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राष्ट्रपति नहीं रोबोट को पढ़नी चाहिए संसद में 14 पेज की स्पीच!

rahul mishraये आर्टिकल राहुल मिश्रा ने लिखा है. वरिष्ठ पत्रकार हैं. आजकल इंडिया टुडे ग्रुप से जुड़े हैं. आर्थिक मामलों पर उनकी समझ और टिप्पणी दिलचस्प होती हैं. इसका एक नजारा आपको यहां मिलेगा. जहां उनका प्रपोजल है. कि क्यों न राष्ट्रपति की जगह रोबोट स्पीच पढ़े.
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251 रुपये में फोन मिल रिया है. शहरों में फोकट के WiFi और मुल्क में डिजिटल इंडिया की गोटियां सेट हो गई हैं. सरकार सीधा पइसा पहुंचाने के लिए मोबाइल पेमेंट और डायरेक्ट कैश ट्रांसफर के लिए लगी पड़ी है. बजट भी आ ही गया है. प्रेसिडेंट भी मंगलवार को संसद पहुंचे. दोनों सत्रों की संयुक्त बैठक को प्रणब मुखर्जी ने संबोधित किया. खूब देर तक खड़े रहे. बोलते रहे. बुजुर्ग प्रेसिडेंट को घंटों खड़े देखकर लल्लन का दिल पसीज गया. इत्ती लंबी स्पीच.

सही भी है. आखिर मुल्क में शासन प्रेसिडेंट की मुहर और नाम से होता है. स्पीच भी खूब लंबी. 5500 शब्द और 14 पन्नों का सरकारी भाषण. कहते हैं ये स्पीच सत्ता पक्ष का सुनहरा लेखा-जोखा माना जाता है. इंटरनेट के आने से पहले और रेडियो और टेलीविजन के शुरुआती दौर में ये स्पीच पता नहीं कोई सुनता, देखता था या नहीं. पर आज को गुरु कोई क्या ही सुनता होगा. कुछ चैनल थोड़ी देर के लिए शक्ल दिखाकर, ब्रेकिंग चला देते हैं, फिर अगली खबर. कोई क्यों ही पढ़े, इंटरनेट पर सब है गुरु. एक क्लिक किया. खुल गई लंबी फाइल. सर्च करो कीवर्ड के साथ. सब हाजिर है. ये ससुरा इसी लंबी स्पीच पढ़ने के चक्कर में 2014 में अरुण जेटली हाफने लगे थे. ब्लड प्रेशर भी सनननन होने लगा था.

प्रेसिडेंट की स्पीच के आधार पर केंद्र सरकार अगले एक साल की फाइनेंशियली तैयारी का लेखा-जोखा तैयार करता है. सारे सांसद भी माननीय फीलिंग लिए बैठे रहते हैं. चुपचाप. बोलने के लिए मनाही जो है. बजट स्पीच को भी अंदर बैठे सांसदों से ज्यादा बाजार सुनता है. बड़े-छोटे कारोबारी से लेकर आम आदमी तक इस स्पीच को इसलिए सुनता है. कि अगले एक साल तक सरकार ने उनकी थाली में क्या नया डाला और क्या छीन लिया.

लेकिन अब बख्त आ गया है कि क्रांति हो. डिजिटल इंडिया वाली क्रांति. डिजिटली स्ट्रॉन्ग होने की जरूरत है. पूरी स्पीच किसी रोबोट को पढ़ने के लिए दे देनी चाहिए. जापान, अमेरिका या रूस वाले दोस्तों से कहके मोदी जी को एकदम जाबड़ रोबोट बनवा लेना चाहिए. जब बोले तो लगे रजनीकांत का चिट्ठी रोबोट बोल रहा है. नैना मिले, तोसे नैना मिले टाइप्स. हां तो ये रोबोट, संसद की कार्यवाही समझे. उधर की ट्रेनिंग से लैस हो. पर हां, चिल्लाता विल्लाता न हो. न शेम, शेम करता हो. इस काम के लिए तो अपने सांसद हैं ही.

रोबोट ऐसा हो कि सब समझता हो. न समझता हो तो ट्रेनिंग दी जाए.  ताकि वो सब समझे और समझाए, और पब्लिक इंटरेस्ट ले. और लिस्टिकल टाइप्स स्टोरी की तरह चुटती बजाते समझा दे. कि भैया भाषणबाजी नहीं, लो काम की बात सुनो. और बुजुर्गों को दो आराम. बड़े बुजुर्गों की दुआएं लगेगी तो लोकतंत्र फलेगा और फूलेगा.

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