दुनिया में हूं दुनिया का तलबगार नहीं हूं बाज़ार से गुज़रा हूं, ख़रीददार नहीं हूं
बाज़ार से गुज़रा हूं, ख़रीददार नहीं हूं
एक कविता रोज़ में आज पढ़िए अकबर इलाहाबादी को
Advertisement

फोटो - thelallantop
170 साल पहले, इलाहबाद के पास बारा में सैयद तफ्फज़ुल हुसैन के यहां एक लड़का हुआ, नाम रखा गया. सैयद अकबर हुसैन, लेकिन हमने जो जाना था वो अकबर इलाहाबादी था. आज उन्हीं का लिखा पढ़िए
Add Lallantop as a Trusted Source

Advertisement
ज़िन्दा हूं मगर ज़ीस्त की लज़्ज़त नहीं बाक़ी हर चंद कि हूं होश में, होशियार नहीं हूं
इस ख़ाना-ए-हस्त से गुज़र जाऊंगा बेलौस साया हूं फ़क़्त, नक़्श बेदीवार नहीं हूं
Advertisement
अफ़सुर्दा हूं इबारत से, दवा की नहीं हाजित गम़ का मुझे ये जो’फ़ है, बीमार नहीं हूं
वो गुल हूं ख़िज़ां ने जिसे बरबाद किया है उलझूं किसी दामन से मैं वो ख़ार नहीं हूं
यारब मुझे महफ़ूज रख उस बुत के सितम से मैं उस की इनायत का तलबगार नहीं हूं
Advertisement
अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़ की कुछ हद नहीं “अकबर” क़ाफ़िर के मुक़ाबिल में भी दींदार नहीं हूं
किसके माने क्या? तलबगार- इच्छुक, ज़ीस्त- जीवन, ख़ाना-ए-हस्त- अस्तित्व का घर, अफ़सुर्दा- निराश, हाजित-आवश्यकता, जो’फ़- कमजोरी, ख़ार- कांटा, अफ़सुर्दगी-ओ-जौफ़- निराशा और क्षीणता, दींदार-आस्तिक














.webp?width=275)


.webp?width=120)
.webp?width=120)



