21 महीनों यानी पौने दो सालों बाद उन्हें दोबारा टीम से खेलने के लिए बुलाया गया. इस बार उनका परफॉरमेंस बेहतर. पहली इनिंग्स में ज़ीरो लेकिन अगली इनिंग्स में 1 रन. फिर से उन्हें टीम से निकाल दिया गया. अटापट्टू एक बार फिर से नेट्स में. पसीना बहाते हुए. फर्स्ट क्लास में रन बनाते हुए. ताबड़तोड़. लेकिन वो सभी रन टेस्ट मैचों में इनकी असफ़लता को भुलाने के लिए नाकाफ़ी थे. सत्रह महीनों बाद उन्हें फिर से बुलाया गया. उनके फर्स्ट क्लास में बनाये स्कोर की बदौलत. दोनों इनिंग्स में फिर से बैटिंग मिली. और एक बार फिर दोनों इनिंग्स में स्कोर ज़ीरो. अटापट्टू का कैरियर ख़त्म मन जा रहा था. दुनिया के सबसे बड़े लेवल पर वो बारम्बार फ़ेल हो रहे थे. जबकि फर्स्ट क्लास मैचों में उन्होंने धान बोया हुआ था. कहा जा रहा था कि उनमें वो बात नहीं है जो बड़े लेवल पर उन्हें स्टार प्लेयर बना सके. लेकिन अटापट्टू खिलाड़ी थे. उन्हें ये मालूम था कि बुरा वक़्त सिर्फ कुछ वक़्त को ही रहता है. अच्छे वक़्त को झख मारके आना ही पड़ता है. शर्त बस ये है कि अप अपने काम को बाकायदे निपटाते रहें. अटापट्टू ने वही किया. फिर से नेट्स में. पसीना बहाते हुए. देह को आराम न देने की कसम उठाते हुए.
तीन साल बाद उन्हें फिर से टीम में वापस बुलाया गया. इस बार रन बने. और क्या रन बने भाईसाब! वहां से शुरू हुई अटापट्टू की अटापट्टू बनने की कहानी. वो कहानी जिसकी वजह से हम और आप यहां इकट्ठे हो उनके बारे में बात कर रहे हैं. 5000 के ऊपर टेस्ट रन. 6 बार डबल सेंचुरी. वन-डे में साढ़े आठ हज़ार रन. अपने देश की टीम के कप्तान. और रिटायर होने के बाद श्री लंका के कोच. 6 साल में अपने कैरियर का दूसरा रन बनाने वाले अटापट्टू "Don't give up" की नसीहत को सचमुच चरितार्थ करते हैं. ये भी पढ़ें:
श्री लंका ने समय बर्बाद करने की कोशिश की लेकिन मोहम्मद शमी जाकर भिड़ गए














.webp?width=275)

.webp?width=275)



.webp?width=120)
