जो शायर था चुप-सा रहता था
https://www.youtube.com/watch?v=zXAX8nYob24&feature=youtu.beजो शायर था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी सी बातें करता था आंखें कानों पे रख के सुनता था गूंगी खामोशियों की आवाज़ें!

जो शायर था चुप-सा रहता था बहकी-बहकी सी बातें करता था आंखें कानों पे रख के सुनता था गूंगी खामोशियों की आवाज़ें!

जमा करता था चांद के साए और गीली-सी नूर की बूंदें रूखे-रूखे से रात के पत्ते ओक में भर के खरखराता था
वक़्त के इस घनेरे जंगल में कच्चे-पक्के से लम्हे चुनता था हां वही, वो अजीब- सा शायर रात को उठ के कोहनियों के बल चांद की ठोड़ी चूमा करता था
चांद से गिर के मर गया है वो लोग कहते हैं ख़ुदकुशी की है
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