मैं तुमसे बेहद प्यार करता हूं तुम मेरी मां हो मेरी जमीन हो तुम तुम मेरी बहन भी तो हो जिसके राखी के छुअन से मजबूत हो गया है हाथ दुनिया का बोझ उठाने के वास्ते तुम दोस्त थी जब मुझे जरुरत थी सहारे की मेरी प्रेमिका भी थी तुम कभी अकेलेपन और निराशा के क्षण में तुम पत्नी भी हो जीवन के सुनसान अनजान सड़क पर लेकिन आज मैं स्वीकार करता हूं सदी का सत्य तमाम भूमिका से दूर एक स्त्री हो तुम स्वतंत्र स्वच्छंद मुक्त एक दूब एक ओस की बूंद एक सांस जीवन के वास्तेअगर आप भी कविता/कहानी लिखते हैं, और चाहते हैं हम उसे छापें, तो अपनी कविता/कहानी टाइप करिए, और फटाफट भेज दीजिए lallantopmail@gmail.com पर. हमें पसंद आई, तो छापेंगे. और हां, और कविताएं पढ़ने के लिए नीचे बने ‘एक कविता रोज़’ टैग पर क्लिक करिए.
एक कविता रोज: स्त्री हो तुम'
आज पढ़िए पियूष रंजन परमार की कविता.
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फोटो - thelallantop
पीयूष बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में ग्रेजुएशन के बाद इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन से हिंदी पत्रकारिता में पी.जी. डिप्लोमा किया है. ब्लॉग लिखते हैं. नाम है विहंग दृष्टी. राजनीति, सिनेमा से लेकर कला तक सब पर बड़े अधिकार से कलम चलाते हैं. आजकल सोनी टीवी के साथ काम कर रहे हैं.
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