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महिला मुद्दों के नाम के पटाखे फोड़ने वाली पार्टियां टिकट देते टाइम फुस्स क्यों हो जाती हैं?

पंजाब चुनाव में कहां हैं महिलाएं?

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यूपी में भाजपा और कॉन्ग्रेस महिलाओँ से जुड़ी ख़ूब रैलियां कर रहे (तस्वीर - PTI)
पंजाब चुनाव. पांच राज्यों के चुनाव में मीडिया और राजनीतिक समीक्षकों का 'सेकंड फेवरेट' राज्य. फ़र्स्ट फेवरेट तो आपको पता है. पंजाब में भी मामला फंसा हुआ है. 14 फरवरी को सिंगल-फेज़ में मतदान होना है. सब अपने हिस्से के कयास लगा रहे हैं. कोई आश्वस्त है कि कांग्रेस दोबारा आ रही, तो कोई कैप्टन अमरिंदर और भाजपा के गठबंधन पर विश्वास दिखा रहा है. चौतरफ़ा कॉन्टेस्ट है. सभी पार्टियों ने 117 सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं.
उम्मीदवार घोषित हुए, तो हमारी नज़र सभी पार्टियों की लिस्ट पर पड़ी. लिस्ट में कुछ कम लगा. लगा कुछ है जो आंखों के सामने से ग़ायब कर दिया गया है. एलिफैंट इन द रूम. महिला प्रतिनिधित्व. चुनावी वादों में महिलाएं हैं 2017 के विधानसभा चुनाव में महिलाओं का वोटिंग परसेंटेज पुरुषों से ज़्यादा था. एलिजिबल वोटर्स में से 79% महिलाओं ने वोट किया था और 78% पुरुष. वोटिंग में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना एक अच्छा संकेत है, लेकिन पॉलिटिकल पार्टियों की रीडिंग अलग होती है. उनके लिए औरतें बस एक वोट बैंक हैं. इसलिए पार्टियां 'विमेन वोट बैंक' को लुभाने के लिए चुनावी वादे करती है. ख़ूब सारे. ये फ़्री, वो फ़्री. हम आपको पार्टी दर पार्टी बताते हैं कि महिलाओं के लिए क्या वादे किए गए हैं. साथ में यह भी बताएंगे कि किस पार्टी ने कितनी महिलाओं को टिकट दिया. # शिरोमणि अकाली दल-बसपा‌ - शिरोमणि अकाली दल (SAD) और बहुजन समाज पार्टी (BSP) के अलायंस ने 117 उम्मीदवारों में केवल 5 महिलाओं को टिकट दिया है. यानी 4%. पांच में से चार अकाली दल से हैं. 97 सीटों पर चुनाव लड़ रहे SAD ने केवल चार सीटों पर महिलाओं को उतारा है, वहीं 20 सीटों पर लड़ रही BSP ने केवल एक टिकट महिला को दिया है.
अकाली दल का ज़िक्र सबसे पहले इसलिए कि अकाली दल के प्रमुख सुखबीर सिंह बादल पहले नेता थे जिन्होंने पंजाब में महिलाओं को ₹2000 प्रति महीना देने का वादा किया था. साथ ही वादा किया कि अगर वे सत्ता में आते हैं, तो BPL परिवारों को 'ब्लू राशन कार्ड' मिलेगा.
सुखबीर सिंह बादल
गठबंधन की घोषणा करते हुए सुखबीर सिंह बादल ने इसे 'पंजाब की राजनीति में एक नया दिन' बताया था.

अकाली दल की प्रवक्ता दलजीत सिंह चीमा ने एक इंटरव्यू में महिलाओं को टिकट न देने का एक विचित्र और 'इम्प्रैक्टिकल' कारण बताया था,
"पार्टी हमेशा महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने के प्रयास करती है, लेकिन यहां कुछ प्रैक्टिकल दिक्कतें हैं. विधानसभाएं बड़ी होती हैं और कभी-कभी तो पुरुषों के लिए भी ट्रैवल करना और कैंपेन करना मुश्किल हो जाता है."
आगे बढ़ते हैं. # कांग्रेस - उत्तर प्रदेश की 'लड़की हूं, लड़ सकती हूं' वाली कांग्रेस को पंजाब की महिलाओं में शायद 'लड़ सकने' वाला जुनून नहीं दिखता. तभी तो पंजाब में 109 सीटों पर चुनाव लड़ रही कांग्रेस ने केवल 11 सीटों पर महिलाओं को टिकट दिया है. केवल 10 प्रतिशत.
इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, पार्टी के एक सीनियर नेता सुनील जाखड़ ने कहा,
"मैं बस इतना बता सकता हूं कि किसी को भी टिकट जेंडर के आधार पर मना नहीं हुआ है. समस्या यह है कि आपको इलेक्शन से पहले उन्हें (महिलाओं को) तैयार करना होगा. यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो रातोरात बदल जाए. प्रियंका जी उत्तर प्रदेश में ग्राउंड पर थीं. उन्होंने महिलाओं को तैयार किया. पंजाब में यह प्रक्रिया भी शुरू हुई है और अभी उन्हें अपने आप को पॉलिटिकल अखाड़े में साबित करने में वक़्त लगेगा."
जनवरी की शुरुआत में पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रमुख नवजोत सिंह सिद्धू ने हर महिला को ₹2000 प्रतिमाह देने का वादा किया था. साथ में साल के आठ गैस सिलेंडर भी मुफ़्त देने का वादा किया था. सोचने वाली बात है कि महिला मेनिफेस्टो, महिला मैराथन, महिलाओं के लिए नारे देने वाली प्रियंका गांधी यह सोचती हैं कि पंजाब की लड़कियां लड़ नहीं सकतीं?

# आम आदमी पार्टी दिसंबर, 2021 में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब की एक चुनावी रैली में घोषणा की थी कि अगर उनकी सरकार आई तो वह 18 साल से ऊपर की हर लड़की को हर महीने ₹1000 देंगे. उन्होंने कहा था कि वो हज़ार रुपये उस लड़की को ताकत देंगे, इनसे वह सूट ख़रीद सकती है, किताबें खरीद सकती है.
अमृतसर में अरविंद केजरीवाल
अमृतसर, पंजाब में आप नेताओं के साथ दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फोटो - पीटीआई)

हमने अरविंद केजरीवाल के इस वादे पर एक पोल कराया था. पोल में ज़्यादातर रिसपॉन्स यही थे कि 'इससे क्या होगा?' और यहां पर लोग 1000 रुपयों की बात नहीं कर रहे थे. लोगों का कहना था कि 1000 या 2000, जब तक बुनियादी बदलाव नहीं होंगे, इससे कितना फ़र्क़ पड़ेगा?
अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी महिलाओं के मुद्दों को बहुत मुखरता से उठाती है. महिलाओं के हक़-अधिकारों के लिए हर जगह जिरह करती है. लेकिन पंजाब में उनकी जरा बाक़ी पार्टियों की जिरह जितनी ही है. पंजाब में आम आदमी पार्टी सारी 117 सीटों पर चुनाव लड़ रही है और पार्टी ने केवल 12 महिलाओं को टिकट दिए हैं. पॉइंट टू बी नोटेड, ये पंजाब की किसी भी पार्टी द्वारा महिलाओं को दिए गए टिकट में सबसे ज्यादा है. # भाजपा-पीएलसी - पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह की नई पार्टी पंजाब लोक कांग्रेस यानी PLC ने BJP गठबंधन कर लिया है. भाजपा-कैप्टन अमरिंदर वाले एलायंस ने 106 सीटों पर उम्मीदवार घोषित किए, जिनमें से 8 महिलाओं को टिकट दिया है.
भाजपा ने उत्तर प्रदेश में तो महिलाओं पर बात की, लेकिन पंजाब में कुछ ख़ासा ध्यान नहीं दिया. अमरिंदर सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंसेज़ में लगातार कहा है कि उनके मुख्य उद्देश्य किसान और राज्य की सुरक्षा होंगे. भाजपा के साथ गठबंधन करने के बाद से ही उनका यह मानना है कि केवल नरेंद्र मोदी ही राज्य और देश की सुरक्षा कर सकते हैं. पार्टियां क्यों नहीं देती है महिलाओं को टिकट? हमें यह समझने की कोशिश की कि ऐसे कौन से फैक्टर्स हैं, जिनकी वजह से पंजाब में पार्टियां महिलाओं को टिकट नहीं देती हैं. इसके लिए हमने बात की प्रोफेसर लखबीर सिद्धू से. जो दशमेश खालसा कॉलेज, मुक्तसर साहिब में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं. प्रोफेसर लखबीर ने कहा,
"हमारा देश के पितृसत्तात्मक देश है और पंजाब भी इसी देश का हिस्सा है. इसलिए लोगों में इस आईडिया की स्वीकार्यता कम है कि एक महिला हमें पॉलिटिकली लीड कर सकती है. एक महिला कोई काम करवा देगी, इस बात को मानने में लोगों में हिचक है. पार्टियों के लिए जीतना बहुत ज़रूरी है, इसीलिए वे स्कीमों और योजनाओं से तो महिलाओं का वोट लेना चाहती हैं, लेकिन ग्राउंड के मिज़ाज के हिसाब से ही फ़ैसला करती हैं.
जहां तक बात है कांग्रेस की, तो कांग्रेस ने यूपी में तो 40% आरक्षण की घोषणा कर दी, लेकिन पंजाब में नहीं कर रही है. कारण है कि वह पंजाब को खोना नहीं चाहती. पंजाब कांग्रेस के लिए एक ज़रूरी राज्य है. उत्तर प्रदेश में वह यह प्रयोग अफ़ोर्ड कर सकते हैं, पंजाब में नहीं."
इस मुद्दे को और तफ्सील से समझने के लिए हमने पंजाब यूनिवर्सिटी की प्रोफेसर सरबजीत कौर से भी बात की. सरबजीत से हमने पंजाब के सोशल फैब्रिक और महिलाओं के प्रतिनिधित्व का सप्लाई-साइड जानने की कोशिश की. प्रोफ़ेसर सरबजीत ने हमें बताया,
"देखिए एक बात तो यह है कि समाज के पितृसत्तात्मक होने की वजह से एक पुरुष का काम न करना, सामान्य है. लेकिन एक महिला का काम न करना, असामान्य है. अगर कोई महिला प्रतिनिधि है, तो उसको स्टैंड-आउट करना पड़ेगा कि लोग उसे पहचानें. उसको एक्स्ट्रा एफर्ट्स करने होंगे ताकि यह स्थापित हो सके कि महिलाएं काम करवा सकती हैं. पुरुष काम करें न करें, कोई बखेड़ा नहीं खड़ा करेगा.
दूसरी बात यह है कि कुछ महिलाएं जो एक अच्छी नियत रखती हैं, समाज की समझ रखती हैं, काम करने का जज़्बा रखती हैं, इसलिए भी काम नहीं करती की राजनीति में उन लोगों की भरमार है, जिन पर महिलाओं से जुड़े अपराध दर्ज हैं. अब यह एक हेल्दी इन्वायरमेंट नहीं है काम करने के लिए. ऐसे में बाक़ी सारी बातें बाद में आती हैं."
महिला उम्मीदवारी में सब पार्टियां एक हैं चाबी कहां है
आज अगर सरदार ख़ान होते तो यही पूछते.

2018 में पंजाब कैबिनेट ने ग्राम पंचायत, पंचायत समिति और ज़िला परिषद में महिलाओं के 33% रिज़र्वेशन को बढ़ाकर 50% कर दिया था. इसकी वजह से आज लोकल लेवल की राजनीति में महिलाओं की स्थिति काफी बेहतर है. पंजाब के पंचायती राज संस्थानों (PRI) में 1,00,312 पदों में 41,912 महिलाएं हैं. करीब 41 प्रतिशत.
लेकिन मामला जब राज्य स्तर की राजनीति की तरफ आता है तो मामला 10-11 प्रतिशत से ऊपर नहीं उठ पाता है. एक राज्य में महिला मुद्दों, महिला प्रतिनिधित्व, महिला सशक्तिकरण की फ्लैग बियरर बनने का दावा करने वाली पार्टियां दूसरे राज्य में इन मुद्दों पर मौन धारण कर लेती हैं. ये दोहरापन क्या इन पार्टियों के नेताओं को नहीं खलता?

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