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एक कविता रोज: 'नवाब हो के भी हम लखनऊ से दूर रहे'

आज पढ़िए हाशिम रज़ा जलालपुरी की एक गजल.

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फोटो - thelallantop
हाशिम रज़ा जलालपुरी, जलालपुर से आते हैं. यानी फैजाबाद के पास से. बीटेक और एमटेक करने के बाद ये अब उर्दू में एमए कर रहे हैं. उर्दू मंच का बड़ा नामी चहरा हैं ये. एक पाकिस्तानी एल्बम को अपने बोल दे चुके हैं. और इनकी किताब जल्द ही आने वाली है. पढ़िए इनकी एक गजल. 
 

तेरे ख्याल तेरे आरज़ू से दूर रहे नवाब हो के भी हम लखनऊ से दूर रहे

बदन के ज़ख़्म तो चारागरों ने सी डाले मगर ये रूह के छाले रफ़ू से दूर रहे

ज़मीं पे टपका तो ये इंकेलाब लाएगा उसे बता दो वो मेरे लहू से दूर रहे

किया है हमने तयम्मुम भी ख़ाके मक़्तल पर नमाज़े इश्क़ पढ़ी और वज़ू से दूर रहे

मेरी ज़बान का चर्चा था आसमानों पर ज़मीन वाले मेरी गुफ़्तुगू से दूर रहे

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