भी क्रांति लाएगी जो सीधे रेलवे से जुड़े हुए नहीं हैं. इसके बाद इतने दशकों से हमने लोहा और स्टील, चाय, समाचार पत्र, साहित्य, और कई दूसरी चीज़ों के उद्योगों को बढ़ते हुए देखा है.

भारत में रेलवे की शुरुआत में यूरोपीय और भारतीय यात्रियों में काफी अंतर किया जाता था. लेकिन इसमें समय के साथ खासे बदलाव आए.

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19वीं शताब्दी में भारतीय रेलवे में लोहा, चाय, लकड़ी, युद्ध गोलाबारी, अफ़ीम, इंडिगो, कपास और जूट जैसे सामानों की तस्करी हुआ करती थी. अपनी किताब भारत-एक खोज में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, ‘भारत में हर यूरोपीय, चाहे वो जर्मन हो या रोमानियन, अपने आप को शासकवंश का समझता है. ऐसा लगता है कि रेलगाड़ी, स्टेशन रिटायरिंग-रूम, पार्क में बेंच वगैरह, केवल यूरोपियों के लिए ही बने हैं.’

महात्मा गांधी के लिए साउथ अफ्रीका में रंगभेद झेलना (जिसमें उन्हें प्रथम श्रेणी के डिब्बे से बाहर निकाल दिया था) एक बात थी और वहीं ये सब भारत में भी देखना दूसरी. महात्मा गांधी ने अपनी धोती की तरह ही तीसरे वर्ग के डिब्बे को राजनीतिक हथियार बनाया. उन्होंने भारतीय रेलवे प्लेटफ़ॉर्म्स को राष्ट्रवाद के थिएटर में बदल दिया. जहां वो भाषण देते, मीटिंग करते और भारतीयों से चंदा भी इकट्ठा करते.

महात्मा गांधी खुलकर चंदा मांगते थे, उनका कहना था, ‘जो भी स्टेशन पर आते हैं, उन्हें अपने साथ पैसे लेकर ही आने हैं. अगर ये जून 20, 1921 तक 1 करोड़ रुपये तक नहीं पहुंचा तो हमें बदनाम किया जाएगा. ऐसे में हमें किसी भी हाल में इस साल स्वराज हासिल नहीं होगा.’

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ये बहुत चर्चित किस्सा है, आशुतोष मुखर्जी कलकत्ता हाइकोर्ट के पहले भारतीय चीफ़ जस्टिस थे. एक बार उन्होंने ट्रेन में पहली श्रेणी की टिकट ली, उनके ऊपर वाली सीट एक ब्रिटिशर की थी. जो किसी भारतीय के साथ कम्पार्टमेंट शेयर करना नहीं चाहता था. जब मुखर्जी सो रहे थे तब उसने मौका देखकर उनकी चप्पलें चलती ट्रेन से बाहर फेंक दी.

जब मुखर्जी जगे और उन्हें एहसास हुआ कि हुआ क्या है, तब उन्होंने उस आदमी की जैकेट हवा में फेंक दी. जब अगले दिन वो जगा तो उससे मुखर्जी ने कहा, ‘तुम्हारा जैकट मेरी चप्पलें ढूंढने गया है.’

वापस 19वीं शताब्दी की बात करें, तब भारत के लोग ब्रिटिश भारतीय रेलवे को किसी विदेशी देवता की तरह देखते थे. यहां तक कि गांव वाले और उनके बच्चे डर के मारे इसके सामने सिर झुकाते, ठीक वैसे ही जैसे वो अपने भगवान और धर्म से डरकर करते हैं. लेकिन कुछ दस्तावेज़ों से ये साबित होता है कि 1920 के करीब भारतीयों ने अंग्रेज़ी भाषा और ब्रिटिश भारतीय रेलवे का इस्तेमाल अपने फ़ायदे के लिए किया.

 

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इनमें से एक दस्तावेज़ ओखिल चंद्र सेन का था. उन्होंने 1909 में साहिबगंज के डिवीज़नल रेलवे कार्यालय को एक पत्र लिखा. कहते हैं इस पत्र के कारण ही भारतीय रेल की दूसरी और तीसरी श्रेणी, जिसमें भारतीय ट्रैवल करते थे, उसमें शौचालय बने.

1909 का गांधीजी का हिंद स्वराज, रेलवे और भारत में कई अन्य ब्रिटिश संस्थानों के, कठोर आलोचक के रूप में कार्य करता था. लगभग उसी समय ईस्ट इंडिया रेलवे के क्षेत्रों में कई बम विस्फोट भी हुए.

1916 में गांधीजी चंपारण के लिए रवाना हुए. 1920 तक उन्होंने तीसरी श्रेणी में सफ़र करके देश घूमा . 1930 के दशक में ‘महात्मा गांधी की जय’ राष्ट्रवादियों के लिए नारा बन गया, जो चेन खींचने और दूसरे खतरनाक कामों को अंजाम देते.

मार्क्स को यकीन था कि जैसे ‘भूवैज्ञानिक क्रांति’ ने धरती की सतह को रूप देने का काम किया, वैसे ही सामाजिक क्रांति भी उद्योग और उत्पादन को, उनके बनाने वालों के हाथों में वापस लौटाएगी.

महात्मा गांधी ने भारतीय रेलवे को आज का रूप दिया. लेकिन इसमें मुखर्जी और ओखिल बाबू जैसे लोगों का भी उतना ही हाथ था.

सर टी माधव राव का कहना था, ‘अगर भारत को एक राष्ट्र बनकर उभरना है तो ये बस रेवले और अंग्रेज़ी भाषा के माध्यम से हो सकता है.’ लेकिन मुखर्जी, ओखिल बाबू और गांधीजी ने ऐसा होने नहीं दिया. आज भारतीय रेलवे हमारी विभिन्न संस्कृति को जोड़ती एक कड़ी है.


ये आर्टिकल ‘DailyO’ के लिए अरूप चटर्जी ने लिखा है और इसे रुचिका ने ट्रांन्सलेट किया है.


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