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एक कविता रोज: वो जो शायर था चुप-सा रहता था

'बहकी-बहकी सी बातें करता था'

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फोटो - thelallantop
जुलाहे से बिना गिरहों वाला ताना बुनने का सलीक़ा सीखने की तमन्ना रखने वाला ये आदमी जाने कैसे इतने सलीके से शब्द बुन लेता है. जो ज़हन में ऐसे उतरते हैं जैसे एक अच्छी शराब गले से उतर रही हो. और दे रही हो हल्का हल्का नशा. एक कविता रोज में आज पढ़िए गुलजार की कविता 'वो शायर था चुप सा रहता था'. और सुनिए इसे कुलदीप सरदार की आवाज में. 
 

जो शायर था चुप-सा रहता था

https://www.youtube.com/watch?v=zXAX8nYob24&feature=youtu.be

जो शायर था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी सी बातें करता था आंखें कानों पे रख के सुनता था गूंगी खामोशियों की आवाज़ें!

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जमा करता था चांद के साए और गीली-सी नूर की बूंदें रूखे-रूखे से रात के पत्ते ओक में भर के खरखराता था

वक़्त के इस घनेरे जंगल में कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था हां वही, वो अजीब- सा शायर रात को उठ के कोहनियों के बल चांद की ठोड़ी चूमा करता था

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चांद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है

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