इन्हें ज्यादा लोग जानते नहीं हैं. या यूं कहिए, कि ये चाहते नहीं कि इन्हें ज्यादा लोग जानें. पढ़िए उस मनमोहन की कविता जो न अवॉर्ड लेते न लौटाते हैं, न फेसबुक पर लिखते हैं, न किसी लिटरेचर फेस्टिवल में जाते हैं.
उसकी पीठ
उसकी पीठ जब जाने के लिए मुड़ती है तो उसी क्षण एक सूनी, अकेली और निष्ठुर जगह बनाती है जो अनिवार्य है
जाते हुए उसकी पीठ को देखना ठीक ठीक सबसे ज्यादा अपने साथ होना है
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उसकी थकान
यह उस स्त्री की थकान थी कि वह हंस कर रह जाती थी
जबकि वे समझते थे कि अंततः उसने उन्हें क्षमा कर दिया है
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मनमोहन अपनी किचन में कॉफ़ी बनाते हुए. फोटो सोर्स: प्रशांत चक्रवर्ती
कोई आए
कोई आए और देखे
संभालकर रखे गए ये गिरे हुए पंख ये चले हुए तीर
दीवार पर जीभ निकाले ये नीले काले मुखौटे और पास में चिपकी ये जंग खाई गली हुई तेल से चुपड़ी ढाल ये प्राचीन तलवार
छत पर रेंगती हैं मकड़ियां फर्श पर कनखजूरे दीवार से फूट पड़ता है पीपल
कोई आए कोई दीया जलाए और देखे हमारे महाराणा प्रताप की मूंछ और मजनू के चार आंसू गिलास में सूखते हुए
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