सुबह का शायर
अनुराग पांडेय - चाहतों में रातें जगता जाने किसकी राहें तकता गिन सके वो सारे गिनता उंगलियों पर तारे गिनता उंगलियां पिघली हैं उसकी हाथ उसका जल गया है सुबह का शायर सयाना शाम होते ढल गया है फिजाओं में गूंजता था शोर सा देता सुनाई छोड़कर फिर थामता था एक अदा से वो कलाई पांव संभले थे मगर फिर संभल कर वो गिर गया है सुबह का शायर सयाना शाम होते ढल गया है सुबह की शाखों पर सजती धूप सा शबनम चुराता चाहतों की बारिशों में भीगता मुझको भिगाता चाहत थी जिस पल की शायद पल वो उसको छल गया है सुबह का शायर सयाना शाम होते ढल गया हैइस सीरीज की और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने 'एक कविता रोज' टैग पर क्लिक करिए.
















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