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एक कविता रोज: चीते को जुकाम होने से

आज पढ़िए चंद्रकांत देवताले की ये कविता.

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फोटो - thelallantop
'मां पर नहीं लिख सकता कविता' कहते हुए ये आदमी दुनिया भर में मां पर लिखी गईं कविताओं में से सबसे सुंदर कविता लिख गया. आज हम इनकी एक और कविता 'चीते को जुकाम होने से' पढ़ा रहे हैं.

चीते को जुकाम होने से

- बच्ची पूछती है पापा चीते को जुकाम हो जाएगा तो वह कहां जाएगा क्या मांगेगा किससे क्या ऐसा हो सकता है पापा? मैं कहता कुछ नहीं हूं सोचता हूं इस्पात के बीहड़ सपनों को देखते देखते कितनी थक गईं हैं आंखें ईंट के भत्तों के पास बैठे बैठे तप गए हैं कितने दिन अब बच्ची कि सोच में यह जो जुकाम से पीड़ित है चीता सचमुच होगा दयनीय बेहद शायद अधिक खाने से हुआ हो ऐसा. वह अब पूछती है क्या चीता खांसता-छींकता है? मैं कहता हूं- हां-मैदान कांपते हैं खोह झन्ना जाती है वन संकट में पड़ा हुआ शायद दावाग्नि की चपेट में आ जाए सब कुछ. वह हंसती है पूछते हुए क्या चीता माफ़ी नहीं मांग सकता? उसके उपाय से चकित हो उठता हूं मैं हां यही ठीक है तो काठ कि चिड़ियाओं मिट्टी के वन्य पशुओं देखो आज खुद चीता माफ़ी मांगता है बच्ची हंसती है मजे में उड़ती चिड़िया जैसी कहती है जाओ माफ़ किया चीते को अब जुकाम ठीक हुआ उसका मैं उसकी ख़ुशी से स्तब्ध सोचता हूं अब इसे कैसे समझाऊं कि गद्दी नशीन होते ही भयावह ढंग से हिंसक हो जाते हैं जब गिड़गिड़ाते हुए मेमने तो यह तो चीता है कितना भूखा हो जाएग जुकाम ठीक हो जाने के बाद ***

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