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SHAME पर एक निबंध

संन्यासीलौट आया है. लेकिन इस बार फिल्मों की कमेंट्री नहीं, समाज का एक नंगा सच लेकर. ऐसी कहानी लेकर जिसे इस दौर में आप ‘शर्म पर एक निबंध’  कह सकते हैं. ‘हाऊ मच शेम इज टू मच शेम’. ये बतौर समाज हमारे सामूहिक शर्म की कहानी है. इसे पढ़कर हम इतना ही कर लें कि किसी तरह अपनी आंखों का पानी बचा लें. कि अगली बार ऐसी कोई घटना देखने में आए तो हम उस पर सोचे बिना उसे गुज़र न जाने दें.


मेहरानगढ़ फोर्ट, जोधपुर का. बेहद खूबसूरत! रॉयल. गज़ब स्थापत्य. हिंदुस्तान की गौरवमयी शान. यहां बड़ी संख्या में फॉरेनर आते हैं. ब्रिटेन के प्रिंस आते हैं. अन्य रॉयल फैमिलीज़ आती हैं. जो भी धनिक हों वो अपनों की शादियां करने यहां आते हैं. राठौड़ वंश के राव जोधा ने 1459 में इसे बनवाना शुरू किया था. लेकिन जिस पहाड़ पर इसे बनाना चाहते थे वहां एक साधु रहते थे. चिड़िया नाथ जी नाम था उनका. क्योंकि उनके साथ यहां शांत, बियाबान में अनेक चिड़ियां रहती थीं. जोधा ने फोर्ट बनाने के लिए उन्हें वहां से हटा दिया. जाते-जाते चिड़िया नाथ ने श्राप दिया – “पानी के लिए तरसोगे!” खैर, 12 मई को फोर्ट का निर्माण शुरू किया गया. तब ऐसे किलों की नींव एक बलि पर रखी जाती थी. उस दिन भी एक बलि दी गई. उनका नाम था श्री राजाराम मेघवाल.

Mehrangarh Fort

एक पत्थर किले में प्रवेश करते ही लगा है आज भी. उस पर लिखा है.

Mehrangarh Fort Stone

एक पत्थर या लोहे की तख्ती हो सकता है कुछ वक्त में त्रिमोही गांव के विद्यालय में प्रवेश करते हुए दिखे. उस पर लिखा होगा कुमारी डेल्टा मेघवाल.

क्यों?

क्योंकि हमारे समाज में इज्जतों, शर्मों और सभ्य होने के थोथे अहसासों के किले आज भी बलियों पर ही खड़े हो रहे हैं. डेल्टा दलित थी. ऊपर से फीमेल थी. वो 17 साल की थीं. अब नहीं हैं. 28 मार्च को वे नहीं रहीं. वे एक शिक्षक की बेटी थीं, शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में पढ़ रही थीं और उनके पीटी प्रशिक्षक पर उनके रेप और हत्या का आरोप है. डेल्टा के पिता ने 1 अप्रैल को उनकी अंत्येष्टि के दौरान कहा, “मैं एक शिक्षक हूं. फिर भी कहूंगा कि कोई पिता अपनी बेटी को 10वीं के बाद आगे पढ़ाई न करवाए!”

Delta being cremated

डेल्टा की कहानी असल में एक अपडेट है कि 2016 तक हम और हमारी सभ्यता कहां तक पहुंचे हैं? बच्चियों, युवतियों, स्त्रियों, वृद्धाओं की हमारे बीच क्या-क्या भूमिकाएं हैं? चाहे वे ऊंची जाति की हैं, चाहे नीची जाति की. कि हम पुरुष किस चरित्र के हैं. कि हम दंड के भागी हैं. कि हमें चेत जाना चाहिए.

महेंद्र राम राजस्थान में ऐसी जाति से ताल्लुक रखते हैं जो राजपूतों, ब्राह्रणों और व्यापारियों से नीचे की थी. सैकड़ों वर्षों से रेगिस्तान के इस समाज में मेघवाल होना अपमानजनक था. है भी. नीची नजर से देखा जाता. अस्पृश्य थे. पीढ़ियों के इस संघर्ष के बावजूद वे शिक्षक बने. पाकिस्तान की सीमा से सटे गांव त्रिमोही में वे रहते हैं. ये बाड़मेर जिले के गडरारोड के पास है. दो कमरों में अपना घर बसाया और चलाया. पत्नी और दो बच्चे. एक बेटा, एक बेटी. दोनों बच्चों में उन्होंने कोई भेद नहीं रखा. बेटी डेल्टा जब 7-8 साल की थीं, आदर्श विद्या मंदिर गडरारोड की 7वीं कक्षा में पढ़ रही थीं.

Delta's painting and her award reception
Delta’s painting and her award reception

एक प्रतियोगिता में उन्होंने एक ऊंट का चित्र बनाया था. इसे जिले में पहला स्थान हासिल हुआ. 26 जनवरी को प्रशस्ति पत्र से सम्मानित Letter to Delta by Vasundhara Rajeहुई. तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया ने 2006 में अपने सचिवालय की कला पुस्तक में इसे स्थान दिया. पुस्तक सीएम ने डेल्टा के यहां डाक से भिजवाई तो पूरे गांव में खुशी फैली. बधाईयां मिलीं. अखबार में खबर छपी. इसमें डेल्टा ने बताया था, मां लहरा देवी ने पढ़ाई के साथ चित्रकला के लिए प्रेरित किया. कहा, पांच वर्षों से चित्रकला कर रही हैं. 2014 में भी राजे ने उन्हें पत्र भेजा, “प्रिय डेल्टा तुम्हे जानकर खुशी होगी कि तुम्हारी पेंटिंग अब मेरे ऑफिस में लगाई गई है. जुटी रहो! प्यार और आशीर्वाद.”

वो 16 साल की हुई तो बेसिक स्कूलिंग ट्रेनिंग सर्टिफिकेट (‌BSTC) की पढ़ाई करने बीकानेर जिले में पड़ने वाले कुछ विकसित कस्बे नोखा आ गईं. बीकानेर से एक घंटे दूर. देशनोक से आधा घंटा दूर. वही देशनोक जहां करणी माता का जगप्रसिद्ध मंदिर है. इन्हीं के वरदान पर राव बीका ने 1488 में बीकानेर राज्य की नींव रखी जो पहले जांगलप्रदेश कहलाता था. बीका उक्त जोधा के बेटे थे जिन्होंने जोधपुर बसाया था. नोखा की कृषि मंडी देश की सबसे बड़ी मंडियों में रही है. आस-पास के सैकड़ों गांव इस जगह खरीदारी के लिए आते रहे. यहां लोग संतोषी प्रकार के हैं. वे ब्रैंड्स या पॉप कल्चर या कंज्यूमरिज्म में रुचि नहीं लेते हैं. हां, नोखा बस स्टैंड पर आपको विदेशी चिप्स, मिनरल वॉटर और कोल्ड ड्रिंक्स मिल जाएंगी. सारे मोबाइल ब्रैंड यहां हैं. जीवन जीने की हर वस्तु यहां हैं. सोच ग्रामीण परिवेश वाली, पुराने रीति-रिवाजों वाली है. अपराधों की संख्या सामान्य है. कोई बड़ी बीमारियां नहीं, कोई बड़े मसले नहीं. सिस्टम वही है. पुरुष नेतृत्व करेगा, औरत पीछे चलेगी. शर्म औरत का गहना है. लड़की शादी से पहले सेक्स कर ले तो मरी समान (डिपेंड करता है कि किसी को पता चले तब). बच्चों के ज्यादा सवाल पूछने और युवा माता-पिताओं के ज्यादा जवाब देने का चलन नहीं है. अच्छा नहीं माना जाता ज्यादा सवाल करना. फिर बच्चियां तो जागरूक होने का सोच भी नहीं सकतीं. धर्म का बोलबाला है.

डेल्टा के जाने के बाद अभी 31 मार्च को नोखा-बीकानेर में हमने शीतला माता की अष्टमी रखी थी. एक रात पहले ठंडा भोजन बनाकर रख लिया. सांगरी की सब्जी, बाजरी की रोटी, मूंग की दाल के बने लाल मिर्च के पंराठे, बाजरी के आटे-छाछ से बनने वाली पौष्टिक रबड़ी, पूड़ियां, दही, तले हुए नमकीन पापड़, गेंहू की बाट व गुड़ से बनी पारंपरिक लापसी और कई अन्य व्यंजन. तब डेल्टा एक प्रकरण हो चुकी थी. अफसोस शीतला माता सिर्फ चिकनपॉक्स, मिचली और ऐसी ही बीमारियों-महामारियों में हमारी रक्षा करती हैं. अगर स्त्री का पुरुषों और परंपराओं से भी बचाव करने का वरदान देने लगतीं तो डेल्टा भी ठंडा भोजन खा रही होतीं और अपनी पढ़ाई जारी रख पाती और एक दिन सिविल सर्वेंट बनतीं जो उनका सपना था.

तो डेल्टा ने 2013-14 में नोखा में रामसर रोड पर बने श्री जैन आदर्श कन्या शिक्षक प्रशिक्षण संस्थान में BSTC की पढ़ाई शुरू की. यहीं परिसर के जैन आदर्श खजांची गुरुकुल कन्या छात्रावास में रहने लगी. एक साल बाद वो द्वितीय वर्ष में पहुंचीं. एक लड़की होने और सपने लेने वाली लड़की होने के हमारे मर्दवादी समाज में क्या मायने होते हैं इनका सामना करती चल रही थी. बीते महीने मार्च में होली की छुटि्टयोंं पर वो घर गई थी. पिता महेंद्रा राम 28 मार्च, सोमवार को उन्हें संस्थान छोड़ने आए. सुबह 11 बजे. फिर लौट गए. बताया जाता है कि उस दिन ज्यादातर छात्राएं लौटी नहीं थीं. चार ही छात्राएं छात्रावास में मौजूद थीं. उसी दिन रात करीब 8 बजे डेल्टा ने घर फोन किया. पिता को बताया कि उसके साथ कुछ बुरा हुआ है, वो बहुत डरी हुई है और आकर उसे ले जाए. पिता के मुताबिक डेल्टा ने उन्हें फोन पर बताया, वार्डन प्रिया शुक्ला ने शाम को पीटीआई इंस्ट्रक्टर विजेंद्र के कमरे की सफाई करने के लिए भेजा. ये एक बहाना था. वहां विजेंद्र ने जबरदस्ती की, रेप किया. जान से मारने की धमकी दी. वो डरी हुई है.

Delta

पिता महेंद्रा राम बेटी को जब छोड़कर गए थे उसके ठीक 24 घंटे बाद, उसी प्रांगण में मंगलवार सुबह 11 बजे पानी की कुंडी में डेल्टा का निर्जीव शरीर मिला. बुधवार सुबह बीकानेर के दो प्रमुख अखबारों के शीर्षक थे ‘पानी की कुंडी में कूदकर छात्रा ने आत्महत्या की’ और ‘बीएसटीसी छात्रा की डूबने से मौत’. सूचना का संप्रेषण वार्डन प्रिया ने किया. उन्होंने पुलिस को बताया, सोमवार रात करीब 12.30 बजे हॉस्टल का मेन गेट खुला था. छानबीन के दौरान छात्रा गायब मिली. तलाशी ली तो वो परिसर में मिल गई. प्रधानाचार्य प्रज्ञाप्रतीक शुक्ल की मौजूदगी में छात्रा को समझा कर हॉस्टल की अन्य छात्राओं के साथ उसके कमरे पहुंचा दिया गया. मंगलवार सुबह करीब 5.45 बजे हॉस्टल की एक शिक्षिका लीला ने वार्डन प्रिया को बताया कि डेल्टा फिर गायब है. ढूंढ़ते-ढूंढ़ते, चिलचिलाती धूप आने के साथ 11 बजे उनका शव छात्रावास की कुंडी में तैरता मिला. महाविद्यालय प्रबंधन ने सूचना दी और पुलिस ने मुआयना किया.

अब इस अवधि में असल में क्या हुआ वो इतना सामान्य नहीं. पिछले साल प्रदर्शित फिल्म तलवार की तरह यहां सच के और संस्करण भी हैं. मंगलवार को शव मिलने के बाद से बुधवार तक मामला बहुत बढ़ गया. इस पर वार्डन ने एक नई बात सामने रखी कि छात्रा उस रात अपने कमरे में नहीं थी और बाद में पीटीआई के कमरे में मिलीं. और दोनों ने आपसी सहमति से संबंध बनाए. वार्डन ने कहा कि बाद में दोनों ने लिखित माफी मांगी. अगले दिन उनका शव कुंडी में मिला. डेल्टा के पिता महेंद्र राम जी ने कहा कि उनकी बेटी ने फोन पर बताया था कि उसके साथ रेप हुआ और उसे डर लग रहा है उसकी जान जा सकती है. उन्होंने संस्थान के लोगों पर डेल्टा को मारने और लाश कुंडी में फेंकने का आरोप लगाया.

शुरुआती रिपोर्ट में भी कहा गया कि डेल्टा के फेफड़ों में पानी नहीं था जिसका मतलब ये होता है कि मृत्यु डूबने से नहीं हुई है बल्कि मरने के बाद वे कुंडी में पहुंचीं. दोषी इसे आत्महत्या बताना चाह रहे हैं. परिजनों ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) करवाई. नाबालिग़ से रेप और हत्या के आरोप पीटीआई विजेंद्र, वार्डन प्रिया और संस्थान के मालिक ईश्वरचंद वैद पर है. परिजनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने ये भी आरोप लगाए कि पुलिस ने प्रक्रिया सही से नहीं की. कोई वीडियोग्राफी नहीं की गई. परिवार वालों को सूचना दिए बगैर बच्ची का शव अपने कब्जे में ले लिया. मृत पशुओं को ढोने वाले ट्रैक्टर से बच्ची के शव को मुर्दाघर ले जाया गया.

ये मामला राजस्थान विधानसभा में उठा. जयपुर से मानवाधिकार संगठन की टीम नोखा पहुंची और मामले की पड़ताल की. प्रथम दृष्टतया टीम ने परिस्थितियों को संदिग्ध बताया है. इस संगठन की सह-सचिव डॉ. कल्पना ने पुलिस, छात्रों के परिवार वालों, वार्डन प्रिया, पीटीआई और डेल्टा की सहेलियों से बात की. नोखा थाने में केस नंबर 146/2016 के रूप में इसे दर्ज किया गया. इस मामले को धारा 302, 376(ग), 201, 34 भा.द.स., 3(1)(12) अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम और धारा 5, 6 पोस्को एक्ट के अंतर्गत दर्ज किया गया है. पीटीआई को पुलिस ने बुधवार को ही गिरफ्तार कर लिया था. विरोध प्रदर्शनों के बाद प्रशासन ने सात दिनों में समुचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया. बाद में बीकानेर के सेशन कोर्ट में विजेंद्र को पेश कर पांच दिन की रिमांड ली गई.

महेंद्र राम जी और लहरा देवी के अब एक ही संतान रह गई है. प्री-मेडिकल ट्रेनिंग की परीक्षा की तैयारी कर रहा उनका बेटा. डेल्टा होती तो IPS बनती, IAS बनती. जैसे अर्जुन राम मेघवाल बने. बीकानेर से मौजूदा सांसद जिन्हें सर्वश्रेष्ठ सांसद का पुरस्कार भी मिल चुका है. वे भी बीकानेर शहर के करीबी गांव किसमीदेसर में बुनकरों के परिवार में जन्मे. तंगी के बीच पले-बढ़े. पढ़ाई का माहौल न था पर पढ़े. प्रतियोगी परीक्षाओं के जरिए प्रशासकीय सेवाओं में आए. प्रमोट होकर IAS बने. चुरु जिले के कलेक्टर बने. कुछ कुछ क्लीन छवि रही. मुश्किलों की तुलना नहीं हो सकती लेकिन उनके पास फिर भी एक लाभ था. वे पुरुष थे.


डेल्टा लड़की थी. यहीं से एक आधी हारी हुई बाज़ी विरासत में मिल जाती है.


चाहे उपभोगवादी संस्कृति हो या धर्मवादी संस्कृति दोनों जगह औरतें object हैं. पहली में ये आभास दिया जाता है कि उन्हें स्कर्ट पहनने देकर, जींस पहनने देकर, एक नियत तरीके से जॉब करने देकर, मॉल में शॉपिंग करवाकर, शराब पीने देकर, सिगरेट पीने देकर हम एक equal society के प्रतिनिधि हैं. लेकिन decision making यहां पुरुष ही करता है. प्रत्यक्ष नहीं तो पुरुष अपनी अप्रत्यक्ष चालों को टटोल लें. इस तरह के समाज का एक बड़ा हिस्सा सुंदरता के विशेष स्वरूप के गढ़ बैठा है. कैसे रंग, कैसी त्वचा, कैसी jawline, कैसे होठ, कैसी आंखें, कैसे मुलायम बाल, कैसे स्तन, कैसे नितंब, कैसे कपड़ों वाली स्त्रियां सुंदर हैं. उन पैमानों के बाहर वाली ‘not my types!’ उनसे प्यार नहीं होता. इस समाज में लड़की को सशक्त करने की प्रक्रिया में पुरुष बहकते हैं, उसे मजबूर करते हैं. हालांकि डेल्टा दूसरी प्रकार की संस्कृति की फीमेल थी लेकिन इस आखिरी पैमाने पर उनकी और अन्य अंग्रेजीदां लड़कियों के प्रति social perception और उनके इस्तेमाल में कोई फर्क नहीं.

धर्मवादी संस्कृति का अच्छा उदाहरण राजस्थान है. उपभोक्तावादी न होने की वजह से इस राज्य में कई सारे गुण हैं. कई प्रकार की व्यवस्थाएं हैं जो सफल हैं. मॉडल हो सकती हैं. लेकिन स्त्रियों की स्थिति विडंबना भरी है. यहां की शासक कौमें जो रही हैं उनके अभिवादन का शब्द जय माता री सा है. चाहे वो करणी माता हो, जमवाय माता हो, अंबे हो, भगवती हो और दुर्गा हो. पर 1987 में रूप कंवर (शेखावत) को सती कर दिया गया. वे 18 साल की थीं. शादी के कुछ महीनों बाद पति माल सिंह का देहांत हो गया तो चिता पर रूप कंवर को भी बैठा दिया गया. सीकर के देवराला में ये घटा. माना जाता है कि प्यार की पवित्रता, पति के प्रति वफादारी में इतना सत्व होता है कि अग्नि खुद प्रज्जवलित होती है. आज भी राज्य में पुरानी पीढ़ी सती रूप कंवर की पूजा करती है. अन्य सतियों के भी मंदिर बने हुए हैं. आज भी इस कौम की युवा पीढ़ी तय नहीं कर पाई है कि सती प्रथा अच्छी है कि बुरी? राजपूतों और अन्य ऊंची जातियों में भी बहुत से परिवार ऐसे हैं जो अपनी बच्चियों की शिक्षा पर जोर दे रहे हैं. उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं. लेकिन आधारभूत रूप से लड़की आज भी इज्जत है. मान है. जब भी किसी शत्रु या विरोधी की इज्जत या मान छीनना होता है तो मां और बहन की गाली दे दी जाती है. और लहू उबल जाता है.

जो आर्थिक रूप से कमजोर लोग हैं या दलित हैं. वे भी ऐसे समाज और व्यवस्था में रहते हैं कि स्त्री का पर्याय इज्जत से है. ज्यादातर माताएं चाहे किसी भी आर्थिक-जातीय पृष्ठभूमि से हो पूरी निगरानी रखती हैं कि शादी से पहले उनकी बेटियां किसी लड़के से बात तो नहीं कर रहीं, उनके साथ अकेले में वक्त तो नहीं बिता रही. कुल मिलाकर सेक्स तो नहीं कर रहीं. ये ऐसा है जैसे उन्होंने स्वत: ही या अपनी मां या सास से जिम्मेदारी विरासत में ले ली है कि बेटियों की रखवाली करनी है. शादी हो जाए उसके बाद वो जाने और उसका पति जाने. हमें समाज वाले कुछ न कह दें.

रेप एक अपराध है और उसे शेम यानी शर्म से जोड़ने में इस जकड़न वाली सोच और प्रगतिशीलता की कमी का बहुत बड़ा हाथ है. अगर ये शेम महिलाओं के प्रति होने वाले अपराधों से अलग की जा सके तो समाज में अभूतपूर्व बदलाव दिखेगा. आखिर ये शर्म है क्या? क्यों उसका ठेका सिर्फ लड़कियों ने ले रखा है? रेप के मामलों में 99 फीसदी नजरें लड़की की ओर होती हैं और बाकी आरोपी पर. लड़की की ओर इतनी नजरें यूं होती है कि अब ये बेचारी क्या करेगी इसकी तो इज्जत चली गई, ये तो बर्बाद हो गई? अरे भई वो बर्बाद कैसे हो गई? और ये इज्जत होती कहां है और जाती कहां है?

‘हमारा दिल आपके पास है’ साल 2000 में बीकानेर और नोखा में भी प्रदर्शित हुई थी. इसमें ऐश्वर्या राय के पात्र का रेप होता है. आम दर्शकों को कहानी में दिखाया जाता है कि आपको अनिल कपूर के पात्र अविनाश जैसा होना चाहिए जो रेप की घटना को किसी आम अपराध की तरह देखे और लड़की की इज्जत, आबरू, बर्बादी की बातें न करे. उसे बराबरी का दर्जा दे. लेकिन डेढ़ दशक बाद भी सोच वही है. सोच बदली नहीं है.


हमारे यहां घरों के लड़के रक्षाबंधन के दौरान राखी बंधवाते हैं और वॉट्सएप्प पर दर्जनों की संख्या में लड़कियों के बुरे चित्रण वाले सेक्स जोक्स पढ़ते हैं, फॉरवर्ड करते हैं. जोक्स वाली लड़कियां किसी की बहन नहीं होतीं?


ऐसे तिलक-चंदन लगाए पुरुषों की संख्या बहुत है जो एक सांवले रंग वाली नारीवादी को सोशल मीडिया पर गाली देते हुए नीग्रो का लिंग कहते हैं. उसका बर्बरता से रेप करने की बात करते हैं. न उन पुरुषों के दोस्त, न बुजुर्ग, न उनका धर्म ये सोच दुरुस्त करता है.

डेल्टा की वजह से ही हम इन सब चिंताजनक परिस्थितियों पर बात कर रहे हैं और बरास्ते डेल्टा ही उपाय सामने है. उपाय है घर से निकलना, आगे बढ़ना, शिक्षित होना और आर्थिक स्वावलंबन को पाना. पुरुष अगर सद् बुद्धि पाने में हजार बरस लेने वाले हैं तो वो उनकी दिक्कत है स्त्रियों की नहीं. लड़कियों-औरतों को वो सब करना होगा जो उनका मन चाहे. पूरी आजादी के साथ. बिना किसी गिल्ट के. वे ज्ञान का रास्ता लें. वो ही सबसे आगे ले जाएगा. शिक्षा की जितनी स्ट्रीम्स होती हैं उनके अलावा दुनिया की महानतम कृतियों को पढ़े, महान फिल्मों को देखें, जहां से निडरता मिल सके, उसे लें

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